ट्रंप के हमले रोकने की घोषणा के बाद बाजारों ने दी प्रतिक्रिया, तेल की कीमतों में गिरावट
वॉशिंगटन, 23 मार्च (आईएएनएस)। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान पर हमले टालने के फैसले के बाद तेल की कीमतों में गिरावट आई और बाजारों में तेजी देखी गई। भारत की नजर इस घटनाक्रम पर बनी हुई है, क्योंकि इसका आर्थिक असर पड़ सकता है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर कहा, अमेरिका, ईरान के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले पांच दिनों के लिए रोक देगा। उन्होंने तेहरान के साथ संघर्ष खत्म करने को लेकर हुई बातचीत को बहुत अच्छी और सार्थक बातचीत बताया।
उन्होंने कहा कि यह रोक चल रही बैठकों और चर्चाओं की सफलता पर निर्भर रहेगी। यह इस बात का संकेत है कि तीन हफ्ते से चल रहे इस युद्ध में कूटनीतिक समाधान की कोई गुंजाइश बन सकती है।
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, यह घोषणा फरवरी के अंत से जारी युद्ध के बाद पहली बार उच्च-स्तरीय बातचीत की पुष्टि करती है।
घोषणा के बाद बाजारों ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी। वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, अमेरिकी स्टॉक फ्यूचर्स लगभग दो प्रतिशत तक बढ़ गए, जिससे पहले की गिरावट की भरपाई हो गई। वॉशिंगटन पोस्ट ने बताया कि वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत 114 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 100 डॉलर से नीचे आ गई।
वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, यूरोपीय बाजार भी शुरुआती गिरावट के बाद सकारात्मक हो गए, जबकि क्रिप्टोकरेंसी में भी तेजी आई, क्योंकि निवेशकों का भरोसा बेहतर हुआ।
विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए ऊर्जा आपूर्ति बहाल करने में मदद कर सकता है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक अहम मार्ग है।
हालांकि, अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है। ईरान से जुड़े मीडिया ने ट्रंप की घोषणा को पीछे हटना बताया, जबकि कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि इस बयान से पहले कोई सीधी या मध्यस्थता वाली बातचीत नहीं हुई थी।
इस संघर्ष का असर पहले ही वैश्विक ऊर्जा ढांचे पर पड़ा है। ईरानी मिसाइल हमलों में कतर के एक बड़े गैस-टू-लिक्विड्स प्लांट को नुकसान पहुंचा, जिससे उसका एक हिस्सा कम से कम एक साल के लिए बंद हो गया।
बढ़ती ईंधन कीमतों का असर अर्थव्यवस्थाओं पर दिखने लगा है। अमेरिका में डीजल की कीमतें एक महीने में 40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई हैं, जिससे सप्लाई चेन और उपभोक्ता कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
सोमवार को तेजी के बावजूद निवेशक सतर्क बने हुए हैं। इस संघर्ष ने बॉन्ड बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ाया है, और बढ़ती महंगाई के जोखिम के बीच ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें भी तेज हो गई हैं।
भारत के लिए तेल की कीमतों में गिरावट तुरंत राहत लेकर आई है। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक होने के कारण, भारत कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील है। कम तेल की कीमतें महंगाई को कम कर सकती हैं और सरकार के वित्तीय दबाव को घटा सकती हैं।
साथ ही, खाड़ी क्षेत्र की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। लाखों भारतीय वहां काम करते हैं, और किसी भी तरह की बढ़ोतरी उनके रोजगार और भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण रेमिटेंस पर असर डाल सकती है।
--आईएएनएस
एवाई/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
भारतीय कंपनियों ने वित्त वर्ष 2026 में 11 लाख करोड़ से ज्यादा पूंजीगत निवेश की बनाई योजना: सरकार
नई दिल्ली, 23 मार्च (आईएएनएस)। सरकार ने सोमवार को कहा कि भारतीय कंपनियों (इंडिया इंक) ने वित्त वर्ष 2025-26 में 11 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के पूंजीगत निवेश (कैपेक्स) की योजना बनाई है, जो निजी कॉरपोरेट सेक्टर में मजबूत निवेश रुझान को दर्शाता है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) द्वारा जारी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जो अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच किया गया था, वित्त वर्ष 2026 के लिए कुल अनुमानित कैपेक्स करीब 11.44 लाख करोड़ रुपए है।
सरकार ने बताया कि कंपनियां अपने निवेश प्लान को अच्छी तरह लागू भी कर रही हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में प्रति कंपनी वास्तविक कैपेक्स 173.5 करोड़ रुपए रहा, जबकि योजना 180.2 करोड़ रुपए की थी। यानी करीब 96.3 प्रतिशत लक्ष्य पूरा हुआ, जो मजबूत क्रियान्वयन को दर्शाता है।
रणनीति के तौर पर, करीब 48.63 प्रतिशत कंपनियां वित्त वर्ष 2026 में मुख्य संपत्तियों पर निवेश कर रही हैं, जबकि 38.36 प्रतिशत कंपनियां मौजूदा संपत्तियों में वैल्यू बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं। लगभग 60.13 प्रतिशत कंपनियों का मुख्य उद्देश्य कैपेक्स के जरिए आय बढ़ाना है, इसके बाद क्षमता बढ़ाने पर फोकस है।
फंडिंग के मामले में, ज्यादातर कंपनियां अपने आंतरिक संसाधनों पर निर्भर हैं, जो कुल कैपेक्स का 65.35 प्रतिशत है। घरेलू कर्ज का हिस्सा 23.25 प्रतिशत है, जबकि इक्विटी और विदेशी निवेश जैसे स्रोतों की हिस्सेदारी कम है।
आगे के रुझानों की बात करें तो वित्त वर्ष 2027 के लिए कंपनियों ने करीब 9.55 लाख करोड़ रुपए के कैपेक्स की योजना बनाई है।
एनएसओ का कहना है कि ऐसे अनुमान आमतौर पर थोड़े सावधानीपूर्वक होते हैं, जिससे संकेत मिलता है कि आगे भी निवेश का माहौल मजबूत बना रह सकता है।
इस सर्वेक्षण में विभिन्न उद्योगों की बड़ी निजी कंपनियों को शामिल किया गया है, ताकि निवेश के रुझानों को समझकर नीति बनाने और रणनीतिक योजना में मदद मिल सके।
इसके अलावा, कंपनियां नई टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी पर भी ध्यान दे रही हैं। करीब 6.62 प्रतिशत निवेश सोलर, विंड और बायोमास जैसी हरित ऊर्जा में किया जा रहा है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 5.83 प्रतिशत निवेश रोबोटिक उपकरणों पर और कुल मिलाकर 2.83 प्रतिशत निवेश रोबोटिक्स पर किया जा रहा है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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