Donald Trump युद्ध और चुनाव दोनों हार चुके हैं, Iran के Mohsen Rezaee ने कसा तंज
ईरान के नेताओं और कट्टरपंथी गुटों ने अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की भारी हार के बाद वॉशिंगटन पर दबाव बढ़ा दिया है। तेहरान का कहना है कि यह सियासी झटका साफ दिखाता है कि अमेरिका पिछले 8 महीने से जारी युद्ध में अपने मकसद हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।
सबसे तीखा हमला ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी मोहसिन रजाई ने बोला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर ट्रंप प्रशासन का मजाक उड़ाते हुए लिखा, "आप युद्ध भी हार गए और चुनाव भी। वेंस ने हार मान ली है, रुबियो बाहर होने वाले हैं, हेगसेथ को हटाया जाने वाला है और सेंटकॉम कमांडर अब पॉडकास्टर बन गए हैं! तो फिर, वॉशिंगटन में हमें असल में अपना संदेश किसे देना चाहिए?" तेहरान का मानना है कि ट्रंप अब अपने ही देश में घिर चुके हैं और युद्ध रोकने के लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी होगी।
You lost the war and the election.Vance has conceded,Rubio is heading for the exit,Hegseth is about to be fired,and the CENTCOM commander is now a podcaster! So٫Who exactly in Washington do we need to get this message across to? Start a war,and you’ll face a devastating response.
— محسن رضایی (@ir_rezaee) November 7, 2026
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ट्रंप से बड़ी कीमत वसूलने की फिराक में कट्टरपंथी
अमेरिकी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की शिकस्त ने ईरानी कट्टरपंथियों को एक बड़ा मौका दे दिया है। उनका दावा है कि इस जंग में ईरान पहले ही जीत हासिल कर चुका है। ईरान के रूढ़िवादी नेता और मीडिया संस्थान सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह वॉशिंगटन के सामने बिल्कुल न झुके और ऐसा समझौता करे जिससे पूरे मिडिल ईस्ट में पावर बैलेंस बदल जाए।
सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई ने भी चुनावी नतीजों के बाद अपने रुख को कड़ा करते हुए बातचीत में शामिल ईरानी प्रतिनिधियों को "सरेंडर की तरफ जरा सा भी झुकाव न रखने" की हिदायत दी है। वहीं कट्टरपंथी मीडिया आउटलेट 'राजा न्यूज' ने लिखा, "ईरानी लोगों की उपलब्धियों को अमेरिका को आसान एग्जिट देकर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। युद्ध टालने का इकलौता तरीका अपनी ताकत बढ़ाना, अमेरिका और एनर्जी मार्केट पर दबाव बनाना और दुश्मन को पछताने पर मजबूर करना है।"
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ट्रंप और वेंस ने जंग को ठहराया हार की वजह
तेहरान की यह आक्रामकता तब सामने आई है जब खुद डोनल्ड ट्रंप और उनके वाइस प्रेसिडेंट जे.डी. वेंस ने मध्यावधि चुनावों में हार का ठीकरा इस जंग पर फोड़ा। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने माना कि पार्टी की हार में इस युद्ध की बड़ी भूमिका रही है। वहीं जे.डी. वेंस ने 'एक्स' पर दो टूक लिखा, "हमारी हार का सबसे बड़ा कारण यह युद्ध है।"
ईरान के रूढ़िवादी खेमे ने इन बयानों को हाथों-हाथ लिया है। उनका तर्क है कि जंग ने न केवल वॉशिंगटन को कोई सैन्य बढ़त नहीं दिलाई, बल्कि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए अपने देश में बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
बातचीत जारी, पर जमीनी स्तर पर फंसा पेच
आठ महीने बीत जाने के बाद भी यह संघर्ष किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका है। सैन्य मोर्चे पर जंग सुस्त पड़ चुकी है और राजनयिक कोशिशों में भी कोई बड़ा ब्रेकथ्रू नहीं मिला है। ईरानी वार्ताकार कतर की मध्यस्थता में तेहरान और दोहा के बीच लगातार चक्कर काट रहे हैं, ताकि ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम और सीजफायर पर बात बन सके।
इस बीच, अमेरिकी सेना ने ईरान के केशम आइलैंड पर हमले किए हैं, जिसमें गुरुवार रात की एयरस्ट्राइक भी शामिल है। हालांकि दोनों पक्षों ने बातचीत को पटरी पर रखने के लिए इन हमलों को ज्यादा तूल नहीं दिया। इसके बावजूद ट्रंप ने आगे और सैन्य कार्रवाई के संकेत देते हुए पत्रकारों से कहा, "हम तय कर रहे हैं कि आगे बढ़ना है या नहीं। अगर मुमकिन हुआ तो मैं बाकी देश को तबाह नहीं करना चाहूंगा, लेकिन शायद मुझे ऐसा करना पड़े। आपको जल्द ही पता चल जाएगा।"
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कतर और खाड़ी देशों की कूटनीति तेज, ईरान ने रखीं 7 शर्तें
चुनावी नतीजों के बाद खाड़ी देशों में डिप्लोमैटिक हलचल काफी तेज हो गई है। कतर के मुताबिक, ट्रंप ने अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी से फोन पर तनाव कम करने को लेकर चर्चा की है। वहीं, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, ओमान और तुर्की समेत कई देशों के विदेश मंत्रियों से संपर्क साधा है।
तेहरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को दोबारा खोलने के लिए 7 सख्त शर्तें रख दी हैं। इनमें सभी मोर्चों पर तुरंत युद्ध रोकना, जंग के नुकसान का हर्जाना देना, अमेरिकी फौजों की पूरी वापसी और सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना शामिल है। हालांकि, वॉशिंगटन इनमें से किसी भी शर्त को मानने के मूड में है या नहीं, यह अभी साफ नहीं है।
New Zealand Election: त्रिशंकु स्थिति के बीच Christopher Luxon संभालेंगे कार्यवाहक सरकार
(ग्रांट डंकन, ऑकलैंड विश्वविद्यालय) ऑकलैंड, आठ नवंबर (द कन्वरसेशन) न्यूजीलैंड के चुनाव के प्रारंभिक नतीजों से काफी अनिश्चितता पैदा हुई है, जिससे कई मतदाता निराश महसूस कर सकते हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस अनिश्चितता के दौर में राजनीतिक दलों और सरकार के कामकाज की प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश तय हैं। अंतिम नतीजे, जिनमें बड़ी संख्या में विशेष मत भी शामिल होंगे, 27 नवंबर तक घोषित नहीं होंगे।
इसके बाद किसी व्यवहार्य गठबंधन समझौते पर पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों के बीच कई सप्ताह तक बातचीत चलेगी। अब इस दौरान कार्यवाहक सरकार से जुड़े नियमों और ‘कैबिनेट मैनुअल’ के दिशानिर्देशों की भूमिका अहम हो जाती है। ‘कैबिनेट मैनुअल’ को ‘केंद्र सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया का आधिकारिक मार्गदर्शक’ माना जाता है।
आज की स्थिति में न तो वामपंथी और न ही दक्षिणपंथी खेमा कोई समझौता करने को तैयार है। विपक्षी नेता और लेबर पार्टी के क्रिस हिपकिंस ने चुनाव में हार स्वीकार नहीं की। हालांकि, वह जीत का दावा करने की स्थिति में भी नहीं थे।
निवर्तमान प्रधानमंत्री और नेशनल पार्टी के क्रिस्टोफर लक्सन ने कहा, ‘‘नेशनल पार्टी एक बार फिर संसद में सबसे बड़ी पार्टी है और हमारे पास अगली सरकार बनाने का रास्ता है।’’ व्यापक स्तर पर मतों के बंटवारे के कारण संसद में सीटों की संख्या में असंतुलन पैदा हुआ है। इसके चलते नेशनल पार्टी को लेबर पार्टी की तुलना में 3,650 वोट कम मिले हैं, लेकिन प्रारंभिक नतीजों में नेशनल पार्टी के पास 42 सीट हैं, जबकि लेबर पार्टी को 36 सीट मिली हैं। यह स्पष्ट रूप से उस आनुपातिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है, जिसके लिए मिश्रित सदस्य आनुपातिक प्रणाली (एमएमपी) बनाई गई है।’’ हालांकि, सबसे अधिक सीट जीतने वाले दल का ही अगली सरकार बनाना जरूरी नहीं है।
ऐसा 2017 में भी देखने को मिला था, जब जैसिंडा अर्डर्न की लेबर पार्टी ने ‘न्यूजीलैंड फर्स्ट’ के समर्थन से सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल कर लिया था। प्रारंभिक नतीजों के अनुसार, लक्सन के तीन दलों के गठबंधन (नेशनल, एसीटी और न्यूजीलैंड फर्स्ट) को 131 में से 67 सीट मिली हैं, जिससे उसे मामूली बहुमत हासिल हुआ। हालांकि, विशेष मतों की गिनती के बाद यह संख्या घट सकती है।
ऐसे में हिपकिंस के पास अब भी चार दलों (लेबर, ग्रीन, ते पाती माओरी और ऑपर्च्युनिटी) के गठबंधन का नेतृत्व करने का मौका है। दोनों पक्षों का मूल उद्देश्य प्रतिनिधि सभा में बहुमत का आंकड़ा हासिल करना है। फिलहाल सवाल यह है कि उस गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा और उसमें कौन-कौन से दल शामिल होंगे।
कोई सरकार तभी तक सत्ता में रहती है, जब तक उसे सदन का विश्वास प्राप्त होता है। कार्यवाहक सरकार की परंपरा के तहत निवर्तमान प्रधानमंत्री लक्सन और उनके मंत्रिमंडल के मंत्री अपने पदों पर बने रहते हैं। यह कहना सही नहीं है कि ‘सरकार नहीं है’।
गवर्नर जनरल के पास हमेशा जिम्मेदार सलाहकार होने चाहिए और रोजमर्रा का प्रशासनिक कामकाज जारी रहना चाहिए। इस अवधि के दौरान महत्वपूर्ण फैसलों को टाल दिया जायेगा या उन पर बहुत सावधानी से विचार किया जायेगा। हालांकि, यदि कोई राष्ट्रीय आपात स्थिति पैदा होती है, तो ऐसी स्थिति में कार्यवाहक सरकार आवश्यकता के अनुसार कार्रवाई जरूर करेगी।
विशेष मतों का रुझान आमतौर पर वामपंथी दलों की ओर रहता है। ऐसे में अंतिम मतगणना के बाद एक या दो सीट पर नतीजे बदल सकते हैं। गवर्नर जनरल न तो गठबंधन वार्ता में मार्गदर्शन करते हैं और न ही उसमें भाग लेते हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट हो जाने के बाद कि किन दलों को सदन का विश्वास प्राप्त है, वह नयी सरकार के मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं। नये सिरे से चुनाव कराने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। अब यह राजनीतिक दलों पर निर्भर है कि वे बहुमत जुटाएं।
कोई भी दल देश को दोबारा चुनाव में धकेलने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहेगा। यदि अंतिम नतीजों के कारण लक्सन के मौजूदा गठबंधन के पास बहुमत नहीं रहता है, तो ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऑपर्च्युनिटी पार्टी की इसमें भूमिका हो सकती है। हालांकि, ऑपर्च्युनिटी पार्टी की नीतियां वामपंथी खेमे के तीनों दलों से अधिक मेल खाती हैं।
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