फेसबुक और इंस्टाग्राम की पेरेंट कंपनी मेटा एक बार फिर बड़े स्तर पर छंटनी की तैयारी में है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी अपने ग्लोबल वर्कफोर्स में से 20% कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा सकती है। मेटा के पास 31 दिसंबर 2025 तक लगभग 79,000 कर्मचारी थे, इस हिसाब से करीब 15,000 से ज्यादा लोगों की नौकरी जा सकती है। कंपनी यह कदम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बढ़ रहे अरबों डॉलर के खर्च और डेटा सेंटर्स की लागत को मैनेज करने के लिए उठा रही है। हालांकि, मेटा के प्रवक्ता एंडी स्टोन ने इन खबरों को 'काल्पनिक' बताते हुए फिलहाल किसी भी छंटनी से इनकार किया है। AI में निवेश की भरपाई के लिए छंटनी का प्लान
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेटा ने अपने 'सुपरइंटेलिजेंस लैब्स' (MSL) में नई प्रतिभाओं को लाने के लिए भारी निवेश किया है। कंपनी ने हाल ही में अलेक्जेंडर वांग के स्टार्टअप 'स्केल एआई' को 14.5 बिलियन डॉलर (करीब 1.21 लाख करोड़ रुपए) में खरीदा है। इसके अलावा, मेटा ने 2028 तक एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर 600 बिलियन डॉलर (लगभग 50 लाख करोड़ रुपए) खर्च करने का लक्ष्य रखा है। इसी भारी भरकम खर्च की भरपाई करने के लिए कंपनी वर्कफोर्स कम करने पर विचार कर रही है। जुकरबर्ग बोले- अब बड़े काम के लिए बड़ी टीम की जरूरत नहीं
मार्क जुकरबर्ग ने पहले ही संकेत दिया था कि एआई ने प्रोडक्टिविटी को आसान बना दिया है। उन्होंने इसी साल जनवरी में कहा था कि जो प्रोजेक्ट पहले बड़ी टीमों के जरिए पूरे किए जाते थे, वे अब एआई की मदद से एक सिंगल टैलेंटेड व्यक्ति द्वारा पूरे किए जा सकते हैं। मेटा की अब तक की सबसे बड़ी छंटनी हो सकती है
अगर कंपनी 20% कर्मचारियों को निकालती है, तो यह मेटा के इतिहास की सबसे बड़ी छंटनी होगी। इससे पहले नवंबर 2022 में कंपनी ने 11,000 लोगों को निकाला था। इसके ठीक चार महीने बाद मार्च 2023 में 10,000 और कर्मचारियों की छुट्टी की गई थी। मेटा में अभी 79 हजार कर्मचारी एआई रेस में पिछड़ रही है कंपनी, नए मॉडल में देरी
यह खबर तब आई है जब रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि मेटा एआई की रेस में पिछड़ रही है। मेटा का अपकमिंग टेक्स्ट-बेस्ड मॉडल 'एवोकाडो' इंटरनल टेस्ट में फेल होने के कारण डिले हो गया है। यह मेटा सुपरइंटेलिजेंस लैब द्वारा बनाया गया पहला मॉडल है। इसकी भरपाई के लिए कंपनी चीनी एआई स्टार्टअप 'मेनस' (Manus) को 2 बिलियन डॉलर में खरीदने की तैयारी में है। साथ ही 'मोल्टबुक' जैसे एआई प्लेटफॉर्म्स पर भी दांव लगा रही है। अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां भी निकाल चुकी हैं स्टाफ
सिर्फ मेटा ही नहीं, एआई पर खर्च बढ़ाने के लिए कई अन्य टेक दिग्गज भी छंटनी कर चुके हैं। इसी साल जनवरी में अमेजन ने करीब 16,000 कर्मचारियों (1% वर्कफोर्स) को निकाला था। सास (SaaS) दिग्गज एटलसियन ने भी एआई पर खर्च के लिए 1,600 लोगों की छुट्टी की। माइक्रोसॉफ्ट, एक्सेंचर और टीसीएस जैसी कंपनियां भी एआई में बदलाव के बीच अपने वर्कफोर्स को रिस्ट्रक्चर कर रही हैं।
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ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक कूटनीति में एक अजीब विरोधाभास पैदा कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शनिवार को वॉशिंगटन पर तीखा हमला बोलते हुए उसे 'पाखंडी' करार दिया। अराघची का दावा है कि जो अमेरिका कल तक भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव बना रहा था, आज वही युद्ध के कारण तेल संकट गहराते ही दुनिया के सामने रूसी तेल खरीदने के लिए गिड़गिड़ा रहा है।
अराघची ने 'X' (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट के ज़रिए अमेरिका की आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि वॉशिंगटन ने महीनों तक भारत पर दबाव डाला कि वह रूसी तेल का आयात बंद कर दे, लेकिन अब जब ईरान के साथ संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में तनाव बढ़ गया है, तो वह देशों को वही तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। अराघची ने 'X' पर लिखा, "अमेरिका ने महीनों तक भारत को धमकाकर रूस से तेल का आयात बंद करवाने की कोशिश की।" उन्होंने आगे लिखा, "ईरान के साथ दो हफ़्ते के युद्ध के बाद, अब व्हाइट हाउस पूरी दुनिया—जिसमें भारत भी शामिल है—से रूसी कच्चा तेल खरीदने की गुहार लगा रहा है।"
अराघची ने यूरोपीय सरकारों पर भी आरोप लगाया कि वे रूस के ख़िलाफ़ अमेरिकी समर्थन हासिल करने की उम्मीद में, ईरान के ख़िलाफ़ छेड़े गए एक "अवैध युद्ध" का समर्थन कर रही हैं।
उन्होंने कहा, "यूरोप को लगा था कि ईरान के ख़िलाफ़ अवैध युद्ध का समर्थन करने से उन्हें रूस के ख़िलाफ़ अमेरिका का समर्थन मिल जाएगा। यह बेहद दयनीय है।"
ईरान के विदेश मंत्री ने ये टिप्पणियाँ 'फाइनेंशियल टाइम्स' की एक ख़बर के साथ पोस्ट कीं। इस ख़बर में बताया गया था कि तेल की बढ़ती क़ीमतों से रूस को राजस्व में भारी बढ़ोतरी हो रही है।
उनकी ये टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं, जब गुरुवार को ट्रंप प्रशासन ने 30 दिनों की एक छूट (waiver) की घोषणा की। इस छूट के तहत, विभिन्न देश समुद्र में फँसे हुए उन रूसी तेल के जहाज़ों से तेल खरीद सकते हैं, जिन पर पहले प्रतिबंध लगाए गए थे। इस क़दम का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को स्थिर करना है, क्योंकि मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की क़ीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई थीं।
यह छूट तब दी गई, जब युद्ध के कारण आपूर्ति में आई बाधाओं और ईरान द्वारा 'होरमुज़ जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz)—जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है—को बंद कर देने के कारण कच्चे तेल की बेंचमार्क क़ीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई थीं।
अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार, यह अस्थायी लाइसेंस 12 मार्च तक जहाज़ों पर लादे जा चुके रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की डिलीवरी और बिक्री की अनुमति देता है। यह अनुमति 11 अप्रैल को वॉशिंगटन के स्थानीय समय अनुसार आधी रात तक प्रभावी रहेगी।
यह क़दम 5 मार्च को जारी की गई 30 दिनों की एक अन्य छूट के बाद उठाया गया है। उस छूट के तहत भारत को समुद्र में फँसे हुए रूसी तेल के जहाज़ों से तेल खरीदने की अनुमति दी गई थी, जिससे आयातकों को मौजूदा संकट के दौरान आपूर्ति सुनिश्चित करने में कुछ हद तक लचीलापन मिल सका था। US के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह कदम "बहुत सोच-समझकर उठाया गया" और अस्थायी है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इसे बाज़ारों को स्थिर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और इससे मॉस्को को कोई खास आर्थिक फ़ायदा नहीं होगा।
ईरान ने भारतीय जहाज़ों को सुरक्षित रास्ता दिया
संघर्ष के बावजूद, ईरान ने भारत के झंडे वाले दो लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) कैरियर को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने की इजाज़त दे दी है। रॉयटर्स ने इस मामले की सीधी जानकारी रखने वाले चार सूत्रों के हवाले से यह रिपोर्ट दी है।
भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली ने कहा कि तेहरान इस रणनीतिक जलमार्ग से भारत जाने वाले जहाज़ों के लिए सुरक्षित रास्ते को सुनिश्चित करेगा।
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय जहाज़ों को सुरक्षित गुज़रने की इजाज़त दी जाएगी, तो फथाली ने कहा, "हाँ, क्योंकि भारत और ईरान दोस्त हैं।" उन्होंने आगे कहा, "हमारे हित एक जैसे हैं; हमारी किस्मत एक जैसी है।" राजदूत की ये टिप्पणियाँ उनके उस संकेत के कुछ ही घंटों बाद आईं, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत जाने वाले जहाज़ों को दो से तीन घंटों के भीतर इस जलडमरूमध्य से सुरक्षित रास्ता मिल सकता है। यह व्यापक क्षेत्रीय उथल-पुथल के बावजूद तेहरान और नई दिल्ली के बीच लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को रेखांकित करता है।
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