भारत में जुलाई में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री रिकॉर्ड 3.28 लाख यूनिट्स पर रही: फाडा
नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (फाडा) द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में इलेक्ट्रिक वाहनों की खुदरा बिक्री अब तक के उच्चतम स्तर 3,27,901 इकाई पर पहुंच गई, जो सालाना आधार पर 66 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है।
इस उछाल का मतलब है कि महीने के दौरान देश में खुदरा में बिकने वाले हर आठ वाहनों में से करीब एक वाहन इलेक्ट्रिक था। यह इस क्षेत्र में उपभोक्ताओं की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
हालांकि, इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों ने सबसे आगे रहते हुए पहली बार 2 लाख इकाइयों का आंकड़ा पार किया। जुलाई में इनकी खुदरा बिक्री सालाना आधार पर 88.3 प्रतिशत बढ़कर 2,04,362 इकाई हो गई, जबकि बाजार हिस्सेदारी एक साल पहले के 7.7 प्रतिशत से बढ़कर 11.2 प्रतिशत हो गई।
टीवीएस मोटर 55,499 इकाइयों की बिक्री के साथ इस क्षेत्र में शीर्ष स्थान पर बनी रही। इसके बाद बजाज ऑटो 45,613 इकाइयों और एथर एनर्जी 30,357 इकाइयों की बिक्री के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रही। वहीं, ओला इलेक्ट्रिक ने महीने के दौरान 14,106 इकाइयां बेचीं।
इस बीच, इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों ने भी अपनी मजबूत स्थिति को और मजबूत किया। इनकी बिक्री सालाना आधार पर 25.3 प्रतिशत बढ़कर 87,055 इकाई हो गई। इस क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 65.1 प्रतिशत हो गई, जो दर्शाता है कि इस श्रेणी में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पसंदीदा विकल्प बन गई है।
महिंद्रा समूह 14,191 इकाइयों की बिक्री के साथ इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों के बाजार में शीर्ष पर बना रहा। इसके बाद बजाज ऑटो 13,442 इकाइयों की बिक्री के साथ दूसरे स्थान पर रहा।
यात्री वाहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों की खुदरा बिक्री सालाना आधार पर 83.1 प्रतिशत बढ़कर 32,928 इकाई हो गई। इनकी बाजार हिस्सेदारी पिछले साल जुलाई के 5 प्रतिशत से बढ़कर करीब 8 प्रतिशत हो गई। टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स इलेक्ट्रिक यात्री वाहन बाजार में 13,678 इकाइयों की बिक्री के साथ शीर्ष पर बनी रही। इसके बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा 7,742 इकाइयों और जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया 5,689 इकाइयों की बिक्री के साथ रहे।
इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाणिज्यिक वाहनों ने भी सबसे मजबूत वृद्धि दरों में से एक दर्ज की। इनकी खुदरा बिक्री सालाना आधार पर करीब 181 प्रतिशत बढ़कर 3,556 इकाई हो गई। इनकी बाजार हिस्सेदारी एक साल पहले के 1.65 प्रतिशत से दोगुनी से अधिक बढ़कर 3.57 प्रतिशत हो गई। टाटा मोटर्स 1,306 इकाइयों की बिक्री के साथ इस क्षेत्र में शीर्ष पर बनी रही।
प्रदर्शन पर फाडा के उपाध्यक्ष साई गिरिधर ने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि ईवी को अपनाना अब भविष्य का अनुमान नहीं, बल्कि बाजार की वास्तविकता बन चुका है।
उन्होंने कहा, “दोपहिया वाहनों ने पहली बार दो लाख का आंकड़ा पार किया है, तिपहिया वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहन डिफॉल्ट विकल्प बन गए हैं, वाणिज्यिक वाहनों में बेड़े का विद्युतीकरण हो रहा है और आपूर्ति संबंधी बाधाओं के बावजूद यात्री इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग मजबूत बनी हुई है।”
फाडा के अनुसार, सभी वाहन श्रेणियों में व्यापक आधार पर हुई वृद्धि भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ते बदलाव की तेज रफ्तार को दर्शाती है।
--आईएएनएस
एबीएस
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फिर NDA का हिस्सा होगा ये दल? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मिले पार्टी प्रमुख
2029 होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर एनडीए का कुनबा बड़ा हो सकता है. हालांकि इससे पहले विधानसभा चुनावों में भी एनडीए अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटा है. खास तौर पर पश्चिम बंगाल जीतने के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि अब पंजाब की बारी है. यानी पंजाब को लेकर एनडीए की कोशिशें तेज हो गई हैं.
एनडीए के कुनबे के बढ़ने की आशंकाओं को इसलिए भी हवा मिला क्योंकि शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है. दोनों नेताओं की यह बैठक संसद भवन परिसर में हुई। हालांकि मुलाकात में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसे लेकर अभी तक दोनों पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है.
इसके बावजूद इस मुलाकात ने पंजाब की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. खासतौर पर आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि क्या कभी लंबे समय तक साथ रहे अकाली दल और बीजेपी एक बार फिर राजनीतिक गठबंधन की राह पर लौट सकते हैं?
मुलाकात के बाद गठबंधन की अटकलें क्यों तेज?
पंजाब की राजनीति में अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन काफी पुराना रहा है. दोनों दलों ने कई चुनाव एक साथ लड़े और लंबे समय तक राज्य की राजनीति में एक मजबूत गठजोड़ के रूप में अपनी पहचान बनाई.
हालांकि वर्ष 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के रिश्तों में बड़ा बदलाव आया. अकाली दल ने केंद्र की तत्कालीन सरकार से दूरी बना ली और एनडीए से अलग होने का फैसला किया. इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनावी रास्ता अपनाया.
अब सुखबीर बादल और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात के बाद पुराने गठबंधन की संभावित वापसी को लेकर चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं.
पंजाब की सियासत में दोनों दलों की अपनी-अपनी चुनौतियां
अकाली दल के लिए पंजाब में राजनीतिक जमीन पहले की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण रही है. वहीं बीजेपी ने भी राज्य में अपना संगठन मजबूत किया है, लेकिन उसे अभी सिख बहुल पंजाब में व्यापक राजनीतिक आधार बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
ऐसे में दोनों दलों के लिए साथ आना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है. हालांकि गठबंधन की संभावना अभी केवल राजनीतिक अटकलों तक सीमित है और किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है.
कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर भी चर्चा की बात
अकाली दल से जुड़े सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि सुखबीर सिंह बादल ने प्रधानमंत्री के साथ पंजाब की कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाया. इसके अलावा राज्य सरकार के कामकाज और कथित भ्रष्टाचार से जुड़े विषयों पर भी चर्चा होने की बात कही जा रही है.
हालांकि इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री कार्यालय या बीजेपी की ओर से बैठक के बाद कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है. इसलिए मुलाकात के एजेंडे को लेकर सामने आ रही बातों को फिलहाल राजनीतिक सूत्रों के दावों के तौर पर ही देखा जा रहा है.
केजरीवाल के बयान से भी बढ़ी राजनीतिक गर्मी
इस मुलाकात पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर सवालिया अंदाज में पूछा कि क्या दोनों दल फिर से साथ आने वाले हैं?
केजरीवाल की टिप्पणी से साफ है कि पंजाब की राजनीति में इस बैठक को संभावित चुनावी समीकरणों के लिहाज से गंभीरता से देखा जा रहा है.
बीजेपी कहती रही है- अकेले चुनाव लड़ेंगे
दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के कई नेता पिछले कुछ समय से सार्वजनिक रूप से यह कहते रहे हैं कि पार्टी 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी. ऐसे में सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात ने इन पुराने दावों के बीच नई राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक मुलाकात थी या इसके पीछे भविष्य के चुनावी समीकरणों को लेकर कोई बड़ी बातचीत भी हुई?
2022 और 2024 में अलग-अलग रास्ते का नहीं मिला बड़ा फायदा
गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़े. 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों ने अपने-अपने स्तर पर चुनावी मैदान संभाला.
हालांकि अलग राह अपनाने के बाद दोनों पार्टियां अपेक्षित राजनीतिक सफलता हासिल नहीं कर सकीं. यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पुराने राजनीतिक समीकरणों की संभावनाओं पर चर्चा स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है.
क्या फिर बनेगा पुराना सियासी समीकरण?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अकाली दल और बीजेपी के बीच दोबारा औपचारिक गठबंधन होने जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन गठबंधन के लिए सीट बंटवारे, साझा रणनीति और राजनीतिक मुद्दों जैसे कई पहलुओं पर सहमति जरूरी होगी.
आने वाले महीनों में दोनों दलों की गतिविधियों और नेताओं के बयानों से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है. अगर दोनों पार्टियां फिर साथ आती हैं, तो इसका सीधा असर पंजाब के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है और आगामी विधानसभा चुनाव में मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है.
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