PM मोदी को गाली देने पर नाराज हुईं भूमि पेडनेकर:बोलीं- यह हमारी संस्कृति नहीं; प्रदर्शनकारियों को मुकेश खन्ना ने कहा 'कॉकरोच'
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा पर अभिनेत्री भूमि पेडनेकर ने कड़ा एतराज जताया है। भूमि ने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो जारी कर कहा कि देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ ऐसी भाषा का इस्तेमाल बिल्कुल गलत है। NEET पेपर लीक विवाद को लेकर जारी इस प्रदर्शन में नारेबाजी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भूमि पेडनेकर, अभिनेता मुकेश खन्ना और सांसद कंगना रनोट समेत कई बड़ी हस्तियों की प्रतिक्रिया सामने आई है। यह हमारी संस्कृति नहीं, युवाओं को संयम बरतने की जरूरत भूमि पेडनेकर ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाने का हक सभी को है, लेकिन अपनी बात रखने का तरीका सही होना चाहिए। उन्होंने कहा, "सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हमारे देश के युवा कर रहे हैं, वह बेहद चिंताजनक है। हम अपने देश के सबसे ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हैं। क्या हम अपने घर के बड़ों से कभी इस तरह बात करते हैं?" भूमि ने जेन-जी (Gen Z) से देश की संस्कृति और संवाद की परंपरा का सम्मान करने की अपील की। मुकेश खन्ना ने प्रदर्शनकारियों को बताया ‘कॉकरोच’ अभिनेता मुकेश खन्ना ने भी इस मुद्दे पर इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट कर प्रदर्शनकारियों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने प्रदर्शन का समर्थन करने वालों को 'कॉकरोच' बताते हुए देश से बाहर फेंकने की बात कही। मुकेश खन्ना ने आरोप लगाया कि यह प्रदर्शन असली छात्रों का नहीं है, बल्कि सरकार को अस्थिर करने के अजेंडे के तहत छात्रों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने छात्रों को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियों में शामिल होने से भविष्य में नौकरी और वीजा मिलने में परेशानी हो सकती है, इसलिए वे समय रहते इससे दूर हो जाएं। NEET पेपर लीक से शुरू हुआ विवाद पूरा मामला NEET-UG 2026 परीक्षा के पेपर लीक होने की घटना के बाद शुरू हुआ। इसके विरोध में छात्रों और राजनीतिक संगठनों ने प्रदर्शन शुरू किए थे। हालांकि, प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाकर्मियों और राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ कथित तौर पर इस्तेमाल की गई आपत्तिजनक भाषा के बाद यह मामला देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। जहां एक तरफ छात्र निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शन के तरीकों पर बॉलीवुड हस्तियों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। ये खबर भी पढ़ें काला चश्मा पहनकर पूजा करने पर ट्रोल हुईं भूमि पेडनेकर:सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने पहुंची; गॉगल्स ना उतारने पर नाराज हुए लोग अभिनेत्री भूमि पेडनेकर अपने एक मंदिर दौरे के वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोल्स के निशाने पर आ गई हैं। सावन महीने की शुरुआत पर भूमि एक शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करने और शिवलिंग पर जल चढ़ाने पहुंची थीं। इस दौरान उनके काले चश्मे (सनग्लासेज) पहनने पर सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाए हैं। पूरी खबर पढ़ें
लहर-लहर:खदानें, इमारतें, कारखाने नहीं... मुल्क की सबसे बड़ी दौलत नौजवान होते हैं
जब मैंने काम शुरू किया, तब मैं अपने से बड़ों के बीच था। मैंने सिप्पी फिल्म्स जॉइन की थी। रमेश सिप्पी साहब की ‘अंदाज’ बन रही थी। उस वक्त मेरी उम्र पच्चीस साल थी और रमेश जी छब्बीस के थे। लेकिन हमारे आसपास लगभग सभी हमसे उम्र में बड़े थे। उनसे हमने सीखा, उन्हें देखा, उनकी बातें सुनीं। फिर वक्त बदला। धीरे-धीरे हमारी उम्र के लोग इंडस्ट्री में आए। उसके बाद हमसे कम उम्र के लोग आने लगे। और आज जिन लोगों के साथ मैं काम करता हूं, उनमें से कई तो मेरे पोती-पोतों की उम्र के हैं। लोग अक्सर पूछते हैं कि इतने साल बाद भी आप अपने आपको प्रासंगिक कैसे बनाए हुए हैं। इसका कोई फॉर्मूला नहीं है, कोई जादू नहीं है। बस एक बात है- अगर आपके भीतर यह विनम्रता बची हुई है कि आप नई पीढ़ी की बात सुन सकें, उनसे सीख सकें और यह मान सकें कि दुनिया बदल रही है, तभी आप समय के साथ चल सकते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि आदमी यह मान बैठे कि ‘मुझे सब पता है।’ जिस दिन आपको यह यकीन हो जाए कि ‘मैं ही सबसे ज्यादा जानता हूं’, उसी दिन आपकी सीखने की उम्र खत्म हो जाती है। अगर आप यह समझने लगें कि आपसे छोटों को दुनिया की कोई समझ नहीं है और बड़े भी आपसे ज्यादा नहीं जानते थे, तो आप अपने चारों तरफ दीवार खड़ी कर लेते हैं। आप तभी प्रासंगिक बने रह सकते हैं जब आपके भीतर इतनी विनम्रता हो कि यह स्वीकार कर सकें कि दुनिया बदल रही है। अगर आप नौजवानों की बात सुन सकते हैं, उनसे सीखने के लिए तैयार हैं और उन्हें समझने की कोशिश करते हैं, तो आप कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। किसी भी मुल्क की सबसे बड़ी दौलत उसकी खदानें, इमारतें या कारखाने नहीं होते; उसके नौजवान होते हैं। अगर नौजवानों के पास खुला दिमाग है, नई बातें सीखने की बेचैनी है और दुनिया को बेहतर बनाने का जज्बा है, तो उस देश का भविष्य सुरक्षित है। हमें नई पीढ़ी का सम्मान करना होगा। सच तो यह है कि हम इस दुनिया में ठहरने की अपनी बारी से कुछ ज्यादा ही ‘ठहर गए’ हैं; यह दुनिया असल में नई जेनरेशन की है। हां, यह भी सच है कि कुछ बातें अनुभव ने हमें सिखाई हैं, जो उन्हें अभी नहीं मालूम हैं, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि आज की दुनिया के बारे में बहुत-सी बातें वे जानते हैं, जिनकी हमें पूरी खबर नहीं। अगर दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे से सीखने के लिए तैयार हों, तभी दोनों आगे बढ़ेंगे। हर नई पीढ़ी अपने साथ कुछ नया लेकर आती है। वह अपने बड़ों से कुछ सीखती है, लेकिन उनकी गलतियों को दोहराने के लिए पैदा नहीं होती। उसका काम है उनसे आगे जाना। अगर हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से ज्यादा समझदार, संवेदनशील और आजाद न बने, तो तरक्की का मतलब ही क्या रह जाएगा? एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि लोग सुनते नहीं हैं, यानी जब आप बात कर रहे हैं तो मैं सुन नहीं रहा हूं, मैं ‘वेट’ कर रहा हूं कि जब ये चुप हों तो मैं अपनी बात कहूं। तो हम ‘वेटिंग टु टॉक’ हैं, ‘वेटिंग टु लिसनिंग’ नहीं। लेकिन वो एक बात है न कि- हमीं हम हैं तो क्या हम हैं, तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो। तो दूसरे के भी ‘पॉइंट ऑफ व्यू’ को देखो। इतना सेल्फ सेंटर्ड एट्टिट्यूड और सेल्फिशनेस होगी तो दुनिया गड़बड़ हो जाएगी। मैं नौजवानों से हमेशा यही कहता हूं- दुनिया को अपनी आंखों से देखिए और उन लोगों की बात भी सुनिए जो आपसे अलग सोचते हैं। किसी बात को सिर्फ इसलिए सच मत मान लीजिए कि उसे बहुत लोग मानते हैं और किसी नए खयाल को सिर्फ इसलिए खारिज मत कर दीजिए कि वह नया है। मैं यह नहीं कहता कि हर पुरानी बात गलत है। मेरा सिर्फ इतना कहना है कि हर विचार- चाहे वह कितना ही पुराना क्यों न हो- तर्क और प्रमाण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। जो बात सही होगी, वह और मजबूत होकर सामने आएगी; जो गलत होगी, उसे बदल देना चाहिए। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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