AAP नेता आतिशी ने विधानसभा अध्यक्ष को लिखा पत्र, निष्कासित विधायकों को सदन में शामिल करने की मांग
आम आदमी पार्टी की वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आतिशी ने रविवार विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर निष्कासित विधायकों को सदन में शामिल करने की मांग की है. नेता प्रतिपक्ष आतिशी ने अपने पत्र में स्पष्ट कर दिया कि आठवीं विधानसभा के गठन के उपरांत सदन में पक्ष और विपक्ष ने सर्वसम्मति से विधानसभा अध्यक्ष को चुना था. इस उम्मीद से कि उनके अनुभव से सदन लोकतांत्रिक व विधि-सम्मत तरीके से चलेगा.
सदन स्वस्थ चर्चा, संवाद व विचार-विमर्श से चलता है
आतिशी ने लिखा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा केवल सरकार का मंच नहीं होता, बल्कि यह पक्ष व विपक्ष दोनों की सहभागिता से संचालित होने वाला एक सशक्त संस्थान है, जहां सदन स्वस्थ चर्चा, संवाद व विचार-विमर्श से चलता है. विपक्ष की जिम्मेदारी है कि यदि सरकार या सत्ता पक्ष जनता के हित की अनदेखी करे या अपने वादों के अनुरूप कार्य न करे, तो उन सभी विषयों को सदन में उठाकर सत्ता पक्ष की आलोचना करे.
विधानसभा अध्यक्ष का विपक्ष का रवैया
आतिशी ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि प्रथम सत्र की बैठक से लेकर चतुर्थ सत्र की प्रथम बैठक तक विधानसभा अध्यक्ष का विपक्ष के प्रति जो रवैया रहा है, वह न केवल चिंताजनक है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप भी नहीं है. सरकार की आलोचना एवं जनहित के मुद्दे उठाने पर एक साथ पूरे विपक्ष को, विपक्ष के नेता सहित, सदन से बाहर करना न केवल सदन से बल्कि सदन परिसर से भी बाहर कर देना सदन की मर्यादा के विरुद्ध है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में देश की किसी भी विधानसभा, विधान परिषद, अथवा देश की सर्वोच्च विधायिका लोकसभा व राज्यसभा में ऐसा दृष्टांत देखने को नहीं मिला है, जहाँ पूरे विपक्ष को एक साथ न केवल सदन से बल्कि सदन परिसर से भी बाहर कर दिया गया हो.
जनप्रतिनिधि के विशेषाधिकारों का हनन
आतिशी ने कहा कि अध्यक्ष के इस कदम से एक नई परंपरा की शुरुआत हुई है, जो न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि विधानसभा की मर्यादा को भी तार-तार करने वाली है. उन्होंने आगे कहा कि एक लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए जनप्रतिनिधि की अवमानना की गई, उसे सत्र के दौरान संपूर्ण सत्रावधि तक परिसर में आने से रोका गया, जो अत्यंत निंदनीय एवं सर्वथा अनुचित है. यह एक चुने हुए जनप्रतिनिधि के विशेषाधिकारों का हनन भी है.
तीन दिनों तक सदन नहीं चलने दिया
आतिशी ने बताया कि हाल ही में संपन्न विधानसभा सत्र के दौरान यह देखा गया कि सत्ता पक्ष के सदस्यों ने लगातार तीन दिनों तक सदन नहीं चलने दिया, जिससे दिल्ली से जुड़े कई गंभीर विषयों पर चर्चा नहीं हो पाई. परंतु विधानसभा अध्यक्ष ने एक भी सदस्य का निष्कासन नहीं किया. इसके विपरीत, जब सदन में विपक्ष के सदस्यों ने कुछ बिंदु उठाने का प्रयास किया, तो अध्यक्ष ने न केवल उन्हें सदन से बाहर किया, बल्कि पुनः सदन परिसर से भी बाहर कर दिया और पूरे सत्रावधि तक उन्हें सदन में न आने देने का निर्णय लिया. उस दौरान समितियों की बैठकों व अन्य बैठकों, जिनकी पूर्व सूचना दी गई थी, में पहुँचने पर भी सदस्यों को विधानसभा के द्वार पर रोक दिया गया. यह दर्शाता है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों तथा समितियों में उनकी वैधानिक भागीदारी को बाधित करने का प्रयास किया गया. परिणामस्वरूप, वे अपने विधायी कार्यों का निष्पादन नहीं कर सके. यह स्पष्ट रूप से उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग में बाधा डालने का कार्य है, जो एक प्रकार से संविधान का भी अनादर है.
सत्ता में 8,931 दिन, पीएम मोदी ने किया नया कीर्तिमान स्थापित; बन गए सबसे लंबे शासन वाले नेता
भारतीय राजनीति में आज का दिन खास माना जा रहा है, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है. उन्होंने सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग का लंबा चला आ रहा रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
पवन कुमार चामलिंग ने सिक्किम में लगातार 8,930 दिनों तक मुख्यमंत्री रहते हुए सरकार का नेतृत्व किया था. यह अब तक भारत में किसी भी सरकार के प्रमुख (मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री) के लिए सबसे लंबा कार्यकाल माना जाता था. चामलिंग 1994 से 2019 तक करीब 25 साल तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी.
अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8,931 दिन पूरे कर लिए हैं और इस तरह उन्होंने यह रिकॉर्ड तोड़ दिया है. यानी अब भारत में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने वाले नेता नरेंद्र मोदी बन गए हैं.
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