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Rajasthan News: मूक-बधिर बच्चों की पढ़ाई पर संकट! राजस्थान के विशेष स्कूलों में सुविधाओं का अभाव, CM भजनलाल कब देंगे जवाब?
Rajasthan News: राजस्थान में स्पेशियल नीड्स वाले बच्चों की शिक्षा को लेकर सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. जिन स्कूलों में मूक-बधिर बच्चों को सामान्य विद्यार्थियों की तुलना में अतिरिक्त सहयोग, प्रशिक्षित शिक्षक और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण मिलना चाहिए, वहां कई स्तरों पर व्यवस्थाओं की कमी सामने आने की बात कही जा रही है. कहीं विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी है तो कहीं भवन और बुनियादी सुविधाओं का अभाव बच्चों की पढ़ाई के साथ उनकी सुरक्षा को भी सवालों के घेरे में ला रहा है.
पूर्व CM ने भी लिखा था पत्र
जयपुर के राजकीय सेठ आनंदीलाल पोद्दार मूक-बधिर हायर सेकेंडरी स्कूल में आज उस समय हंगामा मच गया, जब बुनियादी सुविधाओं की बदहाली से परेशान दिव्यांग छात्र-छात्राएं प्रदर्शन पर उतरें. छात्रों ने आरोप लगाया है कि स्कूल में शौचालयों की हालत बेहद खराब है, छात्रों के लिए पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और कई कक्षाओं की दीवारें जर्जर होकर दरक चुकी हैं. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी स्कूल पहुंचकर विद्यार्थियों से मुलाकात की थी. उन्होंने भी सरकार पर दिव्यांग बच्चों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए CM को पत्र लिखकर जल्द समाधान निकालने की मांग की है. आखिर क्या हैं बच्चों की मांगें और क्यों फूटा उनका गुस्सा.
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मूक-बधिर बच्चों के लिए शिक्षा का अर्थ सिर्फ किताबे नहीं
मूक-बधिर बच्चों के लिए शिक्षा सिर्फ किताब और क्लासरूम तक सीमित नहीं होती है. उन्हें सांकेतिक भाषा, स्पेशल टीचिंग मेथड और स्पेशल ट्रेनिंग वाले टीचरों की जरूरत होती है. ऐसे में यदि स्कूलों में ही जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन बच्चों को अच्छी शिक्षा और समान अवसर कैसे मिलेंगे?
स्पेशल एजुकेशन के स्कूलों में भी ट्रेनड टीचर्स की कमी क्यों?
मूक-बधिर विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए सामान्य शिक्षकों के साथ-साथ स्पेशल ट्रेनिंग वाले शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. साइन लैंग्वेज और बच्चों की स्पेशल नीड्स को समझने वाले शिक्षक ही उन्हें बेहतर तरीके से पढ़ा सकते हैं. ऐसे में अगर सरकारी स्कूलों में Adequate specialist teachers उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में भजनलाल सरकार को यह बताना चाहिए कि खाली पदों को भरने के लिए वे कौन से और क्या कदम उठा रही हैं? कितने पद स्वीकृत किए गए हैं, कितने पद खाली हैं और उन पर भर्ती कब तक हो सकेगी?
सुरक्षित भवन के बिना कैसी होगी पढ़ाई?
बच्चों की शिक्षा से भी ज्यादा जरूरी उनकी सुरक्षा करना है. अगर किसी सरकारी स्कूल में छत गिरने जैसी घटना होती है तो यह सिर्फ एक भवन की समस्या नहीं हैं बल्कि पूरे एजुकेशन सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती है. स्पेशल नीड्स वाले बच्चों के स्कूलों में भवनों की स्थिति की नियमित जांच, मरम्मत, शौचालय, पेयजल, रैंप और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करवाना ही सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए. सवाल यह भी है कि जिन भवनों को बच्चों के लिए सेफ माना जा रहा है, वहां उन्हें कैसे पढ़ाया जाएगा?
CM भजनलाल शर्मा कब देंगे अभिभावकों के सवालों का जवाब?
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से इस पूरे मामले में छात्रों और उनके अभिभावकों ने सवाल किए हैं. जैसे कि
राज्य के विशेष स्कूलों में विशेषज्ञ शिक्षकों के कितने पद खाली हैं? मूक-बधिर बच्चों के लिए कितने स्कूलों में पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हैं और कितने विशेष स्कूलों के भवनों की हाल ही में सुरक्षा जांच हुई है? जिन स्कूल भवनों में खामियां मिलीं, उनकी मरम्मत कब तक पूरी होगी?
बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार की निगरानी व्यवस्था क्या है और क्या सरकार सभी विशेष स्कूलों का राज्यव्यापी ऑडिट करवाती है या नहीं?
क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ योजना बनाना है?
खास बच्चों के लिए योजनाएं और बजट तभी सार्थक होते हैं, जब उनका असर बच्चों की कक्षा में दिखाई दे. सरकारी रिकॉर्ड में सुविधाएं उपलब्ध होने और जमीन पर उनका इस्तेमाल होने के बीच में एक गहरा अंतर देखा गया है, तो आखिर इसकी जिम्मेदारी कौन तय लेगा. मूक-बधिर बच्चे अपनी बात सामान्य तरीके से नहीं कह पाते हैं. इसलिए, उनकी सुरक्षा और शिक्षा की जिम्मेदारी व्यवस्था पर और भी ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. अगर स्कूल की छत, शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं ही भरोसेमंद नहीं हैं तो उन बच्चों से बेहतर भविष्य की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
राजस्थान सरकार को इस मुद्दे को सिर्फ शिक्षा विभाग की सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. विशेष स्कूलों की स्थिति की जिला स्तर पर जांच होनी चाहिए, भवनों का सुरक्षा ऑडिट किया जाना चाहिए, विशेषज्ञ शिक्षकों की उपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं की समीक्षा करना भी जरूरी है.
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