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'PSL होगा बंद, पाकिस्तानी खिलाड़ियों का खेलना नहीं पसंद...', शोएब अख्तर का बड़ा बयान, IPL को क्यों बताया बर्बादी कारण

IPL VS PSL: आईपीएल 2026 को शुरू होने में अब एक हफ्ते से भी कम वक्त बचा है. मगर, इस बीच लगातार खबरें आ रही हैं कि कई खिलाड़ी पाकिस्तान सुपर लीग से अपना नाम वापस ले रहे हैं और तो और उनमें से कई प्लेयर्स को IPL के अपकमिंग सीजन में खेलते भी नजर आने वाले हैं. ऐसे में पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शोएब अख्तर ने इसपर बड़ा बयान दे दिया है. उनका कहना है कि जिस तरह से खिलाड़ी पाकिस्तान सुपर लीग छोड़कर इंडियन प्रीमियर लीग की ओर जा रहे हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि जल्द ही PSL बंद हो सकता है.

क्या बोले शोएब अख्तर?

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शोएब अख्तर ने PSL को लेकर एक बड़ा बयान दिया है. उनका कहना है कि जिस तरह से खिलाड़ी पाकिस्तान सुपर लीग को छोड़कर आईपीएल में शामिल हो रहे हैं, इससे तो पीएलएल के टिकने की उम्मीद ही कम होती जा रही है.

अख्तर ने कहा, "सच कहूं तो, जिस तरह से खिलाड़ी पीएसएल छोड़कर आईपीएल में शामिल हो रहे हैं, उससे पीएसएल के टिकने की संभावना पर संदेह पैदा हो गया है. अगर यही सिलसिला जारी रहा तो पीएसएल बहुत जल्द बंद हो जाएगी. क्योंकि स्थानीय खिलाड़ियों को खेलते देखना भी किसी को पसंद नहीं है. हमारे पास दर्शकों को आकर्षित करने के लिए उस स्तर की प्रतिभा ही नहीं है."

PSL से नाम वापस ले रहे हैं खिलाड़ी

पाकिस्तान सुपर लीग 2026 के शुरू होने से पहले ही तमाम खिलाड़ी इसे छोड़कर जा रहे हैं. हालांकि, प्लेयर्स इसे छोड़ने की कोई सटीक वजह नहीं बता रहे हैं और निजी कारणों का हवाला देकर ही नाम वापस ले रहे हैं. PSL छोड़ चुके विदेशी खिलाड़ियों में कुछ को IPL 2026 में खेलने का बुलावा आ चुका है, वहीं कुछ के साथ IPL फ्रेंचाइजियों की बातचीत का दौर जारी है.

पीएलएल से नाम वापस लेने वाले खिलाड़ियों की लिस्ट वक्त के साथ लंबी होती जा रही है. अब तक ऑस्ट्रेलिया के जैक फ्रेजर मैक्गर्क, स्पेन्सर जॉन्सन, वेस्टइंडीज के जॉनसन चार्ल्स और गुटकेश मोती, साउथ अफ्रीका के ओटनील बार्टमैन, इंग्लैंड के टिमल मिल्स, जिम्बाब्वे के ब्लेसिंग मुजरबानी, अफगानिस्तान के रहमनुल्लाह गुरबाज और श्रीलंका के दासुन शनाका अपने नाम वापस ले चुके हैं.

2016 में शुरू हुई PSL

IPL की शुरुआत 2008 में हुई थी. उसके बाद दुनियाभर में क्रिकेट फेंचाइजी लीगों की शुरुआत हुई. इसी कड़ी में पाकिस्तान ने अपनी क्रिकेट लीग 2016 में शुरू की, जिसका नाम PSL है. पीएसएल में पाकिस्तान के खिलाड़ी तो हिस्सा लेते ही हैं और दुनियाभर से भी कई बड़े खिलाड़ी इसे खेलने के लिए पाकिस्तान पहुंचते हैं. हालांकि, पीएसएल की तुलना आईपीएल से नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों फ्रेंचाइजी लीगों में जमीन आसमान का अंतर है.

ये भी पढ़ें: PSL को दिखाया ठेंगा, अब IPL में एंट्री लेगा ये विदेशी कप्तान, RR में सैम करन को करेगा रिप्लेस

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भारत-कंबोडिया की साझी सभ्यता का साक्षी है अंगकोर वाट और ता प्रोहम मंदिर, एएसआई ने संभाली बड़ी जिम्मेदारी

नोम पेन्ह, 22 मार्च (आईएएनएस)। अंगकोर वाट मंदिर भारत-कंबोडिया की साझी सभ्यता का शानदार प्रतीक है। सिएम रीप स्थित वास्तुकला की बेजोड़ विरासत को सहेजे रखने में भारत की भूमिका अहम रही है। यहीं अंगकोर पुरातत्व उद्यान में बौद्ध मठ ता प्रोहम भी है, जिसके जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, यानी एएसआई ने उठा रखी है। विदेश मंत्रालय के सचिव (ईस्ट) पी. कुमारन यहां पहुंचे। एमईए ने इसकी जानकारी दी।

तस्वीरों में 12वीं सदी में खमेर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय का बनाया विशाल मंदिर दिख रहा है, तो कुछ में कुमारन मंदिर की वास्तुकला को निहारते देखा जा सकता है। इसके साथ ही एमईए ने लिखा, सचिव (ईस्ट) पी. कुमारन ने सिएम रीप में अंगकोर वाट मंदिर का दौरा किया, जो कंबोडिया में दुनिया का सबसे बड़ा पुराना मंदिर परिसर है और भारत-कंबोडिया की साझी सभ्यता की विरासत का एक शानदार प्रतीक भी। 1986-1993 तक, भारत इसके जीर्णोद्धार के लिए मदद देने वाला पहला देश था।

बता दें, अंकोरवाट, कंबोडिया के सिएम रीप स्थित दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक (लगभग 400 एकड़) और हिंदू मंदिर है, जिसे 12वीं सदी में खमेर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने भगवान विष्णु के लिए बनवाया था। यह खमेर वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है।

इसकी अगली पोस्ट में ता प्रोहम का जिक्र है। इसमें बताया गया कि पी. कुमारन ने कंबोडिया के सिएम रीप में ता प्रोहम मंदिर का दौरा किया, जहां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग जीर्णोद्धार और संरक्षण के कामों का नेतृत्व कर रहा है।

ता प्रोहम, कंबोडिया के अंगकोर स्थित 12वीं सदी का एक प्रसिद्ध महायान बौद्ध मंदिर है, जो अपने खंडहर रूप और विशाल पेड़ों (अंजीर और कपास) की जड़ों में लिपटी पत्थर की दीवारों के लिए प्रसिद्ध है। राजा जयवर्मन सप्तम द्वारा अपनी माता के सम्मान में निर्मित कराया गया था और यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल है।

इस मंदिर का सबसे आकर्षक दृश्य विशाल पेड़ों की जड़ें हैं जो प्राचीन पत्थर की संरचनाओं के साथ मिल कर एक रहस्यमयी माहौल बनाती हैं। 12वीं शताब्दी के अंत में निर्मित, यह मूल रूप से एक बौद्ध मठ और विश्वविद्यालय था। अब, एएसआई और अन्य कंबोडियाई संगठन मिलकर जीर्णोद्धार का कार्य कर रहे हैं।

--आईएएनएस

केआर/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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