West Bengal के SIR अधिकरण से जस्टिस बिस्वजीत बसु ने दिया इस्तीफा
कोलकाता, सात नवंबर कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बिस्वजीत बसु ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए पश्चिम बंगाल के एसआईआर अधिकरणों से इस्तीफा दे दिया है। एक विश्वसनीय सूत्र ने शनिवार को यह जानकारी दी। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पैनल के प्रमुख के रूप में नियुक्त किए गए 19 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से, इस्तीफा देने वाले वह चौथे न्यायाधीश हैं।
बसु का इस्तीफा, कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी एस शिवज्ञानम और सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजीत कुमार बाग तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत चटर्जी के इस्तीफों के बाद आया है। उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए, निर्वाचन आयोग ने मार्च में पश्चिम बंगाल के लिए 19 अपीलीय अधिकरण गठित किए थे। एसआईआर प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, ‘‘तार्किक विसंगतियों’’ सहित विभिन्न कारणों से पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।
ये अधिकरण उन लाखों मतदाताओं द्वारा दायर अपीलों की सुनवाई कर रहे हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के इन इस्तीफों से मुर्शिदाबाद जिले में अपीलों के निस्तारण पर असर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था। बसु के इस्तीफे ने एसआईआर अधिकरणों को लेकर अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।
सूत्र ने बताया, ‘‘बसु ने शुक्रवार को एक पत्र के माध्यम से कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को अपने फैसले की जानकारी दी।’’ निर्वाचन आयोग के अधिकारी ने बताया कि न्यायमूर्ति बसु और न्यायमूर्ति चटर्जी को मुर्शिदाबाद जिले के मामलों को संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अधिकारी ने बताया, ‘‘एक महीने के भीतर दोनों न्यायाधीशों के हट जाने से, मुर्शिदाबाद के मतदाताओं की अपीलों का निस्तारण पूरी तरह से रुक गया है। इससे लंबित मामलों का निस्तारण करने की अधिकरण की क्षमता पर सवाल खड़े हो गए हैं।’’ न्यायमूर्ति चटर्जी ने प्रतिदिन लगभग 22 किलोमीटर की दूरी तय करने में होने वाली कठिनाई का हवाला देते हुए इस्तीफा दिया था।
शुरुआत में उन्होंने यह काम इसलिए स्वीकार किया था कि उन्हें लगा था कि यह दो-तीन महीने की एक अस्थायी ज़िम्मेदारी होगी। हालांकि, लंबित मामलों की भारी संख्या को देखते हुए, अंततः उन्होंने इस काम से हटने का फैसला किया। न्यायमूर्ति बाग और न्यायमूर्ति शिवज्ञानम ने भी व्यक्तिगत और पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए अधिकरण से इस्तीफा दे दिया था।
सोनम Sonam Wangchuk ने उपराज्यपाल प्रशासन पर साधा निशाना, President Murmu से हस्तक्षेप की मांग
लेह, सात नवंबर जलवायु कार्यकर्ता एवं शिक्षाविद सोनम वांगचुक ने शनिवार को लद्दाख के उपराज्यपाल के नेतृत्व वाले प्रशासन पर उनकी और अन्य आलोचकों की सुनियोजित तरीके से छवि खराब करने का आरोप लगाया और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की। यह अपील वांगचुक से जुड़े संस्थानों के खिलाफ की गई कई प्रशासनिक कार्रवाइयों के बीच की गई है। इनमें अगस्त 2025 में हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स (एचआईएएल), लद्दाख की जमीन का पट्टा रद्द करना भी शामिल है।
लद्दाख प्रशासन ने पट्टा रद्द करने के पीछे यह वजह बताई थी कि तय समय सीमा में पट्टे के दस्तावेज तैयार नहीं किए गए और जरूरी प्रीमियम राशि भी जमा नहीं की गई। इसके अलावा, प्रशासन ने जमीन को निर्धारित उद्देश्य के अनुसार इस्तेमाल नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया था। प्रशासन ने एचआईएएल को अपने डेजर्ट फ्लावर स्कूल के संचालन से जुड़ी आगे की गतिविधियां रोकने का भी निर्देश दिया है।
इसी बीच, शनिवार को लेह की श्रम अदालत ने एचआईएएल की एक पूर्व कर्मचारी को मातृत्व लाभ का कानूनी भुगतान नहीं करने और उसके साथ अनुचित व्यवहार करने के आरोपों से जुड़े मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। वांगचुक और उनकी पत्नी तथा एचआईएएल की सह-संस्थापक एवं सीईओ गीतांजलि जे. अंगमो ने जमीन के सौदे को अंतिम रूप देने में हुई देरी के लिए नौकरशाही की अड़चनों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जमीन का पट्टा रद्द करना राजनीतिक बदले की कार्रवाई है।
उनके मुताबिक, इसका संबंध लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के अभियान से है। उन्होंने यह दावा भी किया कि लद्दाख के नेताओं की छवि खराब करने के उद्देश्य से चलाए जा रहे अभियानों में देश के संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। राष्ट्रपति को भेजी गई अपनी अपील में वांगचुक ने लद्दाख के शासन से जुड़े बड़े मुद्दे भी उठाए।
उन्होंने आरोप लगाया कि उपराज्यपाल प्रशासन के तहत लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं। उन्होंने दावा किया कि सोशल मीडिया पर केवल टिप्पणी करने या किसी पोस्ट को लाइक करने पर भी प्राथमिकी दर्ज की जा रही हैं और लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है। कई प्रशासनिक नीतियों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि जमीन, उद्योग, बिजली और पर्यटन से जुड़ी नीतियां स्थानीय लोगों के हितों के बजाय कॉरपोरेट कंपनियों के हितों को फायदा पहुंचा रही हैं।
वांगचुक ने राष्ट्रपति मुर्मू से अपील की कि वह लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश समेत सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों के लिए समान अधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और न्याय सुनिश्चित करें। वांगचुक के आरोपों पर उपराज्यपाल कार्यालय की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
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