नोएल टाटा वोल्टास के चेयरमैन पद से रिटायर होंगे:उनकी जगह सुनील डिसूजा कमान संभालेंगे; जयंत बालन को नया MD बनाया गया
टाटा ग्रुप की कूलिंग प्रोडक्ट्स बनाने वाली कंपनी वोल्टास के चेयरमैन और डायरेक्टर नोएल एन टाटा 11 नवंबर 2026 को रिटायर होने जा रहे हैं। 70 साल की उम्र पूरी होने के चलते टाटा ग्रुप की गाइडलाइंस के तहत उनका यह रिटायरमेंट हो रहा है। नोएल के रिटायरमेंट के बाद कंपनी बोर्ड ने उन्हें 12 नवंबर 2026 से चेयरमैन एमेरिटस यानी मानद चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला किया है। सुनील डिसूजा वोल्टास के नए चेयरमैन होंगे बोर्ड ने टाटा ग्रुप की FMCG कंपनी टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड (TCPL) के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO सुनील डिसूजा को वोल्टास का नया चेयरमैन नियुक्त किया है। डिसूजा 12 नवंबर 2026 से यह जिम्मेदारी संभालेंगे। डिसूजा की लीडरशिप में टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स टाटा साल्ट, टाटा टी, टेटली और टाटा सम्पन्न जैसे बड़े ब्रांड्स के तहत नमक, चाय, कॉफी, पैकेज्ड फूड और बेवरेज का कारोबार करती है। कंपनी के नियमों के कारण नोएल टाटा का रिटायरमेंट कंपनीज एक्ट 2013 के मुताबिक कोई भी व्यक्ति 70 साल या उससे ज्यादा उम्र होने पर MD या होल-टाइम डायरेक्टर के पद पर नहीं रह सकता और न ही उसका री-अपॉइंटमेंट होगा। 12 नवंबर 1956 को जन्मे नोएल टाटा 12 नवंबर 2026 को 70 साल के हो जाएंगे। नोएल टाटा साल 2003 से वोल्टास कंपनी से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन भी हैं। ग्रुप की इसी पॉलिसी के तहत नोएल टाटा ने कुछ महीनों पहले टाटा ग्रुप की रिटेल फर्म ट्रेंट के चेयरमैन पद से भी इस्तीफा दे दिया था। जयंत बालन नए मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किए गए कंपनी के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर सीपी मुकुंदन मेनन का कार्यकाल 24 मई 2027 को खत्म हो रहा है। वे टाटा ग्रुप की रिटायरमेंट पॉलिसी के तहत रिटायर होंगे। जयंत बालन को 25 मई 2027 से 5 साल के कार्यकाल के लिए एडिशनल डायरेक्टर और मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त करने की मंजूरी दी है। यह नियुक्ति शेयरहोल्डर्स की मंजूरी के अधीन होगी। जयंत बालन रूम एयर कंडीशनर बिजनेस के हेड हैं जयंत बालन वर्तमान में कंपनी के रूम एयर कंडीशनर बिजनेस के हेड हैं। पदभार संभालने तक सुचारू बदलाव सुनिश्चित करने के लिए उन्हें अब 'हेड - रूम एयर कंडीशनर बिजनेस एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डेजिग्नेट' के रूप में रीनेम किया गया है। वेंकटेशलू पलानीस्वामी एडिशनल डायरेक्टर नियुक्त बोर्ड ने 12 नवंबर 2026 से लागू होने वाले कार्यकाल के लिए वेंकटेशलू पलानीस्वामी को नॉन-इंडिपेंडेंट, नॉन-एग्जीक्यूटिव कैटेगरी में एडिशनल डायरेक्टर नियुक्त करने की भी मंजूरी दे दी है। नोएल टाटा ने 2017 में वोल्टास की कमान संभाली थी नोएल टाटा ने साल 2017 में वोल्टास के चेयरमैन का पद संभाला था। वोल्टास के अलावा वे इस साल के आखिरी तक टाटा ग्रुप की कई अन्य बड़ी कंपनियों के बोर्ड से भी रिटायर होने वाले हैं। इन कंपनियों में टाइटन, टाटा इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन, टाटा स्टील और टाटा इंटरनेशनल शामिल हैं, जहां से वे इस साल के आखिरी तक हट जाएंगे। क्या होता है 'चेयरमैन एमेरिटस'? जब कोई अनुभवी और सीनीयर लीडर किसी कंपनी के चेयरमैन पद से रिटायर होता है, तो उसके लंबे अनुभव, मार्गदर्शन और योगदान का सम्मान करने के लिए कंपनी उन्हें 'चेयरमैन एमेरिटस' की मानद उपाधि देती है। वे कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज में शामिल नहीं होते, लेकिन एडवाइजरी भूमिका में बने रहते हैं। क्या है कंपनीज एक्ट 2013 का नियम? कंपनी अधिनियम 2013 के प्रावधानों के अनुसार, 70 साल की उम्र वाले व्यक्ति को एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर या होल-टाइम डायरेक्टर के रूप में नियुक्त या जारी नहीं रखा जा सकता, जब तक कि शेयरहोल्डर्स द्वारा स्पेशल प्रपोजल पास न किया जाए।
Choti Diwali 2026: छोटी दिवाली को क्यों कहते हैं नरक चतुर्दशी? पढ़ें भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की पौराणिक कथा
Choti Diwali 2026: आज यानी 7 नवंबर 2026 को शनिवार को नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है. हर साल दिवाली से एक दिन पहले छोटी दिवाली मनाई जाती है, जिसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है. इसे नरक चतुर्दशी के अलावा, रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का अंत किया था और उसकी हजारों कन्याओं को उसकी कैद से मुक्त करवाया था. हिंदू धर्म में इसलिए, इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है. आइए पढ़ते हैं छोटी दिवाली की पौराणिक कथा.
छोटी दिवाली की पौराणिक कथा
पूर्वकाल में नरकासुर नामक एक अत्यंत बलशाली एवं पराक्रमी राक्षस था. नरकासुर भूमि अर्थात् देवी पृथ्वी का पुत्र था. जिस समय भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर देवी पृथ्वी का उद्धार किया था, उसी समय भगवान वराह के स्पर्श से देवी पृथ्वी ने एक पुत्र को जन्म दिया था. भूमिपुत्र होने के कारण उसका नाम भौमासुर हुआ. यही भौमासुर कालान्तर में नरकासुर के नाम से विख्यात हुआ.
एक समय नरकासुर ने अपने बाहुबल से देवराज इन्द्र तथा समस्त देवताओं को युद्ध में पराजित कर दिया तथा देवमाता अदिति के दिव्य कर्ण कुण्डल भी छीन लिये. इसके अतिरिक्त उसने देवताओं के बहुमूल्य रत्न, इन्द्र का ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा अश्व, कुबेर के मणि-माणिक्य आदि तथा पद्मनिधि नामक शंख भी हर लिए थे. नरकासुर आकाश में विचरण करता था तथा आकाश में ही भव्य नगर का निर्माण कर उसमें निवास करता था.
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एक दिन सम्पूर्ण देवगण नरकासुर के आतङ्क से पीड़ित होकर देवराज इन्द्र के नेतृत्व में भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गये. इन्द्रादि देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण को नरकासुर के अत्याचारों से अवगत कराया. श्रीकृष्ण ने भी नरकासुर की समस्त चेष्टाओं के विषय में सुनकर देवताओं को आश्वासन दिया तथा गरुड़देव का स्मरण किया.
भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण करते ही सभी देवताओं के पूजनीय विनतानन्दन महाबली गरुड़ तत्क्षण भगवान के समक्ष करबद्ध प्रकट हो गए. भगवान कृष्ण देवी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आसीन हुए तथा नरकासुर के नगर में पहुंच गए.
जिस प्रकार आकाश में सूर्यदेव का सूर्यमण्डल देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार नरकासुर का नगर भी दिव्य तेज से प्रकाशित हो रहा था. उस नगर में बहुमूल्य आभूषणों से अलङ्कृत अनेक राक्षस निवास करते थे. उस नगर की सुरक्षा-व्यवस्था को भेदना देवताओं के लिए भी कठिन था, क्योंकि उसमें सुरक्षा के अनेक आवरण थे.
जिस प्रकार सूर्यदेव अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र के द्वारा उन आवरणों को काट दिया. आवरण कट जाने पर समस्त राक्षस कुपित हो गये तथा शूल उठाकर सैकड़ों एवं सहस्रों की सङ्ख्या में एकत्र होकर युद्ध के लिये चल दिये. श्रीकृष्ण पर विजय प्राप्त करने हेतु निशाचर तोमर, भिन्दिपाल तथा पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रों से भगवान पर प्रहार करने लगे.
भगवान श्रीकृष्ण ने भी शार्ङ्ग धनुष लेकर राक्षसों के अस्त्र-शस्त्रों को काट डाला तथा अग्नि के समान तेजस्वी बाणों से उन सभी का संहार आरम्भ कर दिया. समस्त राक्षस धराशायी हो गए. उन दानवों का संहार करके श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक महान शंख द्वारा शंखनाद किया.
शंखनाद होते ही महापराक्रमी दैत्य नरकासुर दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर भगवान से युद्ध करने के लिये उपस्थित हो गया. भगवान श्रीकृष्ण एवं नरकासुर के मध्य भयंकर घमासान युद्ध होने लगा. यह घोर युद्ध रोंगटे खड़े करने वाला था. वे दोनों घनघोर मेघों की भाँति एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा कर रहे थे. युद्ध के मध्य में श्रीकृष्ण ने अर्द्धचन्द्राकार बाण के प्रयोग से नरकासुर का धनुष खण्डित कर दिया. तदुपरान्त भगवान ने उसके वक्षस्थल पर महान दिव्यास्त्र का प्रहार किया.
दिव्यास्त्र के प्रहार से उस दैत्य का हृदय विदीर्ण हो गया तथा वह घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा. उस समय देवी भूमि ने भगवान से अपने पुत्र का उद्धार करने की प्रार्थना की. देवी भूमि की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान श्रीकृष्ण उस राक्षस के समीप गये तथा बोले - "हे पुत्र! तुम कोई वर मांगो."
यह सुनकर राक्षस ने गरुड़ पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण से कहा- "हे सम्पूर्ण भूतों के स्वामी श्रीकृष्ण! मुझे वरदान की कोई आवश्यकता नहीं. तथापि लोककल्याण एवं परहित के लिये आपसे एक उत्तम वर की याचना करता हूं. हे मधुसूदन! जो मनुष्य मेरी मृत्यु के दिन मांगलिक स्नान करें, उन्हें कभी नरक की प्राप्ति न हो."
"एवमस्तु" कहकर भगवान ने नरकासुर को इच्छित वर प्रदान कर दिया. नरकासुर ने ब्रह्मा एवं शिव आदि देवताओं द्वारा पूजित भगवान के श्रीचरणों के दर्शन करते हुये अपने प्राणों का परित्याग कर दिया तथा उसे श्रीहरि के सारूप्य मोक्ष की प्राप्ति हुई. तदनंतर समस्त देवगण एवं ऋषिगण प्रसन्न होकर पुष्पवर्षा एवं स्तुतिगान करने लगे.
तदुपरान्त भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर के भव्य नगर में प्रवेश किया तथा देवताओं से बलपूर्वक लूटी हुई समस्त वस्तुएं उन्हें पुनः लौटा दीं. देवमाता अदिति के दोनों कुण्डल, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी तथा दीप्तिमान मणिमय पर्वत आदि सभी वस्तुयें भगवान ने इन्द्र को प्रदान कर दीं.
बलशाली नरकासुर ने समस्त राजाओं को परास्त कर विभिन्न राष्ट्रों से सोलह हजार कन्याओं का अपहरण किया था. वे सभी कन्यायें उसके अंतपुर में बंदी बनी हुई थीं. उन सभी ने भगवान श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया. अनंत रूप धारण करने वाले भगवान गोविन्द ने एक ही लग्न में उन सभी का पाणिग्रहण किया.
नरकासुर के सभी पुत्र भी देवी पृथ्वी की सहायता से भगवान के शरणागत हो गये. श्रीकृष्ण ने देवी पृथ्वी के वचनों का सम्मान करते हुये उन सभी पुत्रों को नरकासुर के राज्य का अधिकारी बना दिया. तदुपरान्त उन सभी स्त्रियों को इन्द्र के विमान पर आरूढ़ कर देवदूतों के साथ द्वारका में भेज दिया.
तदुपरान्त भगवान श्रीकृष्ण देवी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आरूढ़ होकर देवमाता अदिति के दर्शन करने हेतु स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गये. इस प्रकार पद्मपुराण में वर्णित नरकासुर-वध प्रसंग सम्पूर्ण होता है. इस प्रसंग का पाठ एवं श्रवण नरक चतुर्दशी के अवसर पर किया जाता है.
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