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ईरान जंग में अमेरिका और इजरायल के रास्ते अलग? तुलसी गबार्ड के खुलासे से मची खलबली

अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है. हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के सामने सुनवाई के दौरान गबार्ड ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल के उद्देश्य यानी 'ऑब्जेक्टिव्स' एक समान नहीं हैं. यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान ने गुरुवार को कतर स्थित दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी (LNG) हब, रास लफान (Ras Laffan) पर बड़ा हमला किया है. इस हमले के बाद खाड़ी देशों में तनाव चरम पर पहुंच गया है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराने का खतरा बढ़ गया है.

इजरायल और ट्रंप प्रशासन की अलग सोच

तुलसी गबार्ड ने सुनवाई के दौरान बताया कि इजरायली सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्राथमिकताओं में बड़ा अंतर है. गबार्ड के अनुसार, "राष्ट्रपति द्वारा तय किए गए उद्देश्य इजरायली सरकार के उद्देश्यों से अलग हैं." उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा कि इजरायल का पूरा ध्यान ईरानी नेतृत्व (Leadership) को अक्षम और खत्म करने पर केंद्रित है. दूसरी ओर, राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ किया है कि उनका लक्ष्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता, उनके मिसाइल प्रोडक्शन और ईरानी नौसेना को पूरी तरह से नष्ट करना है.

परमाणु इरादों पर गबार्ड का रुख

गबार्ड ने पिछले साल जून में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हुए अमेरिका-इजरायल के हमलों का भी जिक्र किया. उन्होंने दावा किया कि इन हमलों के बावजूद ईरान ने अपने बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने और परमाणु संवर्धन (Nuclear Enrichment) क्षमता को हासिल करने का इरादा नहीं छोड़ा है. हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान वास्तव में अपनी परमाणु शक्ति को दोबारा बना रहा है, तो उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि ईरान एक परमाणु संपन्न देश बनने की मंशा रखता है. बता दें कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के पीछे परमाणु खतरे को ही मुख्य कारण बताया है.

इजरायल के साथ डील पर संशय

सुनवाई के दौरान जब तुलसी गबार्ड से पूछा गया कि क्या इजरायल, ईरान के साथ किसी भी तरह की डील या समझौते का समर्थन करेगा, तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की. उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानती कि ईरान के साथ समझौता करने के संबंध में इजरायल का स्टैंड क्या है." यह बयान दिखाता है कि युद्ध के मैदान में साथ होने के बावजूद, भविष्य की कूटनीति को लेकर दोनों देशों के बीच तालमेल की कमी है. गबार्ड से यह भी पूछा गया कि क्या ईरान अमेरिका पर पहले हमला करने की योजना बना रहा था, लेकिन उन्होंने इस पर सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया और कहा कि यह तय करना राष्ट्रपति का काम है कि खतरा कितना गंभीर है.

कतर पर हमले से बढ़ा वैश्विक तनाव

ईरान द्वारा कतर के रास लफान पर किया गया हमला इस पूरे संघर्ष को एक नए और खतरनाक मोड़ पर ले गया है. रास लफान दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी हब है और यहां से होने वाली सप्लाई बंद होने का मतलब है पूरी दुनिया में गैस की किल्लत और कीमतों में भारी उछाल. ईरान की इस कार्रवाई को अमेरिका और इजरायल के दबाव के खिलाफ एक बड़े पलटवार के रूप में देखा जा रहा है. तुलसी गबार्ड के बयानों ने अब यह साफ कर दिया है कि पश्चिम एशिया में जारी यह जंग सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक लक्ष्यों की भी है, जहां दो करीबी सहयोगी भी पूरी तरह एकमत नहीं हैं.

ये भी पढ़ें- इजरायली इंटेलिजेंस का बड़ा दावा, ईरानी दबाव में हिज्बुल्लाह, ‘रोअरिंग लायन’ के बाद बढ़ा तनाव

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ऊर्जा की घरेलू आपूर्ति और क्षमता को संतुल‍ित रखते हुए भारत कर रहा पड़ोसी देशों की मदद: विदेश मंत्रालय

नई दिल्ली, 19 मार्च (आईएएनएस)। भारत ने गुरुवार को कहा कि वह ऊर्जा आपूर्ति आवश्यकताओं के मुद्दे पर बांग्लादेश और अन्य पड़ोसी देशों की सहायता कर रहा है, साथ ही घरेलू जरूरतों, रिफाइनिंग क्षमता और डीजल की उपलब्धता के बीच संतुलन भी बनाए रखे हुए है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए दोहराया कि नई दिल्ली को बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और अन्य पड़ोसी देशों से ऊर्जा संबंधी अनुरोध प्राप्त हुए हैं।

उन्होंने बताया कि भारत 2007 से बांग्लादेश को डीजल की आपूर्ति कर रहा है। साथ ही दूसरे पड़ोसी देशों की भी लगातार मदद कर रहा है।

रणधीर जायसवाल ने कहा, “ऊर्जा के संबंध में हमें कई पड़ोसी देशों से अनुरोध प्राप्त हुए हैं। मैंने पहले भी इस बारे में बात की थी। हमें बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव और कुछ अन्य पड़ोसी देशों से अनुरोध मिले हैं। जैसा कि मैंने पहले संकेत दिया था, भारत 2007 से विभिन्न माध्यमों से बांग्लादेश को डीजल की आपूर्ति कर रहा है। हम वर्तमान में भी बांग्लादेश और अन्य पड़ोसी देशों की सहायता जारी रखे हुए हैं। यह कार्य हमारी अपनी आवश्यकताओं, रिफाइनिंग क्षमता और डीजल की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।”

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा शिपिंग मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिससे एलपीजी (एलपीजी) की आपूर्ति चिंता का विषय बनी हुई है।

जायसवाल ने कहा, “हम सबसे पहले घरेलू खपत और घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। उनकी जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा, और उसके बाद हम यह तय करेंगे कि वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के लिए एलपीजी आपूर्ति कैसे की जाए। हालांकि, आपूर्ति की कमी के कारण यह अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है।”

पिछले सप्ताह, एक प्रमुख रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक के रूप में भारत की भूमिका को रेखांकित करते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत सरकार को बांग्लादेश से डीजल आपूर्ति का अनुरोध प्राप्त हुआ है, जिसकी समीक्षा की जा रही है।

मंत्रालय ने कहा था, “भारत अपने पड़ोसियों के लिए विशेष रूप से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का एक प्रमुख निर्यातक है। बांग्लादेश के साथ हमारे संबंधों में लोगों को केंद्र में रखने और विकास-उन्मुख दृष्टिकोण को देखते हुए, हम 2007 से ही नुमालीगढ़ रिफाइनरी से अलग-अलग तरीकों से डीजल की सप्लाई कर रहे हैं, जिनमें जलमार्ग, रेल और बाद में भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन शामिल हैं।

उन्होंने आगे कहा था, “अक्टूबर 2017 में नुमालीगढ़ रिफाइनरी और बांग्लादेश पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के बीच आपसी सहमति से तय शर्तों पर हाई-स्पीड डीजल की सप्लाई के लिए एक खरीद-बिक्री समझौता साइन किया गया था। यह बताना जरूरी है कि जहां 2017 से बांग्लादेश को डीजल का एक्सपोर्ट काफी हद तक जारी रहा है, वहीं फैसले लेते समय भारत की रिफाइनिंग क्षमता, हमारी अपनी जरूरतों और डीजल की उपलब्धता को भी ध्यान में रखा जाएगा।

सरकार ने बार-बार कहा है कि उसे कई अन्य देशों से भी ऐसे अनुरोध प्राप्त हुए हैं, जिनकी जांच भारत की घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं और उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए की जा रही है।

--आईएएनएस

एवाई/डीकेपी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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