ट्रंप का NATO देशों पर फूटा गुस्सा, बोले- हमें किसी की मदद की जरूरत नहीं, ईरान की सेना को कर दिया तबाह
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने सहयोगियों, खासकर नाटो देशों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है. ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि अधिकांश नाटो 'सहयोगियों' ने ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन में शामिल होने से इनकार कर दिया है. ट्रंप के मुताबिक, यह तब हो रहा है जब लगभग हर देश इस बात से सहमत था कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. उन्होंने नाटो को एक ऐसा 'एकतरफा रास्ता' बताया जहां अमेरिका तो सबकी रक्षा करता है, लेकिन बदले में उसे कुछ नहीं मिलता.
ईरान की सैन्य शक्ति खत्म करने का दावा
सहयोगियों से मदद न मिलने के बावजूद ट्रंप ने अपनी सेना की बड़ी जीत का एलान किया है. उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान की मिलिट्री को लगभग खत्म कर दिया है. ट्रंप के शब्दों में, "ईरान की नौसेना खत्म हो गई है, उनकी वायुसेना खत्म हो गई है, उनके एंटी-एयरक्राफ्ट और रडार सिस्टम भी अब नहीं रहे." इतना ही नहीं, ट्रंप ने यह भी दावा किया कि ईरान का नेतृत्व लगभग हर स्तर पर खत्म कर दिया गया है, ताकि वे भविष्य में कभी अमेरिका या उसके मध्य-पूर्वी सहयोगियों के लिए खतरा न बन सकें.
'हमें किसी की मदद की जरूरत नहीं'
ट्रंप ने अपने बयान में जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों का भी जिक्र किया. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि चूंकि अमेरिका को इतनी बड़ी सैन्य सफलता मिल चुकी है, इसलिए अब उन्हें नाटो देशों या किसी भी अन्य सहयोगी की सहायता की न तो जरूरत है और न ही इसकी कोई इच्छा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है और वह अपनी रक्षा करने और दुश्मनों को खत्म करने में पूरी तरह सक्षम है. ट्रंप का यह बयान उनके 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे को और मजबूती से पेश करता है.
सहयोगियों पर अरबों डॉलर खर्च करने का दिया हवाला
अपने पोस्ट में ट्रंप ने इस बात पर भी दुख जताया कि अमेरिका हर साल इन देशों की सुरक्षा के लिए सैकड़ों अरबों डॉलर खर्च करता है. उन्होंने कहा कि उन्हें सहयोगियों के इस कदम से कोई हैरानी नहीं हुई है, क्योंकि वे हमेशा से ऐसे ही रहे हैं. ट्रंप के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर दशकों पुराने सैन्य गठबंधनों पर सवाल उठाता है. ईरान के साथ जारी युद्ध के बीच ट्रंप का यह 'अकेले चलो' वाला संदेश आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति की दिशा बदल सकता है.
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भारत किन-किन देशों से पेट्रोलियम करता है आयात, क्यों इतना खास है होर्मुज स्ट्रेट?
नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। मिडिल ईस्ट में चल रहे भीषण संघर्ष का असर दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी दिख रहा है। हमलों को अगर नहीं रोका गया, तो इसका असर वैश्विक बाजार और अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप में देखने को मिलेगा। इन सबके बीच भारत अपनी सीक्रेट डिप्लोमेसी से ताजा हालात के दुष्प्रभाव को देश के लिए कम असरदार करने की सफल कोशिशों में लगा है।
होर्मुज स्ट्रेट में जो हालात बने हुए हैं, उसकी वजह से अमेरिका को नाटो देशों से अपील करनी पड़ रही है कि स्ट्रेट को खुला रखने के लिए यूएस का साथ दें और वॉरशिप भेजें। ऐसे हालात में भी भारत होर्मुज स्ट्रेट से अपने शिप बाहर निकाल ले रहा है।
भारत के दो शिप होर्मुज स्ट्रेट से निकलकर भारतीय समुद्री तट पर पहुंच गए हैं और आगे कई अन्य आने की संभावना है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 89 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। भारत के कच्चे तेल के आयात का 55 फीसदी हिस्सा ही पहले होर्मुज स्ट्रेट के बाहर से होकर आता था। हालांकि, सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, अब यह आंकड़ा 70 फीसदी भी हो गया है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित बनी हुई है। कच्चे तेल के मामले में भारत की दैनिक खपत लगभग 55 लाख बैरल है और यह लगभग 40 देशों से क्रूड ऑयल का आयात करता है।
भारत की कुल प्राकृतिक गैस खपत लगभग 189 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन है। इसमें से 97.5 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन का उत्पादन घरेलू स्तर पर होता है। अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण लगभग 47.4 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
वहीं, अगर रसोई गैस की बात करें, तो भारत अपनी एलपीजी खपत का लगभग 60 फीसदी आयात करता है। इस आयात का लगभग 90 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है। मौजूदा हालातों की वजह से यह प्रभावित हुआ है। सरकारी उपायों के बाद घरेलू एलपीजी उत्पादन में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है।
कच्चे तेल के लिए रूस, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकारों में से हैं। इसके अलावा अमेरिका से भी भारत के कच्चे तेल का आयात बढ़ा है। खाड़ी और मिडिल ईस्ट में कुवैत, कतर, ओमान और मिस्र; अफ्रीका में नाइजीरिया, अंगोला, लीबिया और अल्जीरिया; अमेरिकी महाद्वीप में कनाडा, मेक्सिको और ब्राजील; और मिडिल एशिया में कजाकिस्तान और अजरबैजान से तेल आयात करता है।
भारत कतर से कुल एलएनजी का 47-50 फीसदी आयात करता है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, नाइजीरिया और अंगोला, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से भी एलएनजी आयात करता है। खाना पकाने वाली गैस के लिए भारत मुख्य रूप से कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर निर्भर है। हालांकि, अमेरिका भी अब इस लिस्ट में शामिल हो गया है।
--आईएएनएस
केके/डीएससी
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