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बैंक अकाउंट्स अब वित्तीय सुरक्षा नहीं, तनाव दे रहे हैं: राघव चड्ढा

नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने मंगलवार को संसद के उच्च सदन में न्यूनतम खाता शेष पर लगने वाले जुर्माने का मुद्दा उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से छोटे बैंक खातों पर इस तरह के शुल्क समाप्त करने का आग्रह करते हुए कहा कि ये शुल्क गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर असमान रूप से असर डालते हैं।

राज्यसभा में चड्ढा ने कहा कि पिछले तीन सालों में बैंकों ने उन ग्राहकों से जुर्माने के तौर पर लगभग 19 हजार करोड़ रुपए जमा किए हैं, जो अपने बैंक खातों में जरूरी न्यूनतम बैलेंस बनाए रखने में नाकाम रहे। इस कुल रकम में से पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने लगभग 8 हजार करोड़ वसूले, जबकि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने इस दौरान लगभग 11 हजार करोड़ रुपए वसूले।

चड्ढा ने कहा कि ये जुर्माने अमीरों या बड़े कर्जदारों से नहीं वसूले जाते। ये सिस्टम के सबसे गरीब खातों से वसूले जाते हैं। उन्होंने बताया कि कई आम नागरिकों, जिनमें किसान, पेंशनभोगी और दिहाड़ी मजदूर शामिल हैं, पर सिर्फ इसलिए जुर्माना लगाया जा रहा है क्योंकि वे तय न्यूनतम बैलेंस बनाए नहीं रख पाए।

उन्होंने कहा कि एक किसान न्यूनतम बैलेंस बनाए नहीं रख पाता - जुर्माना। एक पेंशनभोगी दवाइयों के लिए पैसे निकालता है - जुर्माना। एक दिहाड़ी मजदूर के खाते में कुछ सौ रुपए कम पड़ जाते हैं - जुर्माना।

राज्यसभा सांसद के अनुसार, ऐसी प्रथाएं फाइनेंशियल इंक्लूजन (वित्तीय समावेशन) के मूल मकसद को ही खत्म कर देती हैं और लोगों को औपचारिक बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित करती हैं। चड्ढा ने आगे कहा कि गरीब लोग सुरक्षा के लिए बैंकों में पैसे रखते हैं, न कि गरीब होने की वजह से चुपचाप जुर्माना भरने के लिए।

उन्होंने कहा कि बार-बार लगने वाले बैंक शुल्कों की वजह से कई बार खातों का बैलेंस नेगेटिव में चला जाता है, जिससे ग्राहकों को जुर्माने के तौर पर अपनी जमा की गई मूल रकम से भी ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार बैंक लगातार शुल्क जोड़ते रहते हैं और बैलेंस नेगेटिव हो जाता है। कभी-कभी वे शुल्कों के नाम पर हमसे हमारी जमा की गई असल रकम से भी ज्यादा पैसे वसूल लेते हैं।

चड्ढा ने कहा कि बैंक खातों का मकसद नागरिकों को फाइनेंशियल सुरक्षा देना होता है, लेकिन कई मामलों में वे फाइनेंशियल तनाव का जरिया बनते जा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, फाइनेंशियल इंक्लूजन का मकसद छोटी बचत की सुरक्षा करना होना चाहिए, न कि कम बैलेंस होने पर लोगों को सजा देना। बैंक खातों का मकसद हमें फाइनेंशियल सुरक्षा देना है, लेकिन आजकल वे कई लोगों को फाइनेंशियल सुरक्षा देने के बजाय फाइनेंशियल तनाव दे रहे हैं।

आप नेता ने संसद में यह प्रस्ताव रखा है कि न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को खत्म कर दिया जाना चाहिए, ताकि बैंकिंग सिस्टम लोगों से उनकी गरीबी के लिए पैसे वसूलना बंद कर दे।

--आईएएनएस

पीएसके

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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पाकिस्तान में बाल शोषण के मामले बढ़े, 2025 में आठ प्रत‍िशत उछाल : र‍िपोर्ट

इस्लामाबाद, 17 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तान में बाल शोषण के मामलों में 2025 में आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई और कुल 3,630 मामले दर्ज किए गए। यह जानकारी बाल संरक्षण संगठन साहिल की रिपोर्ट के हवाले से स्थानीय मीडिया ने दी।

पाकिस्तान टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्ष पाकिस्तान में औसतन हर दिन नौ से अधिक बच्चे शोषण का शिकार हुए। संगठन की ओर से एकत्र किए गए आंकड़े बताते हैं कि बाल शोषण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मौजूद चुनौतियों को दिखाती है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जेंडर आधारित हिंसा (जीबीवी) के मामलों में भी 2025 में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह दर्शाता है कि बच्चों और कमजोर वर्गों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए और अधिक कदम उठाने की जरूरत है।

पाकिस्तान टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन लगातार पाकिस्तान में बाल शोषण के मामलों की निगरानी और उनकी र‍िपोर्ट करता रहा है। साथ ही बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले सांसदों और संबंधित पक्षों के साथ महत्वपूर्ण जानकारियां भी साझा करता रहा है। ताजा आंकड़े बच्चों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने के लिए अधिक प्रयासों की आवश्यकता को उजागर करते हैं।

फरवरी में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की एक बेहद परेशान करने वाली सच्चाई को उजागर किया। इस प्रांत में सैकड़ों बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार हुआ है। संगठन ने यह भी बताया कि मामले दर्ज होने और संदिग्धों की पहचान हो जाने के बावजूद पीड़ितों को अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है।

वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी के अनुसार, 2025 के आधिकारिक आंकड़ों में फैसलाबाद जिले के 45 पुलिस थानों में 663 यौन शोषण के मामले दर्ज किए गए, जिनमें लगभग 989 संदिग्ध शामिल थे। इतने बड़े स्तर के बावजूद 2025 में दर्ज मामलों में एक भी आरोपी को अब तक सजा नहीं मिली है। यह केवल कानूनी विफलता ही नहीं, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक त्रासदी भी है।

वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी के अनुसार, जनवरी में भी यह स्थिति जारी रही, जहां 57 बाल यौन शोषण के मामले सामने आए और 76 संदिग्धों की पहचान हुई, जबकि 23 मामले अभी भी जांच के अधीन हैं।

समूह ने कहा कि पाकिस्तान की सरकार इन मामलों से प्रभावी तरीके से निपटने में संघर्ष कर रही है। दोषसिद्धि की कमी से न्याय प्रणाली की गंभीर खामियां उजागर होती हैं।

कमजोर जांच, सबूतों का सही संग्रह न होना, मामलों में देरी और अदालतों में लंबित मामलों की वजह से अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती। साथ ही पीड़ितों को पर्याप्त सुरक्षा और मानसिक सहायता भी नहीं मिलती और जिम्मेदारी तय करने में भी कमी रहती है।

जब मामलों को ठीक से नहीं संभाला जाता तो अपराधी आजाद रहते हैं और पीड़ित उम्मीद खो देते हैं। 663 मामलों के पीछे असली बच्चे डरे हुए परिवार और न्याय का इंतजार करते लोग हैं। देरी से मिला न्याय भी एक तरह की क्रूरता बन जाता है।

--आईएएनएस

एवाई/एबीएम

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