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US के Forsyth County में भारतीयों की संख्या 52000 पहुंची, श्वेतों के बाद दूसरा सबसे बड़ा जातीय समूह

(विजय जोशी) फोर्सिथ काउंटी (अमेरिका), सात नवंबर करीब दो शताब्दी पहले जमीन और सोने के लालच में यूरोप से आए श्वेत लोगों ने अमेरिका के उत्तरी जॉर्जिया में मूल निवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर उस पर कब्जा कर लिया था। अब भारत से आए हजारों लोग उसी जमीन पर बस रहे हैं। तेलुगु, हिंदी और तमिल बोलने वाले ये भारतीय लाखों डॉलर के आलीशान मकान खरीद रहे हैं और उत्तरी जॉर्जिया की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच स्थित फोर्सिथ काउंटी में जगह-जगह छोटे-छोटे भारत बसा रहे हैं।

हालांकि, स्थानीय लोगों को यह बदलाव हमेशा रास नहीं आता। समुदाय के नेताओं का कहना है कि भारतीय आमतौर पर अपने ही समुदाय तक सीमित रहते हैं और श्वेत अमेरिकियों के साथ ज्यादा घुलते-मिलते नहीं हैं। इससे स्थानीय लोगों में नाराजगी पैदा होती है और प्रवासियों के प्रति विरोध की भावना बढ़ती है।

उनके अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) आंदोलन के विस्तार के साथ हाल के वर्षों में प्रवासी विरोधी भावनाएं और बढ़ी हैं। भारतीयों ने 1960 के दशक में जॉर्जिया आना शुरू किया था। उस समय वे मुख्य रूप से शिक्षाविद या स्थानीय एमोरी विश्वविद्यालय और जॉर्जिया टेक के छात्र के रूप में यहां आते थे।

हालांकि, उनकी संख्या काफी कम थी। आधिकारिक जनगणना के अनुसार, 1990 के दशक के अंत में अमेरिका आने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ने के बावजूद 2000 में फोर्सिथ काउंटी में केवल 160 भारतीय रहते थे। आज यह संख्या बढ़कर करीब 52,000 हो गई है, जिससे फोर्सिथ काउंटी का स्वरूप काफी बदल गया है।

भारतीय अब काउंटी की आबादी का 16 प्रतिशत हिस्सा हैं और श्वेत लोगों के बाद दूसरा सबसे बड़ा जातीय समुदाय बन गए हैं। यहां श्वेत लोगों की आबादी 63.5 प्रतिशत है। अमेरिका में ‘काउंटी’ की तुलना मोटे तौर पर भारत के जिले से की जा सकती है।

इसमें कई शहर और कस्बे शामिल होते हैं, लेकिन इसका प्रशासन निर्वाचित अधिकारी चलाते हैं। ‘यूएसए इंडिया बिजनेस समिट’ के कार्यक्रम अध्यक्ष अनी अग्निहोत्री ने कहा कि जॉर्जिया आने वाले नए भारतीय प्रवासियों की पहली पसंद फोर्सिथ है, क्योंकि यहां उन्हें पहले से मौजूद मजबूत सहायता तंत्र का लाभ मिलता है। यहां बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय रहते हैं, जो इलाके से अच्छी तरह परिचित हैं।

इसके अलावा भारतीय दुकानें, मंदिर और अच्छे स्कूल भी हैं। उन्होंने बताया कि भारतीयों की औसत वार्षिक आय करीब 1,50,000 अमेरिकी डॉलर है, जो आम अमेरिकियों की औसत आय से काफी अधिक है। यह भी स्थानीय लोगों की नाराजगी का एक कारण है।

प्रबंधन में एमबीए की पढ़ाई करने 1991 में जॉर्जिया आए अग्निहोत्री ने कहा, ‘‘भारतीय क्या चाहते हैं? हम पांच लक्ष्य लेकर अमेरिका आते हैं-हम बड़े मकान और बड़ी कारें खरीदना चाहते हैं, अच्छा पैसा कमाना चाहते हैं, मंदिर जाना चाहते हैं और अपने बच्चों को प्रतिष्ठित ‘आइवी लीग’ कॉलेजों में पढ़ाना चाहते हैं।’’ आज समृद्ध लोगों के कई रिहायशी इलाकों का केंद्र बन चुका फोर्सिथ कभी एक पिछड़ा ग्रामीण क्षेत्र था जिसका अतीत नस्ली भेदभाव और हिंसा की घटनाओं से भरा रहा है। यहां पहले 1830 के दशक में चेरोकी समुदाय के मूल निवासियों और बाद में गुलामी से हाल में मुक्त हुए अश्वेत लोगों को नस्लवाद का सामना करना पड़ा था।

लंबे समय से जॉर्जिया में रह रहे वेणु चल्ला हाल में फोर्सिथ काउंटी के प्रमुख शहर कमिंग में आकर बसे हैं। वेणु चल्ला ने कहा, ‘‘बहुत कम भारतीय इस विडंबना को समझते हैं कि वे उस जमीन पर बस रहे हैं, जो दो शताब्दियों तक नस्ली हिंसा के कारण खून से सनी रही थी।’’ चल्ला एक नवनिर्मित आवासीय परिसर में रहते हैं, जहां पांच शयनकक्षों वाले 56 विशाल मकान हैं। प्रत्येक मकान की कीमत करीब 15 लाख अमेरिकी डॉलर है।

इनमें से 45 मकान भारतीयों के हैं और वे इनमें रहते भी हैं। एक मकान में श्वेत अमेरिकी परिवार, एक में अफ्रीकी-अमेरिकी परिवार और बाकी मकानों में पूर्वी एशियाई मूल के लोग रहते हैं। यह आवासीय परिसर सुवानी शहर के एक बाजार से कुछ ही दूरी पर है।

हाल में शनिवार की एक शाम इस बाजार के ‘सुविधा’ सुपरमार्केट में खरीदारी करने आए लोग आपस में धीमी आवाज में बातचीत कर रहे थे। ज्यादातर लोग तेलुगु और कुछ हिंदी में बात कर रहे थे। दिवाली नजदीक होने के कारण दुकानों में डोडा बर्फी, चमचम और हैदराबादी मिठाई बालूशाही भी बड़ी मात्रा में सजी हुई थीं।

पास ही ‘चाइनीज ढाबा’ और ‘सारा सैलून’ के बीच स्थित ‘फ्रेश रोटी’ नामक दुकान पर चपातियों की खूब बिक्री हो रही थी। बाजार में ‘राहुल क्लोदिंग’, ‘दृष्टि फ्लावर्स’ और ‘स्पोर्ट्स अड्डा’ जैसी दुकानें भी हैं। दुकानों की कतार के एक छोर पर लगे इलेक्ट्रॉनिक विज्ञापन बोर्ड पर ‘मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स’ के विज्ञापन दिखाई दे रहे थे।

अग्निहोत्री ने बताया कि केवल वृहद अटलांटा क्षेत्र में ही करीब 100 हिंदू मंदिर हैं। इनमें विशाल बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर भी शामिल है, जिसका उद्घाटन 2007 में शहर में एक भव्य शोभायात्रा के साथ किया गया था। यहां हर साल गणेश चतुर्थी के अवसर पर किराये के हेलीकॉप्टर से फूलों की पंखुड़ियां बरसाई जाती हैं।

अग्निहोत्री ने कहा कि संपन्न भारतीयों की मौजूदगी से स्थानीय अर्थव्यवस्था को निश्चित रूप से फायदा हुआ है, लेकिन भारतीयों को स्थानीय लोगों के साथ घुलने-मिलने तथा समुदाय के विकास में और अधिक योगदान देने के लिए भी प्रयास करने चाहिए। चल्ला ने कहा कि स्थानीय समाज से घुल-मिल नहीं पाने की समस्या केवल भारतीयों में ही नहीं, बल्कि लगभग सभी देशों से आने वाले पहली पीढ़ी के प्रवासियों में देखी जाती है। हालांकि, भारतीय मूल के दूसरी पीढ़ी के अमेरिकियों के साथ ऐसी समस्या नहीं है।

इसका एक उदाहरण शुचिता पटेल हैं, जो भारतीय मूल की दूसरी पीढ़ी की अमेरिकी हैं। उन्होंने हाल में हुए चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर फोर्सिथ काउंटी के आयुक्त पद के लिए चुनाव लड़ा था। हालांकि, वह मामूली अंतर से चुनाव हार गईं, लेकिन उनके प्रदर्शन से यह संकेत मिलता है कि अब भारतीयों को केवल अपने समुदाय तक सीमित रहने वाले सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) पेशेवरों के बजाय अमेरिकी समाज के अभिन्न हिस्से के रूप में भी देखा जाने लगा है।

इसी तरह, भारतीय मूल के दूसरी पीढ़ी के कई अन्य अमेरिकियों ने भी तीन नवंबर को हुए मध्यावधि चुनावों में अपनी पहचान बनाई। फोर्सिथ में 1987 तक पटेल जैसी किसी भारतीय मूल की महिला के सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उस समय इलाके में श्वेत लोगों का वर्चस्व था और नस्लवाद व्यापक रूप से फैला हुआ था।

उसी वर्ष जनवरी में अटलांटा से आए नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने फोर्सिथ में शांति मार्च निकालने की कोशिश की थी, लेकिन श्वेत निवासियों ने हिंसा के बल पर उन्हें रोक दिया और वहां से भगा दिया। कमिंग के बाहरी इलाके में श्वेत पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने मार्च में शामिल होने जा रहे लोगों की बस रोक दी थी। वे नस्ली अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए ‘‘वापस जाओ’’ के नारे लगा रहे थे।

उनके हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था, ‘‘फोर्सिथ में केवल श्वेत लोग ही रहेंगे।’’ कमिंग में 1912 में 18 वर्षीय श्वेत युवती के साथ बलात्कार और उसकी हत्या की घटना के बाद फोर्सिथ से अश्वेत लोगों को निकाल दिया गया था और यह इलाका पूरी तरह श्वेत आबादी वाला बन गया था। इस घटना का बदला लेने के लिए उग्र भीड़ ने रॉब एडवर्ड्स नामक व्यक्ति को जेल से बाहर खींचकर गोली मार दी, लोहे की छड़ से उसका सिर कुचल दिया और फिर उसे फांसी पर लटका दिया। बाद में दो अन्य अश्वेत व्यक्तियों को भी एकतरफा सुनवाई के बाद फांसी दे दी गई।

पैट्रिक फिलिप्स ने फोर्सिथ में नस्लवाद के इतिहास पर लिखी अपनी 2016 की पुस्तक ‘ब्लड एट द रूट्स’ में कहा, ‘‘1912 में जॉर्जिया में किसी अश्वेत व्यक्ति की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दिया जाना कोई असामान्य बात नहीं थी।’’ भीड़ द्वारा एडवर्ड्स की हत्या और दो अन्य अश्वेत लोगों को फांसी दिए जाने के बाद श्वेत वर्चस्ववादियों ने इलाके के सभी अश्वेत निवासियों को वहां से निकाल दिया। इसके बाद कई दशकों तक फोर्सिथ में केवल श्वेत लोग ही रहते थे। इसी दौरान, 45 साल तक निष्क्रिय रहने के बाद नस्लवादी संगठन ‘कू क्लक्स क्लान’ 1915 में जॉर्जिया में फिर से सक्रिय हुआ।

इंग्लैंड से श्वेत उपनिवेशवादी 1733 में जॉर्जिया पहुंचे थे, जहां चेरोकी समुदाय के मूल निवासी सदियों से रह रहे थे। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक श्वेत लोगों की बस्तियों के विस्तार के कारण चेरोकी समुदाय जॉर्जिया के एक छोटे से इलाके तक सीमित हो गया था, जो आज के फोर्सिथ क्षेत्र में आता है। वर्ष 1828 में सोने की खोज के बाद श्वेत लोगों ने धमकियों, जबरदस्ती और कानूनी हथकंडों का इस्तेमाल कर चेरोकी समुदाय के लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बड़े पैमाने पर बेदखल कर दिया और उन्हें ओक्लाहोमा राज्य में उनके लिए तय किए गए क्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर किया।

अमेरिकी इतिहास में चेरोकी समुदाय के इस जबरन विस्थापन को ‘ट्रेल ऑफ टीयर्स’ (आंसुओं का रास्ता) के नाम से जाना जाता है। आज फोर्सिथ में नस्ली भेदभाव की घटनाएं न के बराबर होती हैं और भारतीयों को भी शायद ही कभी इस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। चल्ला ने कहा, ‘‘लेकिन भारतीयों के लिए उस जमीन का अतीत जानना महत्वपूर्ण है, जहां वे अपना नया जीवन शुरू करना चाहते हैं।

इससे उन्हें वहां की पृष्ठभूमि समझने, स्थानीय समाज के अनुसार खुद को ढालने और अपना व्यवहार तय करने में मदद मिलती है।’’

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Trump की हार के बाद बड़ा एक्शन! सूसी वाइल्स-OUT, स्टीफन मिलर-IN

अमेरिका में मिड टर्म चुनाव के नतीजे आए और डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता के गलियारों में हलचल मच गई। चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा तो अब वाइट हाउस में फैसलों की रफ्तार तेज हो गई है। कहीं हार की वजह तलाशने के लिए बैठकों का दौर चल रहा है तो कहीं जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की कुर्सियां खिसकने लगी हैं। सबसे बड़ा फैसला ट्रंप की बेहद भरोसेमंद चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स की विदाई। उनकी जगह पर अब स्टीफन मिलर को कमान सौंपी गई है। आखिर चुनावी हार के बाद ट्रंप अपनी ही टीम में फेरबदल क्यों कर रहे हैं? क्या अब हार का ठीकरा करीबियों पर फूटने लगा है? क्या ट्रंप को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का एहसास हो गया है या फिर यह 2028 की लड़ाई से पहले वाइट हाउस को नए सिरे से तैयार करने की कवायद है। एक चुनावी झटके के बाद ट्रंप के यह फैसले अमेरिका की राजनीति में क्या नया मोड़ ला सकते हैं। अमेरिका अमेरिका के मिड टर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को लगे झटके के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब अपनी ही टीम में बड़े बदलाव कर रहे वाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स को पद से हटाने का फैसला इसी बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है। 

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सूजी वाइल्स ट्रंप की बेहद भरोसेमंद सहयोगियों में गिनी जाती थी। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की वापसी के दौरान उनकी भूमिका काफी अहम रही थी। लेकिन अब ट्रंप ने उनकी जगह पर स्टीफन मिलर को चीफ ऑफ स्टाफ बनाने का फैसला किया है। यानी जिस वाइट हाउस में अब तक सूजी वाइल्स की रणनीति और प्रबंधन की अहम भूमिका थी, वहां अब ट्रंप के सबसे भरोसेमंद और सख्त विचारों वाले सहयोगियों में शामिल स्टीफन मिलर को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन सवाल सिर्फ सुसी वाइल्स की विदाई का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ट्रंप ने उनकी जगह पर स्टीफन मिलर को ही क्यों चुना? क्या ट्रंप अब अपनी सरकार को एक नए अंदाज में चलाना चाहते हैं? और क्या मिडर्म चुनाव के नतीजों के बाद अमेरिका फर्स्ट एजेंडे को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की तैयारी है? दरअसल स्टीफन मिलर की वाइट हाउस में नई भूमिका ट्रंप की आगे की राजनीति को समझने के लिए बेहद अहम हो सकती है। मिलर लंबे समय से डोनाल्ड ट्रंप के बेहद करीबी सहयोगियों में रहे हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी वे इमीग्रेशन पॉलिसी तैयार करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल थे। अमेरिका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, बॉर्डर सिक्योरिटी और इमीग्रेशन नियमों को कड़ा करने की नीति से उनका नाम जुड़ा रहा है। 

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ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट सोच को नीतियों में बदलने वाले प्रमुख लोगों में स्टीफन मिलर की गिनती होती रही है। इसलिए चीफ ऑफ स्टाफ जैसे अहम पद पर उनकी नियुक्ति को सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव मानकर नहीं देखा जा सकता। यह नियुक्ति इस बात का संकेत भी हो सकती है कि ट्रंप अपनी सरकार के भीतर उन लोगों को ज्यादा जिम्मेदारी देना चाहते हैं जो उनके राजनीतिक एजेंडे को मजबूती से आगे बढ़ा सकें। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है क्या ट्रंप मिडिटर्म चुनाव की हार से सबक लेकर अपनी रणनीति बदल रहे हैं या फिर अपनी पुरानी नीतियों पर और मजबूती से आगे बढ़ने का फैसला कर चुके हैं। मिड टर्म चुनाव में जनता का फैसला सिर्फ सीटों का गणित नहीं होता। वो राष्ट्रपति के कामकाज और उनकी नीतियों पर भी एक राजनीतिक संदेश देता है। जहां तक मिलर की बात है, वह ट्रंप की इमीग्रेशन नीतियों के प्रमुख रणनीतिकार रहे हैं और अमेरिका फर्स्ट एजेंडे के समर्थक हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक वह इससे पहले डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका भी निभा चुके थे। ऐसे में उनकी नियुक्ति से यह संकेत मिलता है कि ट्रंप अपनी सरकार के भीतर भरोसेमंद सहयोगियों को अहम जिम्मेदारियां दे रहे हैं। तो अमेरिका में चुनावी झटके के बाद डोनाल्ड ट्रंप की टीम में बदलाव शुरू हो चुका है। सुसी वाइल्स की विदाई और स्टीफन मिलर की नियुक्ति दोनों फैसले वाइट हाउस की आगे की रणनीति को लेकर कई सवाल खड़े करते हैं।

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Syed Mushtaq Ali Trophy से बाहर हुए Hardik Pandya, Baroda टीम में नहीं मिली जगह

हार्दिक पांड्या प्रतिस्पर्धी क्रिकेट से दूर रहेंगे, क्योंकि उन्हें भारत के घरेलू T20 टूर्नामेंट, 'सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी' के लिए बड़ौदा की 15 सदस्यीय टीम में शामिल नहीं किया गया है। उनके भाई, क्रुणाल पांड्या, टीम की कप्तानी करेंगे। हार्दिक का आखिरी प्रतिस्पर्धी मैच 24 मई को था, जिसमें उन्होंने IPL 2026 में मुंबई इंडियंस के लिए खेला था। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया A के खिलाफ अक्टूबर की सीरीज के लिए उन्हें शुरू में 'इंडिया A' की वनडे टीम में चुना गया था, लेकिन पैर की नई चोट के कारण उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। ESPNcricinfo की रिपोर्ट के अनुसार, उस समय गेंदबाजी करते समय उन्हें पूरी तरह से दर्द से राहत नहीं थी।

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IPL खत्म होने के बाद से, हार्दिक कई फिटनेस समस्याओं से उबर रहे हैं। इनमें टूर्नामेंट के दौरान पीठ में आई ऐंठन और उसके बाद पैर में खिंचाव जैसी दिक्कतें शामिल हैं। फिलहाल, बेंगलुरु में BCCI के 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' में उनका इलाज चल रहा है। उन्होंने अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच IPL 2026 शुरू होने से कुछ समय पहले, न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू T20I सीरीज में खेला था। अभी भारत न्यूजीलैंड के खिलाफ ODI सीरीज खेल रहा है, और दिसंबर में श्रीलंका के खिलाफ घरेलू सीरीज के साथ टीम फिर से T20I मुकाबले खेलेगी।

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अगले साल अफ्रीका में होने वाले ODI वर्ल्ड कप को देखते हुए, भारत चाहता है कि हार्दिक जल्द से जल्द वापसी करें। टीम के लिए सही कॉम्बिनेशन तय करने और टूर्नामेंट की बेहतर तैयारी करने के लिहाज से हार्दिक की वापसी बहुत अहम मानी जा रही है। क्रुणाल पांड्या की कप्तानी वाली बड़ौदा टीम में जितेश शर्मा, दीपक हुड्डा और रसीख सलाम जैसे प्रमुख खिलाड़ी शामिल हैं। सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में उनका अभियान 14 नवंबर को मुंबई में चंडीगढ़ के खिलाफ शुरू होगा।

Sat, 07 Nov 2026 13:53:00 +0530

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