ईरान-इजरायल जंग में कौन किसके साथ? समझिए मिडिल ईस्ट का पूरा सियासी और सैन्य समीकरण...
Iran Israel War Who Supports Whom: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने दुनिया की नजरें एक बार फिर Iran और Israel पर टिका दी हैं। दोनों देशों के बीच टकराव बढ़ने के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि कौन-कौन से देश किसके साथ खड़े हैं और अगर संघर्ष चलता रहता है तो आगे क्या होगा?
बता दें मिडिल ईस्ट की पॉलिटिक्स पहले से ही काफी जटिल रही है, जहां कई देश अलग-अलग रणनीतिक और धार्मिक समीकरणों के आधार पर अपने फैसले लेते हैं तो कुछ निजी फायदे.
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क्यों बढ़ाता ही जा रहा है ईरान-इजरायल तनाव?
ईरान और इजरायल के बीच दुश्मनी कई दशकों पुरानी है। इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को अपने लिए खतरा मानता है, जबकि ईरान इजरायल की नीतियों की लगातार आलोचना करता रहा है।हाल के महीनों में दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और सैन्य गतिविधियों के चलते तनाव और बढ़ गया है।
इजरायल के साथ कौन-कौन से देश?
इजरायल को पश्चिमी देशों का मजबूत समर्थन मिलता रहा है। खासकर United States लंबे समय से उसका प्रमुख सहयोगी माना जाता है। इसके अलावा कुछ यूरोपीय देश भी सुरक्षा और कूटनीतिक स्तर पर इजरायल के साथ खड़े रहते हैं। मिडिल ईस्ट में भी कुछ देशों के साथ इजरायल के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में बेहतर हुए हैं।
ईरान के साथ कौन खड़ा है?
ईरान को क्षेत्र में कुछ ऐसे समूहों और देशों का समर्थन मिलता है जो इजरायल की नीतियों का विरोध करते हैं। मिडिल ईस्ट की राजनीति में ईरान का प्रभाव कई क्षेत्रों में देखा जाता है। वहीं वैश्विक स्तर पर कुछ देश कूटनीतिक स्तर पर ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हैं, जिनमें Russia और China जैसे देश भी शामिल हैं।
मिडिल ईस्ट के देशों की स्थिति
मिडिल ईस्ट के कई देश इस संघर्ष में सीधे शामिल नहीं होना चाहते। वे स्थिति पर नजर रखते हुए संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। कुछ देश कूटनीतिक समाधान की बात कर रहे हैं ताकि क्षेत्र में बड़ा युद्ध न छिड़े।
अगर जंग अगले कुछ महीने नहीं रुकी तो इसका दुनिया पर क्या असर होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष बड़े युद्ध में बदलता है तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। खासकर तेल सप्लाई के महत्वपूर्ण रास्तों पर खतरा बढ़ सकता है। इसका असर दिखने भी लगा है, 20 मार्च को ही भारत में प्रीमियम पेट्रोल पर 2.30 रुपये और इंडस्ट्रियल डीजल पर 22 रुपये तक बढ़ा दिए गए हैं
भारत के लिए क्यों अहम है यह जंग?
भारत के मिडिल ईस्ट के कई देशों के साथ मजबूत आर्थिक और व्यापारिक संबंध हैं। अगर क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो इसका असर ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और वहां काम कर रहे भारतीय नागरिकों पर भी पड़ सकता है।
FAQ
Q1. ईरान और इजरायल के बीच विवाद क्यों है?
उत्तर-दोनों देशों के बीच राजनीतिक, रणनीतिक और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर लंबे समय से तनाव बना हुआ है।
Q2. इजरायल का सबसे बड़ा सहयोगी कौन है?
उत्तर-इजरायल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे मजबूत समर्थन United States से मिलता है।
Q3. क्या रूस और चीन ईरान का समर्थन करते हैं?
उत्तर-Russia और China ईरान के साथ कूटनीतिक और आर्थिक संबंध बनाए रखते हैं, लेकिन उनकी भूमिका अक्सर संतुलित कूटनीति की होती है।
Q4. क्या यह संघर्ष बड़े युद्ध में बदल सकता है?
उत्तर-अगर तनाव लगातार बढ़ता रहा और अन्य देश भी इसमें शामिल हुए तो स्थिति बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकती है।
Q5. भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
उत्तर- तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, व्यापार में बाधा और मिडिल ईस्ट में काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर असर पड़ सकता है।
ईरान मुस्लिम देशों के साथ युद्ध नहीं चाहता : राष्ट्रपति पेजेश्कियान
तेहरान, 21 मार्च (आईएएनएस)। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट किया है कि उनका देश मुस्लिम देशों के साथ किसी भी तरह का युद्ध या टकराव नहीं चाहता। सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, उन्होंने यह बात ईद-उल-फितर और नवरोज के अवसर पर दिए गए अपने संदेश में कही।
ईद-उल-फितर जहां रमजान के महीने के समापन का प्रतीक है, वहीं नवरोज 21 मार्च को मनाया जाने वाला ईरानी नववर्ष है।
राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने हाल के दिनों में ईरान और कुछ अरब देशों के बीच बढ़ते तनाव पर भी बात की। उन्होंने कहा, हम मुस्लिम देशों के साथ किसी भी तरह का मतभेद नहीं चाहते। हम न तो संघर्ष चाहते हैं और न ही युद्ध। वे हमारे भाई हैं। उन्होंने इन तनावों के लिए संयुक्त राज्य और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया।
उन्होंने आगे कहा कि ईरान अपने पड़ोसी देशों के साथ सभी विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने के लिए तैयार है। इसके साथ ही उन्होंने मध्य पूर्व में मुस्लिम देशों का एक साझा सुरक्षा ढांचा बनाने का प्रस्ताव भी रखा, जिससे क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा, हमें इस क्षेत्र में बाहरी शक्तियों की जरूरत नहीं है। हम मुस्लिम देशों के सहयोग से एक इस्लामिक असेंबली बना सकते हैं, जिसके तहत हम अपनी सुरक्षा, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों को बेहतर तरीके से संचालित कर सकते हैं।
परमाणु हथियारों के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी स्थिति साफ की। उन्होंने कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में नहीं बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि देश के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई पहले ही एक धार्मिक आदेश जारी कर चुके हैं, जिसमें परमाणु हथियारों पर रोक लगाई गई है। ऐसे में कोई भी अधिकारी इस दिशा में कदम नहीं उठा सकता।
हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका दुनिया को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है।
बता दें कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से तेहरान और ईरान के कई अन्य शहरों पर हमले किए थे। इन हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता, कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर और आम नागरिकों की मौत हो गई थी। इसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइल और ड्रोन हमलों की शृंखला शुरू कर दी, जिसमें इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया।
--आईएएनएस
वीकेयू/एएस
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