Trump की हार के बाद बड़ा एक्शन! सूसी वाइल्स-OUT, स्टीफन मिलर-IN
अमेरिका में मिड टर्म चुनाव के नतीजे आए और डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता के गलियारों में हलचल मच गई। चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा तो अब वाइट हाउस में फैसलों की रफ्तार तेज हो गई है। कहीं हार की वजह तलाशने के लिए बैठकों का दौर चल रहा है तो कहीं जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की कुर्सियां खिसकने लगी हैं। सबसे बड़ा फैसला ट्रंप की बेहद भरोसेमंद चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स की विदाई। उनकी जगह पर अब स्टीफन मिलर को कमान सौंपी गई है। आखिर चुनावी हार के बाद ट्रंप अपनी ही टीम में फेरबदल क्यों कर रहे हैं? क्या अब हार का ठीकरा करीबियों पर फूटने लगा है? क्या ट्रंप को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का एहसास हो गया है या फिर यह 2028 की लड़ाई से पहले वाइट हाउस को नए सिरे से तैयार करने की कवायद है। एक चुनावी झटके के बाद ट्रंप के यह फैसले अमेरिका की राजनीति में क्या नया मोड़ ला सकते हैं। अमेरिका अमेरिका के मिड टर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को लगे झटके के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब अपनी ही टीम में बड़े बदलाव कर रहे वाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स को पद से हटाने का फैसला इसी बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है।
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सूजी वाइल्स ट्रंप की बेहद भरोसेमंद सहयोगियों में गिनी जाती थी। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की वापसी के दौरान उनकी भूमिका काफी अहम रही थी। लेकिन अब ट्रंप ने उनकी जगह पर स्टीफन मिलर को चीफ ऑफ स्टाफ बनाने का फैसला किया है। यानी जिस वाइट हाउस में अब तक सूजी वाइल्स की रणनीति और प्रबंधन की अहम भूमिका थी, वहां अब ट्रंप के सबसे भरोसेमंद और सख्त विचारों वाले सहयोगियों में शामिल स्टीफन मिलर को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन सवाल सिर्फ सुसी वाइल्स की विदाई का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ट्रंप ने उनकी जगह पर स्टीफन मिलर को ही क्यों चुना? क्या ट्रंप अब अपनी सरकार को एक नए अंदाज में चलाना चाहते हैं? और क्या मिडर्म चुनाव के नतीजों के बाद अमेरिका फर्स्ट एजेंडे को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की तैयारी है? दरअसल स्टीफन मिलर की वाइट हाउस में नई भूमिका ट्रंप की आगे की राजनीति को समझने के लिए बेहद अहम हो सकती है। मिलर लंबे समय से डोनाल्ड ट्रंप के बेहद करीबी सहयोगियों में रहे हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी वे इमीग्रेशन पॉलिसी तैयार करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल थे। अमेरिका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, बॉर्डर सिक्योरिटी और इमीग्रेशन नियमों को कड़ा करने की नीति से उनका नाम जुड़ा रहा है।
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ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट सोच को नीतियों में बदलने वाले प्रमुख लोगों में स्टीफन मिलर की गिनती होती रही है। इसलिए चीफ ऑफ स्टाफ जैसे अहम पद पर उनकी नियुक्ति को सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव मानकर नहीं देखा जा सकता। यह नियुक्ति इस बात का संकेत भी हो सकती है कि ट्रंप अपनी सरकार के भीतर उन लोगों को ज्यादा जिम्मेदारी देना चाहते हैं जो उनके राजनीतिक एजेंडे को मजबूती से आगे बढ़ा सकें। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है क्या ट्रंप मिडिटर्म चुनाव की हार से सबक लेकर अपनी रणनीति बदल रहे हैं या फिर अपनी पुरानी नीतियों पर और मजबूती से आगे बढ़ने का फैसला कर चुके हैं। मिड टर्म चुनाव में जनता का फैसला सिर्फ सीटों का गणित नहीं होता। वो राष्ट्रपति के कामकाज और उनकी नीतियों पर भी एक राजनीतिक संदेश देता है। जहां तक मिलर की बात है, वह ट्रंप की इमीग्रेशन नीतियों के प्रमुख रणनीतिकार रहे हैं और अमेरिका फर्स्ट एजेंडे के समर्थक हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक वह इससे पहले डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका भी निभा चुके थे। ऐसे में उनकी नियुक्ति से यह संकेत मिलता है कि ट्रंप अपनी सरकार के भीतर भरोसेमंद सहयोगियों को अहम जिम्मेदारियां दे रहे हैं। तो अमेरिका में चुनावी झटके के बाद डोनाल्ड ट्रंप की टीम में बदलाव शुरू हो चुका है। सुसी वाइल्स की विदाई और स्टीफन मिलर की नियुक्ति दोनों फैसले वाइट हाउस की आगे की रणनीति को लेकर कई सवाल खड़े करते हैं।
'अब बातचीत का समय खत्म', अरुणाचल में 11,200 मेगावाट के बांध का विरोध तेज, आंदोलनकारी ने ठुकराया सरकार का न्योता
अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है. बांध का विरोध कर रहे आंदोलनकारी काटोन मोयोंग ने राज्य सरकार की बातचीत की पेशकश ठुकरा दी है. 'अबोर मैन' के नाम से पहचाने जाने वाले मोयोंग ने साफ कहा है कि इस परियोजना पर बातचीत का समय अब निकल चुका है. वह लंबे समय से सियांग घाटी में बांध बनाने का विरोध कर रहे हैं.
इंजीनियर रह चुके काटोन मोयोंग ने हाल ही में दिल्ली में भी इस परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन किया था. इस दौरान दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। अब उन्होंने अरुणाचल प्रदेश सरकार की ओर से बातचीत के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आदि समुदाय का रुख इस परियोजना को लेकर पहले जैसा ही है और वह बांध का विरोध जारी रखेगा.
क्या है सियांग जलविद्युत परियोजना?
सियांग अपर मल्टीपरपज प्रोजेक्ट (SUMP) अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित एक बड़ी जलविद्युत परियोजना है. इसे सरकारी कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) पूरा करेगी। इस परियोजना के तहत नदी पर विशाल बांध बनाने की योजना है. आदि समुदाय इस परियोजना का लगातार विरोध कर रहा है. स्थानीय लोगों को आशंका है कि बांध बनने से उन्हें अपने घर और पुश्तैनी जमीन छोड़नी पड़ सकती है. इसके अलावा जंगलों के डूबने, पर्यावरण को नुकसान पहुंचने और उनकी पारंपरिक संस्कृति पर असर पड़ने की भी चिंता जताई जा रही है.
सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को बताया जरूरी
अरुणाचल प्रदेश सरकार का कहना है कि इस परियोजना से सियांग नदी घाटी में पानी का बेहतर प्रबंधन किया जा सकेगा. सरकार ने चीन की ओर से नदी के ऊपरी हिस्से में विशाल बांध बनाने की योजना का भी हवाला दिया है. उसका तर्क है कि इस स्थिति में सियांग परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और जल प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण है. हालांकि, काटोन मोयोंग ने सरकार की इस दलील को खारिज किया है. उनका आरोप है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देकर स्थानीय लोगों के विरोध को दबाने की कोशिश की जा रही है.
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सरकार की मंशा पर भी उठाए सवाल
मोयोंग ने आरोप लगाया है कि सरकार राजनीतिक फायदे के लिए इस परियोजना को आगे बढ़ा रही है. उन्होंने दावा किया कि इसके पीछे 2029 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई जा रही है. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के सभी मूल निवासी समुदायों से एकजुट रहने और परियोजना के विरोध में साथ आने की अपील भी की है. उन्होंने कहा कि छोटी नदियों पर बांध बनाने को लेकर अलग राय हो सकती है, लेकिन सियांग नदी पर बांध स्वीकार नहीं किया जाएगा. उन्होंने जनजातीय समुदायों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिशों से भी सावधान रहने की अपील की.
1979 में भी सामने आया था बांध का प्रस्ताव
काटोन मोयोंग के मुताबिक, सियांग नदी पर बांध बनाने का प्रस्ताव पहली बार 1979 में आया था. उस समय इसे ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ रोकने की योजना के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन आदि समुदाय ने इसका विरोध किया था. मोयोंग ने राज्य की पूर्व सरकारों पर भी सवाल उठाए. उनका दावा है कि दिवंगत मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की सरकार के दौरान बिजली परियोजनाओं से जुड़ी कंपनियों के साथ 145 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि इन समझौतों से राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ा. उनका कहना है कि समय के साथ इस परियोजना को लेकर सरकार की दलीलें बदलती रहीं. पहले इसे बाढ़ नियंत्रण, फिर राष्ट्रीय हित और अब राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर पेश किया जा रहा है.
प्रदर्शनकारियों की क्या हैं मांगें?
बांध का विरोध कर रहे लोग परियोजना से जुड़ी शुरुआती गतिविधियों को तुरंत रोकने की मांग कर रहे हैं. उनकी प्रमुख मांगों में प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट (PFR) से जुड़ा काम और सर्वेक्षण रोकना शामिल है. इसके साथ ही प्रस्तावित परियोजना से प्रभावित हो सकने वाले इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों को हटाने की मांग भी की जा रही है. दूसरी ओर, राज्य सरकार का मानना है कि करीब 11,000 मेगावाट की यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक विकास में मददगार होगी. सरकार के मुताबिक, इससे युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे. साथ ही देश की जल और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी.
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