लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 24 मार्च को असम के सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। दो बार के सांसद बोरदोलोई ने राज्य विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए थे। आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इस्तीफा 20 मार्च से प्रभावी हो गया है। बोरदोलोई ने 17 मार्च को कांग्रेस से इस्तीफा दिया था और अगले दिन औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए थे, जो असम के चुनाव पूर्व राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
भाजपा ने तुरंत ही बोरदोलोई को हाई-प्रोफाइल दिसपुर निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारने का फैसला किया और 88 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची में उनकी उम्मीदवारी की घोषणा की। राज्य के प्रशासनिक मुख्यालय वाले दिसपुर में कड़ी टक्कर होने की उम्मीद है। अपने चयन पर प्रतिक्रिया देते हुए बोरदोलोई ने भाजपा नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि पार्टी में शामिल होते समय उन्होंने किसी पद की मांग नहीं की थी। उन्होंने कहा कि उनका यह निर्णय सार्वजनिक जीवन में अधिक सार्थक भूमिका निभाने की इच्छा से प्रेरित था।
उन्होंने पत्रकारों से कहा कि जब मैंने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया, तब मैंने भाजपा से कुछ नहीं मांगा… मुझे बस एक ऐसा मंच चाहिए था जहां मैं काम कर सकूं और अधिक सार्थक भूमिका निभा सकूं। अपने राजनीतिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बोरदोलोई ने बताया कि वे चार बार विधायक रह चुके हैं और असम में तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में लगभग 15 वर्षों तक मंत्री पद पर रहे। बाद में उन्होंने लगातार दो बार लोकसभा में नागांव निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के साथ काम करने की इच्छा भी जताई और सरकार में अपने पूर्व सहयोग को याद किया। बोरदोलोई ने इस साझेदारी को विकास को आगे बढ़ाने और उग्रवाद से संबंधित चुनौतियों का समाधान करने में प्रभावी बताया और कहा कि उन्हें दोबारा सहयोग करने का अवसर मिलने पर खुशी होगी। दिसपुर में अपनी संभावनाओं के बारे में उन्होंने कहा कि वे मतदाताओं से अत्यंत विनम्रता के साथ संपर्क करेंगे और भाजपा उम्मीदवार के रूप में उनका विश्वास हासिल करने का प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि रोजगार सृजन और जीवन स्तर में सुधार उनके चुनाव अभियान का मुख्य बिंदु होगा और उन्होंने राज्य सरकार के विकास एजेंडे का समर्थन किया।
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात को लेकर भारत की चिंता लगातार बढ़ती जा रही हैं। इस मुद्दे पर संसद में जहां सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली, वहीं केंद्र सरकार ने हालात पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज राज्यसभा में स्पष्ट किया कि भारत का मुख्य लक्ष्य संवाद और कूटनीति के माध्यम से क्षेत्र में शांति बहाल करना है, जबकि विपक्ष ने सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्होंने पश्चिम एशिया के अधिकांश देशों के राष्ट्राध्यक्षों से दो बार बातचीत की है और भारत लगातार खाड़ी देशों, ईरान, इजराइल तथा अमेरिका के संपर्क में है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत किसी भी प्रकार के संघर्ष के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान चाहता है। साथ ही उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों पर हमलों और मार्ग में रुकावट को अस्वीकार्य बताया।
प्रधानमंत्री ने संसद को बताया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ रहा है। पेट्रोल, डीजल, गैस और उर्वरक जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इससे बाजार में अस्थिरता और महंगाई बढ़ने की आशंका है। उन्होंने यह भी बताया कि खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं और उनकी सुरक्षा तथा आजीविका सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में कई जहाज फंसे हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय चालक दल मौजूद है। ऐसे में उनकी सुरक्षित वापसी और स्थिति सामान्य करना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।
उधर, जहां एक ओर सरकार स्थिति को संभालने के प्रयासों पर जोर दे रही है, वहीं विपक्ष लगातार सरकार की आलोचना कर रहा है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार की विदेश नीति को व्यक्तिगत और कमजोर बताते हुए कहा कि इससे देश की स्थिति प्रभावित हो रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों के कारण आम जनता को महंगाई का सामना करना पड़ रहा है, खासकर रसोई गैस और पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर स्पष्ट और मजबूत नीति की जरूरत है। राज्यसभा में एक अन्य सदस्य ने वर्ष 2003 में इराक युद्ध के दौरान पारित प्रस्ताव का हवाला देते हुए सरकार से इसी तरह का स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की।
हम आपको यह भी बता दें कि इस पूरे संकट का असर देश के भीतर भी दिखने लगा है। रसोई गैस की संभावित कमी और कीमतों में अनियमितता को लेकर संसद में स्थगन प्रस्ताव तक लाया गया। विपक्ष का कहना है कि सरकार को इस मुद्दे पर तुरंत ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि आम जनता को राहत मिल सके। इस बीच, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो इसका असर भारत के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर और अधिक गंभीर हो सकता है।
उधर, बढ़ते वैश्विक तनाव को देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक कर देश की सुरक्षा तैयारियों की समीक्षा की। इस बैठक में प्रमुख सैन्य और अनुसंधान अधिकारियों ने भाग लिया और वर्तमान स्थिति का आकलन किया गया। इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत कूटनीतिक प्रयासों के साथ साथ सुरक्षा के मोर्चे पर भी सतर्क है।
हम आपको बता दें कि मोदी सरकार ने पश्चिम एशिया संकट पर व्यापक चर्चा के लिए बुधवार शाम पांच बजे सर्वदलीय बैठक बुलाई है। माना जा रहा है कि इस बैठक में सभी दल मिलकर एक साझा रणनीति तैयार करने का प्रयास करेंगे, ताकि देश के हितों की रक्षा की जा सके और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका मजबूत बने। प्रधानमंत्री ने भी संसद में कहा है कि इस कठिन समय में देश को एकजुट होकर शांति और संवाद का संदेश देना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत अपनी कूटनीतिक कोशिशों के जरिए इस संकट में कितनी प्रभावी भूमिका निभा पाता है।
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