Mithun Chakraborty Hospitalised: अचानक अस्पताल में भर्ती हुए मिथुन चक्रवर्ती, कोलकाता में चल रहा इलाज, सामने आईं तस्वीरें
Mithun Chakraborty Hospitalised: दिग्गज अभिनेता और भाजपा नेता मिथुन चक्रवर्ती को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के चलते कोलकाता के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यहां उनकी एक मामूली सर्जरी की गई, जिसके बाद उनकी हालत अब स्थिर बताई जा रही है। इस खबर के सामने आने के बाद उनके फैंस के बीच चिंता बढ़ गई, हालांकि डॉक्टरों की निगरानी में उनकी तबीयत में तेजी से सुधार हो रहा है।
मुख्यमंत्री ने अस्पताल पहुंचकर जाना हालचाल
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी शुक्रवार को अस्पताल पहुंचे और मिथुन चक्रवर्ती से मुलाकात की। मुलाकात के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर अभिनेता की कुछ तस्वीरें साझा करते हुए बताया कि उन्होंने मिथुन की सेहत की जानकारी ली और उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की।
मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि मिथुन चक्रवर्ती फिलहाल डॉक्टरों की निगरानी में हैं और उनकी रिकवरी अच्छी तरह हो रही है।
गोपनीय रखना चाहते थे सर्जरी की जानकारी
मीडिया से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने बताया कि अभिनेता की सर्जरी गुरुवार रात हुई थी। उन्होंने कहा कि मिथुन चक्रवर्ती इस पूरी प्रक्रिया को निजी रखना चाहते थे, इसलिए इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।
मुख्यमंत्री के अनुसार, अभिनेता ने पहले ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में सूचित कर दिया था। उन्होंने यह भी बताया कि मिथुन अब पहले से बेहतर हैं और जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिलने की उम्मीद है।
फिल्म और राजनीति दोनों में सक्रिय हैं मिथुन
मिथुन चक्रवर्ती भारतीय सिनेमा के उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में हिंदी और बांग्ला फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने अपने अभिनय सफर की शुरुआत 1976 में फिल्म 'मृगया' से की थी, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इसके बाद 'डिस्को डांसर' जैसी सुपरहिट फिल्म ने उन्हें देश ही नहीं, विदेशों में भी जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। फिल्मों के साथ-साथ मिथुन राजनीति में भी सक्रिय हैं और भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं।
मूवी रिव्यू: डीसी:अभिनेता बने लोकेश कनगराज ने किया कमाल या फिल्म सिर्फ स्टाइल और एक्शन तक सिमटी? आइए जानते हैं।
हर खूबसूरत दिखने वाली फिल्म अच्छी हो, यह जरूरी नहीं। कुछ फिल्में अपने शानदार कैमरा वर्क, दमदार एक्शन और शानदार संगीत से शुरुआत में प्रभावित तो करती हैं, लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उनका जादू उतरने लगता है। डीसी भी ऐसी ही फिल्म है। यहां स्टाइल भरपूर है, हिंसा भरपूर है, लेकिन दिल को छू लेने वाली कहानी और किरदारों का भावनात्मक सफर कहीं पीछे छूट जाता है। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 22 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 2 स्टार की रेटिंग दी है। फिल्म की कहानी कैसी है? कहानी देवदास (लोकेश कनगराज) की है, जो अपराध की दुनिया का बड़ा नाम है और पुलिस से बचता फिर रहा है। एक हादसा उसकी जिंदगी बदल देता है और इसी दौरान उसकी मुलाकात चंद्रा (वामिका गब्बी) से होती है। चंद्रा बचपन से ही शोषण और हिंसा का शिकार रही है और अब उसकी जिंदगी में बचा ही क्या है, इसका जवाब वह खुद भी नहीं जानती। दो टूटे हुए लोग एक दूसरे का सहारा बनते हैं और फिर शुरू होती है खून, बदले और गोलियों से भरी लड़ाई। बीच में पार्वती (संजना कृष्णमूर्ति) की एंट्री होती है। शुरुआत में लगता है कि उनका किरदार कहानी की दिशा बदल देगा, लेकिन कुछ ही देर बाद वह सिर्फ एक अधूरी संभावना बनकर रह जाता है। पहला हिस्सा रहस्य और माहौल बनाने में सफल रहता है, लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म एक ही तरह के एक्शन और हिंसा को बार बार दोहराती रहती है। गोलियां चलती रहती हैं, लोग मरते रहते हैं, लेकिन कहानी वहीं की वहीं खड़ी नजर आती है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? मुख्य अभिनेता के तौर पर लोकेश कनगराज उम्मीद से बेहतर साबित होते हैं। अभिनय में अनुभव की कमी कहीं कहीं दिखती है, लेकिन किरदार को निभाने की उनकी ईमानदार कोशिश साफ नजर आती है। कम संवादों में भी वह चेहरे के भाव से असर छोड़ने की कोशिश करते हैं। वामिका गब्बी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। दर्द, गुस्सा और बेबसी को उन्होंने बेहद सहज तरीके से पर्दे पर उतारा है। उनका किरदार सबसे ज्यादा याद रह जाता है। संजना कृष्णमूर्ति को जितनी अहमियत के साथ पेश किया जाता है, पटकथा उन्हें उतना ही जल्दी भूल जाती है। बाकी कलाकार अपने हिस्से का काम ठीक करते हैं, लेकिन किसी को भी यादगार बनने का मौका नहीं मिलता। निर्देशन और तकनीकी पक्ष अरुण मथेश्वरन की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उनका विजुअल ट्रीटमेंट रहा है और यहां भी वही नजर आता है। हर फ्रेम बेहद खूबसूरती से रचा गया है। लाल और नीले रंग का इस्तेमाल सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि किरदारों की मानसिक स्थिति दिखाने के लिए किया गया है। लेकिन निर्देशन वहीं कमजोर पड़ जाता है जहां कहानी को भावनाओं की जरूरत होती है। फिल्म लगातार यह बताती रहती है कि किरदार टूटे हुए हैं, लेकिन दर्शक कभी उनके दर्द से जुड़ नहीं पाता। दूसरे हिस्से में एक्शन इतना ज्यादा हो जाता है कि कुछ देर बाद उसका असर ही खत्म होने लगता है। कैमरा वर्क बेहतरीन है। कई दृश्य किसी पेंटिंग जैसे लगते हैं। प्रोडक्शन डिजाइन और लोकेशन फिल्म को अलग पहचान देते हैं। संपादन भी तेज है, लेकिन मजबूत पटकथा के बिना तकनीकी चमक ज्यादा देर तक काम नहीं आती। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। कई साधारण दृश्य भी उनके पृष्ठभूमि संगीत की वजह से बड़े और प्रभावशाली लगते हैं। एक्शन दृश्यों में उनका संगीत अलग ही रोमांच पैदा करता है। अफसोस, पटकथा उस स्तर का साथ नहीं दे पाती। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? डीसी ऐसी फिल्म है जो आंखों को प्रभावित करती है, कानों को रोमांचित करती है, लेकिन दिल तक नहीं पहुंच पाती। लोकेश कनगराज अभिनय में अच्छी शुरुआत करते हैं, वामिका गब्बी शानदार काम करती हैं और अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत फिल्म को कई बार संभाल लेता है। लेकिन कमजोर पटकथा, दोहराव से भरा दूसरा हिस्सा और किरदारों से भावनात्मक दूरी इसे औसत अनुभव बनाकर छोड़ देती है। अगर आप सिर्फ स्टाइलिश एक्शन और शानदार विजुअल्स के लिए फिल्म देखना चाहते हैं तो शायद निराश नहीं होंगे। लेकिन मजबूत कहानी और यादगार भावनाओं की उम्मीद लेकर जाएंगे तो यह फिल्म अधूरी सी लगेगी।
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