Gold Silver Price Today : US Fed के पॉलिसी से पहले MCX पर सोना फिसला,जानिए कमोडिटीज में आज कहां हो सकती है कमाई
Gold Silver Price Today : 11.30 बजे के आसपास एमसीएक्स पर सोने का अप्रैल वायदा 515 रुपये यानी 0.33 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 155,470 रुपये प्रति 10 ग्राम पर दिख रहा था। वहीं, चांदी का मई वायदा 1,757 रुपये यानी 0.69 प्रतिशत की गिरावट के साथ 251,700 रुपये प्रति किलो ग्राम पर दिख रहा था
Battle of Haifa: जब इस्राइल के लिए दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से भिड़ गई थी भारतीय सेना; जानें दिलचस्प इतिहास
Battle of Haifa: भारत और इस्राइल की दोस्ती हाल-फिलहाल की नहीं है बल्कि बरसों पुरानी है. भारत और इस्राइल के बीच दोस्ती इतनी पुरानी है कि शायद ही किसी को इस बारे में पता हो. बात है आज से 108 साल पुरानी है. यानी देश की आजादी से भी पहले.
23 सितंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान Battle of Haifa लड़ा गया था. इसे इतिहास की सबसे साहसिक और अनोखी लड़ाईयों में से एक में गिना जाता है. भारतीय घुड़सवार सैनिकों ने इस युद्ध में अद्भुत वीरता का परिचय दिया था. उस वक्त भारतीय सैनिकों ने दुनिया की सबसे ताकतवर साम्राज्य को परास्त कर दिया था.
तलवारों से मशीनगनों पर भारी पड़े भारतीय सैनिक
भारतीय सेना आज तो अत्याधुनिक हथियारों से लैस है लेकिन हाइफा के युद्ध में भारतीय सेना ने पुराने और पारंपरिक हथियारों से ही अपने युद्ध कौशल का जलवा दिखाया था, जिसमें मुख्य रूप से तलवारें और भाले शामिल थे. वहीं, ऑटोमन साम्राज्य और जर्मन सेना मशीनगनों और तोपों से लैस थी. बावजूद इसके भारतीय सेना ने ऑटोमन सेना को धूल चटवा दी थी. आज भी इस युद्ध को सैन्य इतिहास में गर्व के साथ याद किया जाता है. साथ ही इस युद्ध को अंतिम महान घुड़सवारी अभियान के रूप में भी जाना जाता है.
किन रेजिमेंटों ने लिया हिस्सा
हाइफा के इस ऐतिहासिक युद्ध में मैसूर, हैदराबाद और जोधपुर की घुड़सवार रेजिमेंटों ने भाग लिया था. तीनों रेजिमेंट 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड का हिस्सा थीं. इतनी कठिन परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों ने साहस और रणनीति का शानदार प्रदर्शन किया था.
‘हाइफा के हीरो’ मेजर दलपत सिंह
मेजर दलपत सिंह शेखावत इस युद्ध के सबसे बड़े नायक के रूप में सामने आए थे. इन्हें हाइफा का हीरो कहा जाता है. जोधपुर लांसर्स के इस वीर ने युद्ध में आसाधारण नेतृत्व दिखाया लेकिन उन्हें वीरगति प्राप्त हो गई. आज भी उनकी बहादुरी के किस्से प्रेरणा के स्रोत हैं, जो नई पीढ़ी को जोश और भारतीय सेना की वीरता का परिचय देती है.
क्यों खास है यह जीत
भारतीय सेना की इस जीत ने करीब 400 साल पुराने और उस वक्त के सबसे ताकतवर ऑटोमन साम्राज्य के शासन को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी. ये युद्ध सिर्फ सैन्य दृष्टि से ही अहम नहीं था बल्कि मध्य पूर्व के राजनीतिक नक्शे को भी बदलने में अहम साबित हुआ.
भारत और इस्राइल में आज भी सम्मान
भारतीय सैनिकों की वीरता और जांबाजी से मिली इस ऐतिहासिक जीत की याद में इस्राइल और भारत हर वर्ष 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाते हैं. नई दिल्ली के प्रसिद्ध तीन मूर्ति चौक को अब तीन मूर्ति हाइफा चौक के नाम से जाना जाता है. तीन मूर्ति हाइफा युद्ध में शामिल तीनों भारतीय रेजिमेंटों (मैसूर, हैदराबाद और जोधपुर की घुड़सवार रेजिमेंटों) को समर्पित है.
इसके अलावा, इस्राइल के स्कूलों में आज भी वे अपने बच्चों को भारतीय सैनिकों की बहादुरी की कहानी पढ़ाते हैं. ये युद्ध आज भी भारत और इस्राइल के मजबूत संबंधों का प्रतीक है.
युद्ध में कितने लोगों की हुई थी मौत
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे भीषण युद्धों में से एक हाइफा के युद्ध में भारतीय सेना के आठ जवान शहीद हो गए थे. वहीं 34 जवना घायल हो गए थे. वहीं, तुर्क-जर्मन सेना के करीब एक हजार से अधिक सैनिक या तो मारे गए या फिर घायल हो गए थे. 1,350 से अधिक सैनिकों को बंदी बना लिया गया था.
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