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'अब बातचीत का समय खत्म', अरुणाचल में 11,200 मेगावाट के बांध का विरोध तेज, आंदोलनकारी ने ठुकराया सरकार का न्योता

अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है. बांध का विरोध कर रहे आंदोलनकारी काटोन मोयोंग ने राज्य सरकार की बातचीत की पेशकश ठुकरा दी है. 'अबोर मैन' के नाम से पहचाने जाने वाले मोयोंग ने साफ कहा है कि इस परियोजना पर बातचीत का समय अब निकल चुका है. वह लंबे समय से सियांग घाटी में बांध बनाने का विरोध कर रहे हैं.

इंजीनियर रह चुके काटोन मोयोंग ने हाल ही में दिल्ली में भी इस परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन किया था. इस दौरान दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। अब उन्होंने अरुणाचल प्रदेश सरकार की ओर से बातचीत के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आदि समुदाय का रुख इस परियोजना को लेकर पहले जैसा ही है और वह बांध का विरोध जारी रखेगा.

क्या है सियांग जलविद्युत परियोजना?

सियांग अपर मल्टीपरपज प्रोजेक्ट (SUMP) अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित एक बड़ी जलविद्युत परियोजना है. इसे सरकारी कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) पूरा करेगी। इस परियोजना के तहत नदी पर विशाल बांध बनाने की योजना है. आदि समुदाय इस परियोजना का लगातार विरोध कर रहा है. स्थानीय लोगों को आशंका है कि बांध बनने से उन्हें अपने घर और पुश्तैनी जमीन छोड़नी पड़ सकती है. इसके अलावा जंगलों के डूबने, पर्यावरण को नुकसान पहुंचने और उनकी पारंपरिक संस्कृति पर असर पड़ने की भी चिंता जताई जा रही है.

सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को बताया जरूरी

अरुणाचल प्रदेश सरकार का कहना है कि इस परियोजना से सियांग नदी घाटी में पानी का बेहतर प्रबंधन किया जा सकेगा. सरकार ने चीन की ओर से नदी के ऊपरी हिस्से में विशाल बांध बनाने की योजना का भी हवाला दिया है. उसका तर्क है कि इस स्थिति में सियांग परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और जल प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण है. हालांकि, काटोन मोयोंग ने सरकार की इस दलील को खारिज किया है. उनका आरोप है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देकर स्थानीय लोगों के विरोध को दबाने की कोशिश की जा रही है.

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सरकार की मंशा पर भी उठाए सवाल

मोयोंग ने आरोप लगाया है कि सरकार राजनीतिक फायदे के लिए इस परियोजना को आगे बढ़ा रही है. उन्होंने दावा किया कि इसके पीछे 2029 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई जा रही है. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के सभी मूल निवासी समुदायों से एकजुट रहने और परियोजना के विरोध में साथ आने की अपील भी की है. उन्होंने कहा कि छोटी नदियों पर बांध बनाने को लेकर अलग राय हो सकती है, लेकिन सियांग नदी पर बांध स्वीकार नहीं किया जाएगा. उन्होंने जनजातीय समुदायों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिशों से भी सावधान रहने की अपील की.

1979 में भी सामने आया था बांध का प्रस्ताव

काटोन मोयोंग के मुताबिक, सियांग नदी पर बांध बनाने का प्रस्ताव पहली बार 1979 में आया था. उस समय इसे ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ रोकने की योजना के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन आदि समुदाय ने इसका विरोध किया था. मोयोंग ने राज्य की पूर्व सरकारों पर भी सवाल उठाए. उनका दावा है कि दिवंगत मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की सरकार के दौरान बिजली परियोजनाओं से जुड़ी कंपनियों के साथ 145 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि इन समझौतों से राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ा. उनका कहना है कि समय के साथ इस परियोजना को लेकर सरकार की दलीलें बदलती रहीं. पहले इसे बाढ़ नियंत्रण, फिर राष्ट्रीय हित और अब राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर पेश किया जा रहा है.

प्रदर्शनकारियों की क्या हैं मांगें?

बांध का विरोध कर रहे लोग परियोजना से जुड़ी शुरुआती गतिविधियों को तुरंत रोकने की मांग कर रहे हैं. उनकी प्रमुख मांगों में प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट (PFR) से जुड़ा काम और सर्वेक्षण रोकना शामिल है. इसके साथ ही प्रस्तावित परियोजना से प्रभावित हो सकने वाले इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों को हटाने की मांग भी की जा रही है. दूसरी ओर, राज्य सरकार का मानना है कि करीब 11,000 मेगावाट की यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास में मददगार होगी. सरकार के मुताबिक, इससे युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे. साथ ही देश की जल और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी.

 

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Explainer: दिल्ली की हवा में जहर घोलने के लिए कौन जिम्मेदार? वाहन, धूल और पराली...; सुप्रीम कोर्ट में सामने आईं ये वजहें...

Delhi Air Pollution: दिल्ली-NCR में बढ़ते वायु प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. इतना ही नहीं वायु प्रदूषण से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान एनसीआर में वाहनों की बढ़ती संख्या, सार्वजनिक परिवहन की कमी और यातायात जाम पर कई सवाल खड़े किए हैं. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सरकार से पराली जलाने की समस्या का समाधान तलाशने पर जोर दिया है. शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान ये बात सामने आई कि प्रदूषण केवल पराली जलाने से ही नहीं है. दिल्ली और आसपास के शहरों में बढ़ते वाहनों के चलते भी यहां प्रदूषण की समस्या लगातार  बढ़ रही है. 

सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण पर क्या कहा?

6 नवंबर को वायु प्रदूषण से जुड़े मामले में कोर्ट में सुनवाई थी. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार  और याचिकाकर्ताओं के वकील ने अपने पक्ष रखे. दोनों पक्षों की जिरह सुनने के बाद अदालत ने कहा कि दिल्ली और NCR के शहरों में सड़कों पर वाहनों की भारी भीड़ प्रदूषण का एक बड़ा कारण है. अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि जब सरकार प्रदूषण नियंत्रण के लिए कई उपाय कर रही है जैसा की उनके वकील ने बताया तो इसके बावजूद वाहनों से होने वाला प्रदूषण कम क्यों नहीं हो रहा है?

केवल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाने से कुछ नहीं होगा

अदालत ने एनसीआर में पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था नहीं होने पर नाराजगी जताई. अदालत ने ये माना कि रोड पर लोगों की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त संख्या में सरकारी परिवहन व्यवस्था नहीं है. ऐसे में केवल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा. इसके अलावा अदालत ने पराली जलाने से रोकने के लिए किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देने और फसल अवशेष खरीदने की व्यवस्था पर और काम करने पर जोर दिया.

जाम पर जज हुए नाराज, दूसरे राज्यों से आने वाले वाहनों की हो निगरानी

अदालत ने दिल्ली में अपने वाहनों और नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम समेत आसपास के राज्यों से आवाजाही करने वाले रास्तों पर जाम लगने पर भी चिंता जताई. अदालत ने इस पर कहा कि जब बड़ी संख्या में वाहन एक साथ सड़कों पर चलते हैं और ट्रैफिक जाम में फंसते हैं और इससे प्रदूषण का स्तर बढ़ता है. कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा दिल्ली में दूसरे राज्यों में पंजीकृत वाहन भी आते हैं. सरकार को ऐसे वाहनों पर निगरानी बढ़ानी होगी. 

महंगी गाड़ियों के इस्तेमाल पर उठे सवाल 

सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने कोर्ट को बताया कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) को जियो-टैग करना और वैध प्रमाणपत्र के बिना ईंधन नहीं देने जैसे कदम उठाए गए हैं. इस तर्क पर अदालत ने सवाल उठाया कि इन उपायों के बावजूद भी सड़कों पर वाहनों की संख्या और उनसे होने वाला प्रदूषण में कमी नहीं आ रही है. 

दिल्ली की हवा में वाहनों का कितना योगदान है?

जानकारी के मुताबिक वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने वायु प्रदूषण के कारणों को पहचानने के लिए 2015 से 2025 तक के डेटा का अध्ययन किया. बता दें 33 विशेषज्ञों के पैनल ने इसके बाद एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें बताया गया कि सर्दियों में PM2.5 प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में परिवहन की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत है. इसके अलावा पराली जलाना भी दिल्ली-NCR के प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारण है. CAQM की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 5 नवंबर को दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान करीब 14 प्रतिशत था.

सड़क की धूल और निर्माण कार्य कैसे बढ़ाते हैं प्रदूषण?

दिल्ली-NCR में प्रदूषण का एक बड़ा कारण सड़क और निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल भी है. सड़कों पर जमा मिट्टी, टूटी सड़कें, खुले निर्माण स्थल, भवन निर्माण सामग्री और बिना ढके मलबे से हवा में धूल के कण फैलते हैं. जिसे हम PM10 और PM2.5 में मापते हैं. 

दिल्ली में GRAP-3 क्यों लागू किया गया?

दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ने के बीच वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने 6 नवंबर को ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान GRAP के तीसरे चरण को लागू किया था. बता दें दिल्ली का औसत AQI 6 नवंबर को 382 दर्ज किया गया था, जो बहुत खराब श्रेणी में आता है. IITM-पुणे का अनुमान है कि 7 से 9 नवंबर के बीच हवा की गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में पहुंचने की आशंका है. 

GRAP-3 में क्या-क्या प्रतिबंध लगाए गए हैं?

-NCR में धूल फैलाने वाले गैर-जरूरी निर्माण और तोड़फोड़ के काम बंद. 

-दिल्ली और चुनिंदा NCR जिलों में BS-III पेट्रोल और BS-IV डीजल के चार पहिया वाहनों पर प्रतिबंध लागू.

-डीजल जनरेटर के इस्तेमाल पर अतिरिक्त पाबंदी.

-सड़कों पर मैकेनिकल स्वीपिंग और पानी के छिड़काव को बढ़ाया गया है. 

-सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को मजबूत करने और प्रदूषण कम करने के उपायों पर जोर दिया जा रहा है.

-पांचवीं कक्षा तक के स्कूलों हाइब्रिड मोड पर चलेंगे  

-दिल्ली-NCR में 50 प्रतिशत वर्क फ्रॉम होम.

दिल्ली-NCR में जहरीली हुई हवा, कई इलाकों में AQI 400 पार, GRAP-3 भी बेअसर!

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