आरबीआई को मिला 'इनिशिएटिव ऑफ द ईयर अवॉर्ड', सुरक्षित बैंकिंग डोमेन '.बैंक.इन' के लिए लंदन के सेंट्रल बैंकिंग ने दिया सम्मान
नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। आज के डिजिटल दौर में जहां एक क्लिक में पैसे ट्रांसफर करना और ऑनलाइन शॉपिंग करना आम बात हो गई है, वहीं साइबर फ्रॉड का खतरा भी लगातार बढ़ा है। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई ने एक बड़ी पहल की है, जिसे अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है। लंदन की प्रतिष्ठित संस्था सेंट्रल बैंकिंग ने आरबीआई को इनिशिएटिव ऑफ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित करने की घोषणा की है।
आरबीआई को यह सम्मान .बैंक.इन डोमेन लॉन्च करने के लिए मिला है। इसके साथ ही भारत दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने बैंकिंग सिस्टम के लिए एक सुरक्षित और विशेष इंटरनेट डोमेन को अनिवार्य किया है। अब सभी बैंकों की आधिकारिक वेबसाइट इसी डोमेन पर आधारित होगी, जिससे फर्जी वेबसाइट बनाकर धोखाधड़ी करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
आरबीआई के अनुसार, इस पहल से उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ेगा, डिजिटल पेमेंट से जुड़े धोखाधड़ी के मामलों में कमी आएगी और वित्तीय प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाया जा सकेगा।
आसान शब्दों में कहें तो जब भी कोई ग्राहक अपने बैंक की वेबसाइट खोलेगा और उसके अंत में .बैंक.इन देखेगा, तो वह सुनिश्चित कर सकेगा कि यह असली और सुरक्षित वेबसाइट है। यह पहल ग्राहकों के भरोसे को बढ़ाने के साथ-साथ डिजिटल पेमेंट से जुड़े जोखिम को काफी हद तक कम करेगी।
डिजिटलीकरण ने बैंकिंग और निवेश के तरीके पूरी तरह बदल दिए हैं। आज लेन-देन से लेकर निवेश तक सब कुछ रियल-टाइम में हो रहा है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराधों में भी तेजी आई है। खासकर भारत जैसे उभरते देश में, जहां डिजिटल माध्यम वित्तीय समावेशन का बड़ा जरिया है, वहां साइबर सुरक्षा बेहद जरूरी हो जाती है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए आरबीआई ने .बैंक.इन डोमेन को लागू किया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम साइबर अपराधियों के लिए बड़ी बाधा साबित होगा और फर्जी वेबसाइटों के जरिए होने वाले फ्रॉड पर प्रभावी रोक लगेगी।
इस पहल को सफल बनाने में भारत सरकार, नेशनल इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनआईएक्सआई), इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड रिसर्च इन बैंकिंग टेक्नोलॉजी (आईडीआरबीटी) और देश के विभिन्न बैंकों ने मिलकर काम किया है। यह सामूहिक प्रयास भारत को डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाई पर ले जा रहा है।
.बैंक.इन डोमेन के लागू होने से ग्राहकों को सुरक्षित बैंकिंग अनुभव मिलेगा, जिससे न केवल ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में कमी आएगी, बल्कि बैंकिंग सिस्टम पर लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा। अब ग्राहकों के लिए असली और नकली वेबसाइट में अंतर करना आसान हो जाएगा।
इस पहल के जरिए भारत ने न सिर्फ साइबर सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक मिसाल पेश की है। यह अवॉर्ड केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि भारत के मजबूत और सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग सिस्टम की अंतरराष्ट्रीय पहचान है। आने वाले समय में इससे वित्तीय स्थिरता और मजबूत होगी और डिजिटल लेन-देन पहले से ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बन सकेगा।
इस सम्मान के साथ आरबीआई की यह पहल वैश्विक स्तर पर भी एक उदाहरण बनकर उभरी है, जो डिजिटल सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
बैंक अकाउंट्स अब वित्तीय सुरक्षा नहीं, तनाव दे रहे हैं: राघव चड्ढा
नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने मंगलवार को संसद के उच्च सदन में न्यूनतम खाता शेष पर लगने वाले जुर्माने का मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से छोटे बैंक खातों पर इस तरह के शुल्क समाप्त करने का आग्रह करते हुए कहा कि ये शुल्क गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर असमान रूप से असर डालते हैं।
राज्यसभा में चड्ढा ने कहा कि पिछले तीन सालों में बैंकों ने उन ग्राहकों से जुर्माने के तौर पर लगभग 19 हजार करोड़ रुपए जमा किए हैं, जो अपने बैंक खातों में जरूरी न्यूनतम बैलेंस बनाए रखने में नाकाम रहे। इस कुल रकम में से पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने लगभग 8 हजार करोड़ वसूले, जबकि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने इस दौरान लगभग 11 हजार करोड़ रुपए वसूले।
चड्ढा ने कहा कि ये जुर्माने अमीरों या बड़े कर्जदारों से नहीं वसूले जाते। ये सिस्टम के सबसे गरीब खातों से वसूले जाते हैं। उन्होंने बताया कि कई आम नागरिकों, जिनमें किसान, पेंशनभोगी और दिहाड़ी मजदूर शामिल हैं, पर सिर्फ इसलिए जुर्माना लगाया जा रहा है क्योंकि वे तय न्यूनतम बैलेंस बनाए नहीं रख पाए।
उन्होंने कहा कि एक किसान न्यूनतम बैलेंस बनाए नहीं रख पाता - जुर्माना। एक पेंशनभोगी दवाइयों के लिए पैसे निकालता है - जुर्माना। एक दिहाड़ी मजदूर के खाते में कुछ सौ रुपए कम पड़ जाते हैं - जुर्माना।
राज्यसभा सांसद के अनुसार, ऐसी प्रथाएं फाइनेंशियल इंक्लूजन (वित्तीय समावेशन) के मूल मकसद को ही खत्म कर देती हैं और लोगों को औपचारिक बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित करती हैं। चड्ढा ने आगे कहा कि गरीब लोग सुरक्षा के लिए बैंकों में पैसे रखते हैं, न कि गरीब होने की वजह से चुपचाप जुर्माना भरने के लिए।
उन्होंने कहा कि बार-बार लगने वाले बैंक शुल्कों की वजह से कई बार खातों का बैलेंस नेगेटिव में चला जाता है, जिससे ग्राहकों को जुर्माने के तौर पर अपनी जमा की गई मूल रकम से भी ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार बैंक लगातार शुल्क जोड़ते रहते हैं और बैलेंस नेगेटिव हो जाता है। कभी-कभी वे शुल्कों के नाम पर हमसे हमारी जमा की गई असल रकम से भी ज्यादा पैसे वसूल लेते हैं।
चड्ढा ने कहा कि बैंक खातों का मकसद नागरिकों को फाइनेंशियल सुरक्षा देना होता है, लेकिन कई मामलों में वे फाइनेंशियल तनाव का जरिया बनते जा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, फाइनेंशियल इंक्लूजन का मकसद छोटी बचत की सुरक्षा करना होना चाहिए, न कि कम बैलेंस होने पर लोगों को सजा देना। बैंक खातों का मकसद हमें फाइनेंशियल सुरक्षा देना है, लेकिन आजकल वे कई लोगों को फाइनेंशियल सुरक्षा देने के बजाय फाइनेंशियल तनाव दे रहे हैं।
आप नेता ने संसद में यह प्रस्ताव रखा है कि न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को खत्म कर दिया जाना चाहिए, ताकि बैंकिंग सिस्टम लोगों से उनकी गरीबी के लिए पैसे वसूलना बंद कर दे।
--आईएएनएस
पीएसके
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