भगवान कार्तिकेय को क्यों मिला छह सिर वाला रूप? जानिए षडानन बनने की पौराणिक कथा
Lord Kartikeya six heads story: शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, जब तारकासुर नामक असुर के अत्याचारों से तीनों लोक त्राहिमाम कर रहे थे, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ रहा था। ब्रह्मा जी ने वरदान दिया था कि तारकासुर का वध केवल भगवान शिव के तेज (पुत्र) द्वारा ही संभव है। इसके बाद देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव और माता पार्वती के तेज से छह दिव्य ऊर्जा पुंज प्रकट हुए, जिन्हें अग्निदेव ने गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया।
गंगा के तट पर सरकंडों के वन में छह अत्यंत सुंदर बालकों का जन्म हुआ। ये सभी बालक भगवान कार्तिकेय (स्कंद कुमार) के विभिन्न रूप थे। देवताओं के संकट को दूर करने के लिए भगवान शिव के इन अंशों ने देवताओं के सेनापति का पदभार संभाला और राक्षसों का संहार करने के लिए आगे आए।
जब छह माताओं ने एक साथ किया स्तनपान
जब वे छह बालक सरकंडों के वन में प्रकट हुए, तो उस समय वहां छह कृतिकाएं (नक्षत्रों की देवियां—अन्वा, अरुणभ्र, संभृति, कंजला, एकयष्टि और दिती) वहां पहुंचीं। उन सभी देवियों के मन में बालकों को देखते ही वात्सल्य उमड़ पड़ा। हर एक देवी चाहती थी कि वह उस बालक को अपना दूध पिलाए।
लेकिन बालक तो एक ही शक्ति के छह अलग-अलग रूप थे, और हर देवी उस सुंदर बालक को अपनी गोद में लेकर दुलारना चाहती थी। बालक कार्तिकेय समझ गए कि यदि उन्होंने किसी एक को चुना तो बाकी माताएं निराश हो जाएंगी।
षडानन बनने की पावन घटना
अपनी इसी दिव्य लीला के तहत, बाल रूप में ही भगवान कार्तिकेय ने अपने शरीर का विस्तार किया और उनके छह सिर (मुख) प्रकट हो गए। एक साथ छह मुख हो जाने के कारण वे सभी छह माताओं (कृतिकाओं) का स्तनपान एक ही समय पर करने लगे।
बालक के इस अद्भुत और चमत्कारी रूप को देखकर सभी देवियां अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने प्रेम से उन्हें अपने आंचल में समेट लिया। चूंकि उनके छह मुख थे, इसलिए उन्हें 'षडानन' (छह मुख वाले) कहा जाने लगा और कृतिकाओं द्वारा पाले जाने के कारण उनका एक नाम 'कार्तिकेय' भी प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर इन्हीं छह मुखों की मदद से उन्होंने अपनी सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर का वध कर देवताओं को उनका अधिकार दिलाया।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा स्कंद पुराण और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म की पावन कथाओं और उनके आध्यात्मिक अर्थों की जानकारी पहुंचाना है।
गणेश जी का जन्म: माता पार्वती ने कैसे रची थी अपने पुत्र की रचना?
Lord Ganesha birth story: शिव पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती कैलाश पर्वत पर स्नान करने जा रही थीं। स्नान के दौरान कोई भी उनके कक्ष में बिना अनुमति के प्रवेश न करे, इसके लिए उन्होंने अपने उबटन (चंदन और हल्दी के लेप) से एक अत्यंत सुंदर और बलवान बालक की आकृति बनाई और उसमें अपने दिव्य प्राण फूंक दिए। इस तरह प्रथम पूज्य भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
माता पार्वती ने उस बालक को अपना द्वारपाल नियुक्त करते हुए आदेश दिया कि, "पुत्र! मैं स्नान कर रही हूं, तुम द्वार पर पहरा दो और मेरी अनुमति के बिना किसी को भी अंदर मत आने देना।" बालक ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए पूरी निष्ठा से द्वार संभाल लिया।
शिवजी का आगमन और गणेश जी का विरोध
कुछ ही देर में भगवान शिव वहां पहुंचे और सीधे माता पार्वती के कक्ष की ओर जाने लगे। तभी उस नन्हे बालक ने महादेव को रास्ते में ही रोक दिया और आदरपूर्वक कहा, "रुके रहिए! मेरी माता के आदेश के बिना आप अंदर नहीं जा सकते।"
भगवान शिव हैरान रह गए कि कैलाश पर उन्हें रोकने वाला यह बालक कौन है। शिवजी के गणों (नंदी और अन्य) ने बालक को समझाने की कोशिश की कि वे स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी शिव हैं, लेकिन बालक अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने महादेव को भी अंदर जाने से मना कर दिया।
क्रोधित शिव और गणेश जी का मस्तक कट जाना
शिवजी को उस बालक की यह दुष्टता और आज्ञाकारिता दोनों का आभास हुआ, लेकिन उनके गणों को बालक का यह दुस्साहस बहुत बुरा लगा। क्रोध में आकर शिवगणों और उस नन्हे बालक के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अंत में, भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उस बालक का मस्तक उसके धड़ से अलग कर दिया।
जब माता पार्वती ने कक्ष से बाहर आकर यह दृश्य देखा, तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उनका विलाप देखकर संपूर्ण ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। माता के इस रूप को शांत करने और अपनी भूल सुधारने के लिए भगवान शिव ने तुरंत अपने गणों को उत्तर दिशा की ओर भेजा और आदेश दिया कि जो भी जीव सबसे पहले मिले, उसका सिर काटकर ले आएं।
हाथी का सिर और प्रथम पूज्य का वरदान
गण उत्तर दिशा में गए और उन्हें सबसे पहले एक हथिनी का शिशु मिला जो अपनी मां की तरफ पीठ करके लेटा हुआ था। वे उसका सिर काटकर ले आए। भगवान शिव ने तुरंत अपनी दिव्य शक्ति से वह हाथी का सिर बालक के धड़ पर रख दिया और उसमें प्राण फूंक दिए।
इस प्रकार बालक गणेश का पुनर्जन्म हुआ। माता पार्वती अपने पुत्र को जीवित देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। इसके बाद सभी देवताओं ने बालक गणेश को आशीर्वाद दिया और भगवान शिव ने वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य या पूजा की शुरुआत में सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा की जाएगी, जिससे वे 'प्रथमे पूज्य' कहलाए।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा शिव पुराण और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म की पावन कथाओं और उनके सांस्कृतिक महत्व को पहुंचाना है।
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