जरूरत की खबर- नवरात्रि में खाएं टेस्टी और हेल्दी फलाहार:न्यूट्रिशन से भरपूर 12 रेसिपीज, व्रत का खाना हेल्दी बनाने के 8 टिप्स
आज चैत्र नवरात्रि का पहला दिन है। इस बार नवरात्रि 19 से 27 मार्च 2026 तक है। इस दौरान बहुत से लोग पूरे नौ दिनों का व्रत रखते हैं। व्रत में खाने को लेकर संयम बरतने होते हैं। व्रत में खाने के विकल्प कम होने पर आमतौर पर लोग या तो लंबे समय तक भूखे रहते हैं या फिर तली-भुनी चीजें ज्यादा खाते हैं। इससे थकान, कमजोरी और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि व्रत के दौरान ऐसी डिशेज चुनी जाएं, जो स्वाद के साथ शरीर को पर्याप्त ऊर्जा और पोषण भी दें। मूंगफली, मखाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, दही और फलों से व्रत के लिए कई हेल्दी व टेस्टी डिशेज आसानी से तैयार की जा सकती हैं। इसलिए जरूरत की खबर में आज बात आसान और पौष्टिक व्रत रेसिपीज की। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. पूनम तिवारी, सीनियर डाइटीशियन, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ सवाल- व्रत के लिए ऐसी कौन-सी डिशेज हैं, जो स्वादिष्ट होने के साथ पोषण से भरपूर भी हैं? जवाब- व्रत की डाइट में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं, जैसे मूंगफली, मखाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना और राजगिरा। इनसे कई हेल्दी और स्वादिष्ट डिशेज तैयार की जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, रोस्टेड मखाना, कुट्टू चीला और राजगिरा पराठा जैसी डिशेज स्वादिष्ट होने के साथ पौष्टिक भी होती हैं। नीचे दिए ग्राफिक में व्रत के लिए कुछ हेल्दी डिशेज की लिस्ट देखिए- आइए, अब इन डिशेज की रेसिपीज को एक-एक करके विस्तार से समझते हैं- 1. साबूदाना खिचड़ी सामग्री साबूदाना खिचड़ी की रेसिपी 2. रोस्टेड मखाना सामग्री रोस्टेड मखाना की रेसिपी 3. राजगिरा आलू पराठा सामग्री राजगिरा आलू पराठा की रेसिपी 4. कुट्टू आलू पराठा सामग्री कुट्टू आलू पराठा की रेसिपी 5. सिंघाड़े के आटे की बेक्ड पूरियां सामग्री बेक्ड पूरियों की रेसिपी 6. फल और दही की स्मूदी सामग्री फल और दही की स्मूदी की रेसिपी 7. कुट्टू चीला सामग्री कुट्टू चीला की रेसिपी 8. लौकी रायता सामग्री लौकी रायता की रेसिपी 9. शकरकंद चाट सामग्री शकरकंद चाट की रेसिपी 10. मखाना खीर (लो-शुगर) सामग्री मखाना खीर की रेसिपी 11. फ्रूट सलाद सामग्री फ्रूट सलाद की रेसिपी 12. कुट्टू की इडली सामग्री कुट्टू की इडली की रेसिपी सवाल- व्रत के खाने को हेल्दी कैसे बना सकते हैं? जवाब- व्रत के दौरान लोग अक्सर तली-भुनी और ज्यादा कैलोरी वाली चीजें खा लेते हैं। इससे व्रत का खाना हेल्दी होने के बजाय हैवी हो जाता है। हालांकि कुछ आसान बातों का ध्यान रखकर व्रत के भोजन को ज्यादा पौष्टिक बनाया जा सकता है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए- सवाल- व्रत का खाना बनाते समय कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए? जवाब- व्रत के दौरान लोग भोजन की शुद्धता और स्वाद पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन कुछ ऐसी गलतियां करते हैं, जिससे फलाहार हैवी हो जाता है और उसके न्यूट्रिशन कम हो जाते हैं। इसलिए व्रत का भोजन बनाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। इन छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर व्रत का खाना ज्यादा हेल्दी और संतुलित बनाया जा सकता है। ………………… जरूरत की ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- नौकरीपेशा लोग कैसे रखें नवरात्रि का व्रत: 9 दिनों का कंप्लीट डाइट प्लान ताकि ऑफिस में न आए नींद, न लगे कमजोरी व्रत का मतलब है– संयम और अनुशासन। नवरात्रि व्रत में यह संयम और अनुशासन पूरे 9 दिन बरतना होता है। अगर इसके साथ नौकरी या ऑफिस के काम भी करने पड़ें, तो चुनौती बढ़ जाती है। पूरी खबर पढ़िए…
पेरेंटिंग- 10 साल की बेटी एकदम मुंहफट है:जो मुंह में आए, बोल देती है, ये उसकी साफगोई है या संवेदना की कमी, उसे कैसे समझाएं
सवाल- मैं पटना से हूं। मेरी 10 साल की बेटी बहुत होशियार, समझदार है। लेकिन उसकी एक आदत बहुत परेशान करने वाली है। वो जो सोचती है, फट से बोल देती है। अगर उसे किसी की ड्रेस अच्छी नहीं लगी तो सीधे कह देती है, “ये अच्छी नहीं है।” अगर कोई दोस्त गलत खेले तो कह देगी, “तुम्हें खेलना नहीं आता।” वह बोलने से पहले सोचती नहीं है। दोस्त उसकी बातों का बुरा मान जाते हैं। उसकी कुछ दोस्तियां भी टूट चुकी हैं। ये साफगोई है या मुंहफटपन। मैं कन्फ्यूज हूं। समझ नहीं पा रही, उसे कैसे गाइड करूं। मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। सबसे पहले तो मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगी कि ये कोई ‘अवगुण’ नहीं है। ये आपकी बेटी की पर्सनैलिटी का एक 'रॉ' यानी कच्चा रूप है। 10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन 'सोशल इंटेलिजेंस' (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है। उनमें अभी यह समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती कि सच बोलने का तरीका भी मायने रखता है। साइकोलॉजी में इसे ‘सोशल फिल्टर डेवलपमेंट’ कहा जाता है। यह समझ जन्म से नहीं होती है, बल्कि धीरे-धीरे सीखने वाली चीज है। इसलिए बेटी को कम्युनिकेशन स्किल सिखाना जरूरी है। बच्चे के बिना फिल्टर बोलने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। आइए पहले इसे समझते हैं। बच्चे बिना फिल्टर के क्यों बोलते हैं? डेवलपमेंटल साइकोलॉजी के मुताबिक, टीनएज से पहले बच्चे दुनिया को ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नजरिए से देखते हैं। उनके दिमाग में ‘सही’ और ‘गलत’ दो ही चीजें होती हैं। वह डिप्लोमेसी के महत्व को नहीं समझते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई चीज बुरी दिख रही है, तो उसे बुरा कहना ही ईमानदारी है। वह ये नहीं समझ पाते कि उनके शब्द किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकते हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। क्या यह चिंता की बात है? यहां समझने वाली बात ये है कि अगर आपकी बच्ची जानबूझकर किसी को नीचा दिखाने या मजाक उड़ाने के लिए ऐसा करती है, तो यह बिहेवियरल प्रॉब्लम है। लेकिन अगर वह अनजाने में सिर्फ 'सच' कह रही है, तो यह केवल सोशल स्किल की कमी है। अच्छी बात यह है कि 10-12 साल की उम्र में इसे बहुत आसानी से सुधारा जा सकता है। ‘मुंहफट’ बच्चे को कैसे गाइड करें? सबसे पहले यह समझ लें कि आपकी बच्ची की ‘साफगोई‘ ही उसकी असली ताकत है। उसे बदलने की कोशिश करना उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकता है। ऐसे में जरूरत उसे चुप कराने की नहीं, बल्कि उसे बातचीत का तरीका सिखाने की है। उसे समझाएं कि सच बोलना अच्छी बात है, लेकिन हर सच उसी रूप में और उसी समय बोलना जरूरी नहीं होता है। बोलने से पहले रुकना, सोचना और सामने वाले की भावना को समझना भी उतना ही जरूरी है। बच्ची को यह सिखाएं कि वह अपनी बात रखते समय लहजा नरम रखे। शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करे और सामने वाले के नजरिए को भी समझे। आप रोल-प्ले, कहानियों और रोजमर्रा की छोटी घटनाओं के जरिए उसे यह कला सिखा सकती हैं। याद रखें, आपका उद्देश्य उसे बदलना नहीं, बल्कि उसकी बेबाकी को थोड़ा संवेदनशील बनाना है। नीचे दिए गए ग्राफिक में कुछ आसान और व्यवहारिक तरीके दिए गए हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है। ‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात’ आपकी बेटी में ईमानदारी है, ये अच्छी बात है। लेकिन उसे ये नहीं पता कि 'सच' और 'कड़वे सच' के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है। संस्कृत का एक श्लोक है- "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।" इसका अर्थ है, ‘’सच बोलो, मीठा बोलो। लेकिन ऐसा सच न बोलो, जो दिल को आहत करे।’’ बेटी को समझाएं कि सच बोले, लेकिन इसे ऐसे बोले कि सामने वाले का दिल न दुखे। उसे ये बातें उदाहरण के साथ समझाएं। जैसेकि– ‘रुको, सोचो, फिर बोलो’ का फॉर्मूला बताएं बच्ची को यह बताना जरूरी है कि बोलना एक जिम्मेदारी का काम है। उसे बताएं कि जो शब्द हम एक बार बोल देते हैं, वे कभी वापस नहीं आते। इसलिए प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा रुकना और सोचना बहुत जरूरी है। उसे कम्युनिकेशन का ‘थिंक’ फॉर्मूला समझाएं। बताएं कि कुछ भी बोलने से पहले खुद से ये 5 सवाल जरूर पूछे- ‘मुंहफट’ बच्चों के साथ पेरेंट्स न करें ये गलतियां कई बार पेरेंट्स बच्चे को सुधारने के इरादे से ऐसी प्रतिक्रियाएं देते हैं, जो अनजाने में समस्या को और बढ़ा देती है। तुरंत डांटना, सबके सामने टोकना या बार-बार उसकी कमी गिनाना बच्चे को सुधारता नहीं, बल्कि उसे डिफेंसिव बना देता है। ऐसे में बच्चा या तो चुप हो जाता है या और ज्यादा जिद्दी। इसलिए सुधार का तरीका संतुलित होना चाहिए। इसलिए पेरेंट्स को कभी भी ये गलतियां नहीं करनी चाहिए- अंत में यही कहूंगी कि आपकी बेटी को बदलने की नहीं, बस उसके बातचीत के तरीके को थोड़ा रिफाइन करने की जरूरत है। आपका काम उसे चुप कराना नहीं, बल्कि उसे बेहतर कम्युनिकेशन स्किल सिखाना है। उसे समझाएं कि शब्दों में मरहम लगाने की भी ताकत होती है। जब वह यह जान जाएगी कि सच को खूबसूरत तरीके से कहा जा सकता है, तो उसके दोस्त भी सहज महसूस करेंगे और रिश्तेदार भी उसका सम्मान करेंगे। उसे बस यह भरोसा दिलाएं कि आप उसकी सच्चाई के साथ हैं। सिर्फ उसे पेश करने का तरीका थोड़ा और संवेदनशील और खूबसूरत बनाना है। ………………………. पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा मैथ्स से बहुत डरता है: हर टेस्ट से पहले उसका पेट दर्द करने लगता है, उसका ये गणित का डर कैसे दूर करूं? याद रखिए, बच्चों को अगर कोई भी चीज सिखानी है तो वह मजेदार होनी चाहिए। बच्चों को जो चीजें मजेदार लगती हैं, उसे वे इंटरेस्ट के साथ पढ़ते व समझते हैं। वहीं दबाव और जबरदस्ती करने से बच्चे उससे दूर भागते हैं। पूरी खबर पढ़िए…
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