भारत की डेटा सेंटर क्षमता वित्त वर्ष 30 तक करीब चार गुना बढ़ेगी, 1.5 लाख करोड़ रुपए का निवेश होने की उम्मीद: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 25 मार्च (आईएएनएस)। भारत की डेटा सेंटर क्षमता वित्त वर्ष 30 तक करीब चार गुना बढ़कर 4 गीगावाट हो सकती है। इसमें 1.5 लाख करोड़ रुपए का निवेश होने की संभावना है। यह जानकारी बुधवार को जारी रिपोर्ट में दी गई।
केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के प्रति मिलियन इंटरनेट उपभोक्ताओं पर 1.2 मेगावाट की डेटा सेंटर क्षमता मौजूद है, जो कि वैश्विक औसत प्रति मिलियन 5 मेगावाट की क्षमता से काफी कम है।
रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटलीकरण, लागत प्रतिस्पर्धा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का बढ़ता उपयोग भारत के डेटा सेंटर क्षेत्र में मजबूत वृद्धि के कारक हैं। वैश्विक डेटा सेंटर बाजार में भारत की हिस्सेदारी 2025 तक लगभग 4 प्रतिशत और क्षमता 1.2 गीगावाट होने की उम्मीद है।
वित्त वर्ष 2022-2025 के दौरान देश की को-लोकेशन डेटा सेंटर क्षमता दोगुनी होकर 1.2 गीगावाट हो गई, साथ ही उच्च उपयोग स्तर (औसतन 90 प्रतिशत से अधिक) ने भी इसमें योगदान दिया।
रेटिंग एजेंसी ने वित्त वर्ष 2026-2030 के दौरान उद्योग के राजस्व में लगभग 24 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) का अनुमान लगाया है, जिसमें ईबीआईटीडीए मार्जिन लगभग 40-42 प्रतिशत पर स्थिर रहेगा। हालांकि, विकास चरण में उच्च पूंजीगत व्यय चक्र के कारण लीवरेज स्तर अपेक्षाकृत उच्च बना रह सकता है।
लंबी अवधि के समझौतों के माध्यम से इस क्षेत्र में राजस्व की मजबूत स्पष्टता है, जो स्थिर नकदी प्रवाह सुनिश्चित करती है और ग्राहकों की उच्च स्तर की प्रतिबद्धता को बढ़ावा देती है।
केयरएज रेटिंग्स की निदेशक पूजा जालान ने कहा, उच्च पूंजीगत व्यय, मजबूत प्रायोजकों की धन जुटाने की क्षमता और भारतीय डेटा सेंटर संस्थाओं को लक्षित बड़े इक्विटी निवेशों के साथ यह उद्योग तेजी से विकास कर रहा है।
उन्होंने कहा कि एआई-आधारित मांग विकास की रफ्तार को गति देगी, जबकि उद्योग की पूरी क्षमता को साकार करने के लिए विद्युत अवसंरचना का समर्थन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने आगे कहा कि बढ़ती लागत और कमीशनिंग की समयसीमा में वृद्धि के बीच नकदी प्रवाह को प्रबंधित करने की क्षमता निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण होगी।
रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के वर्षों में डेटा सेंटर की लागत में 50-70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य कारण भूमि की ऊंची कीमतें, एडवांस कूलिंग टेक्नोलॉजी को अपनाना और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश है। इसके साथ ही, कार्यक्षेत्र में बदलाव और मंजूरी मिलने में देरी के कारण कमीशनिंग की समयसीमा भी बढ़ गई है।
केयरएज रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर तेज किरण ने कहा कि डेटा सेंटर की मांग वर्तमान में एंटरप्राइज आईटी और क्लाउड स्टोरेज द्वारा संचालित है, लेकिन अगले 5-7 वर्षों में एआई-आधारित कार्यभार विकास के अगले चरण को गति प्रदान करेगा।
--आईएएनएस
एबीएस/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
वैश्विक झटकों के प्रति पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर, सुधार नहीं हुए तो बढ़ेगी मुश्किलें: विशेषज्ञों की चेतावनी
नई दिल्ली, 25 मार्च (आईएएनएस)। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आयातित ईंधन पर ज्यादा निर्भरता, कमजोर विदेशी वित्तीय स्थिति और सीमित सरकारी खर्च की क्षमता के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अभी भी वैश्विक झटकों के प्रति काफी कमजोर बनी हुई है। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अगर जल्द ही बड़े आर्थिक सुधार नहीं किए गए तो स्थिति और खराब हो सकती है।
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा हाई-ऑक्टेन ईंधन पर पेट्रोलियम शुल्क बढ़ाने के फैसले को कुछ हद तक सही माना जा रहा है, क्योंकि यह उन लोगों पर लागू होता है जो महंगी और लग्जरी गाड़ियां इस्तेमाल करते हैं। इस फैसले से सरकार हर महीने करीब 9 अरब रुपए जुटा रही है, जिसका इस्तेमाल आम लोगों को बढ़ती तेल कीमतों से बचाने के लिए किया जा रहा है।
हालांकि, यह कदम केवल अस्थायी राहत देता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक तेल कीमतें भू-राजनीतिक तनाव के कारण दबाव में हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह फैसला अर्थव्यवस्था की गहरी समस्याओं को हल नहीं करता।
इन गहरी समस्याओं में आयातित ईंधन पर ज्यादा निर्भरता, कमजोर विदेशी मुद्रा स्थिति और सीमित वित्तीय संसाधन शामिल हैं। यही कारण है कि देश की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनी हुई है और बिना सुधार के स्थिति समय के साथ और बिगड़ सकती है।
वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने भी इस स्थिति की गंभीरता को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि उम्मीद कोई रणनीति नहीं होती, खासकर ऐसे समय में जब मध्य पूर्व में तनाव जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही यह संघर्ष कम हो जाए, लेकिन इसका असर सप्लाई चेन, उत्पादन और व्यापार मार्गों पर बना रह सकता है, जिससे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं।
सरकार के पहले के कदम, जैसे ईंधन भत्ते में कटौती और आंशिक वर्क-फ्रॉम-होम व्यवस्था, भी ज्यादा असरदार नहीं माने जा रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि ऊर्जा की मांग को नियंत्रित करने के लिए और सख्त कदम उठाने की जरूरत है। जैसे बाजार, रेस्तरां और व्यापारिक संस्थानों को समय से पहले बंद करना, ऐसे कदम जो अब तक राजनीतिक कारणों से टाले जाते रहे हैं, उन्हें अब स्थायी नीति के रूप में लागू करने की जरूरत पड़ सकती है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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