फिर NDA का हिस्सा होगा ये दल? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मिले पार्टी प्रमुख
2029 होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर एनडीए का कुनबा बड़ा हो सकता है. हालांकि इससे पहले विधानसभा चुनावों में भी एनडीए अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटा है. खास तौर पर पश्चिम बंगाल जीतने के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि अब पंजाब की बारी है. यानी पंजाब को लेकर एनडीए की कोशिशें तेज हो गई हैं.
एनडीए के कुनबे के बढ़ने की आशंकाओं को इसलिए भी हवा मिला क्योंकि शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है. दोनों नेताओं की यह बैठक संसद भवन परिसर में हुई। हालांकि मुलाकात में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसे लेकर अभी तक दोनों पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है.
इसके बावजूद इस मुलाकात ने पंजाब की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. खासतौर पर आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि क्या कभी लंबे समय तक साथ रहे अकाली दल और बीजेपी एक बार फिर राजनीतिक गठबंधन की राह पर लौट सकते हैं?
मुलाकात के बाद गठबंधन की अटकलें क्यों तेज?
पंजाब की राजनीति में अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन काफी पुराना रहा है. दोनों दलों ने कई चुनाव एक साथ लड़े और लंबे समय तक राज्य की राजनीति में एक मजबूत गठजोड़ के रूप में अपनी पहचान बनाई.
हालांकि वर्ष 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के रिश्तों में बड़ा बदलाव आया. अकाली दल ने केंद्र की तत्कालीन सरकार से दूरी बना ली और एनडीए से अलग होने का फैसला किया. इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनावी रास्ता अपनाया.
अब सुखबीर बादल और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात के बाद पुराने गठबंधन की संभावित वापसी को लेकर चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं.
पंजाब की सियासत में दोनों दलों की अपनी-अपनी चुनौतियां
अकाली दल के लिए पंजाब में राजनीतिक जमीन पहले की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण रही है. वहीं बीजेपी ने भी राज्य में अपना संगठन मजबूत किया है, लेकिन उसे अभी सिख बहुल पंजाब में व्यापक राजनीतिक आधार बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
ऐसे में दोनों दलों के लिए साथ आना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है. हालांकि गठबंधन की संभावना अभी केवल राजनीतिक अटकलों तक सीमित है और किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है.
कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर भी चर्चा की बात
अकाली दल से जुड़े सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि सुखबीर सिंह बादल ने प्रधानमंत्री के साथ पंजाब की कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाया. इसके अलावा राज्य सरकार के कामकाज और कथित भ्रष्टाचार से जुड़े विषयों पर भी चर्चा होने की बात कही जा रही है.
हालांकि इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री कार्यालय या बीजेपी की ओर से बैठक के बाद कोई विस्तृत आधिकारिक बयान नहीं आया है. इसलिए मुलाकात के एजेंडे को लेकर सामने आ रही बातों को फिलहाल राजनीतिक सूत्रों के दावों के तौर पर ही देखा जा रहा है.
केजरीवाल के बयान से भी बढ़ी राजनीतिक गर्मी
इस मुलाकात पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर सवालिया अंदाज में पूछा कि क्या दोनों दल फिर से साथ आने वाले हैं?
केजरीवाल की टिप्पणी से साफ है कि पंजाब की राजनीति में इस बैठक को संभावित चुनावी समीकरणों के लिहाज से गंभीरता से देखा जा रहा है.
बीजेपी कहती रही है- अकेले चुनाव लड़ेंगे
दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के कई नेता पिछले कुछ समय से सार्वजनिक रूप से यह कहते रहे हैं कि पार्टी 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी. ऐसे में सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात ने इन पुराने दावों के बीच नई राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक मुलाकात थी या इसके पीछे भविष्य के चुनावी समीकरणों को लेकर कोई बड़ी बातचीत भी हुई?
2022 और 2024 में अलग-अलग रास्ते का नहीं मिला बड़ा फायदा
गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़े. 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों ने अपने-अपने स्तर पर चुनावी मैदान संभाला.
हालांकि अलग राह अपनाने के बाद दोनों पार्टियां अपेक्षित राजनीतिक सफलता हासिल नहीं कर सकीं. यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पुराने राजनीतिक समीकरणों की संभावनाओं पर चर्चा स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है.
क्या फिर बनेगा पुराना सियासी समीकरण?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अकाली दल और बीजेपी के बीच दोबारा औपचारिक गठबंधन होने जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन गठबंधन के लिए सीट बंटवारे, साझा रणनीति और राजनीतिक मुद्दों जैसे कई पहलुओं पर सहमति जरूरी होगी.
आने वाले महीनों में दोनों दलों की गतिविधियों और नेताओं के बयानों से तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है. अगर दोनों पार्टियां फिर साथ आती हैं, तो इसका सीधा असर पंजाब के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है और आगामी विधानसभा चुनाव में मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है.
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