संविधान निरंतर जिम्मेदारी, इसके आदर्शों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना कर्तव्य: CJI Surya Kant
नयी दिल्ली, छह नवंबर प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि संविधान एक निरंतर जिम्मेदारी है और इसके आदर्शों को जीवंत बनाने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाता है। भारत मंडपम में एससी, एसटी एवं ओबीसी एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा भारत रत्न डॉ. बी.आर. आंबेडकर का जीवन, संघर्ष और संवैधानिक विरासत विषय पर आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के महान सपूत आंबेडकर असाधारण विद्वता के धनी और अडिग साहस वाले सुधारक थे, और उन्होंने अपने सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में से कई लड़ाइयां कानून के जरिये लड़ीं।
सीजेआई ने कहा कि उनका मानना है कि उन संघर्षों का सबसे स्थायी परिणाम देश का संविधान है। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने हमेशा महसूस किया है कि संविधान एक निरंतर जिम्मेदारी है, क्योंकि जहां इसका पाठ (मूल रूप) पूर्ण है, वहीं इसके आदर्शों को जीवन देने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता है।’’ उन्होंने कहा कि आंबेडकर स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बनने और प्रारूप समिति की अध्यक्षता करने से बहुत पहले, बार के एक ऐसे सदस्य थे जो मुकदमे के बोझ और न्याय के लिए लंबे इंतजार को अच्छी तरह समझते थे। सीजेआई ने कहा, ‘‘वह समझते थे कि शिक्षा स्वतंत्रता का पहला साधन है, क्योंकि यह काम करने का रास्ता खोलती है, सार्वजनिक जीवन में अपनी बात रखने का अधिकार देती है और अपने अधिकारों का दावा करने का आत्मविश्वास प्रदान करती है।’’ उन्होंने उल्लेखनीय दूरदर्शिता के साथ उस प्रावधान की पैरवी की, जिसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर मौलिक अधिकारों को लागू कराने के अधिकार को स्वयं एक मौलिक अधिकार बना दिया, और संविधान सभा के समक्ष इसे संविधान की आत्मा बताया था।
सीजेआई ने कहा, ‘‘उस व्यक्ति के लिए जिसे अन्याय का सामना करना पड़ा है और जिसके पास जाने के लिए कोई अन्य ठिकाना नहीं है, ऐसा अधिकार जिस तक उसकी पहुंच नहीं है, जिसे समझ नहीं सकता, या जिसका दावा करने का खर्च नहीं उठा सकता, वह केवल कागजों पर ही एक अधिकार बनकर रह जाता है; और उसे कागज से निकालकर उस व्यक्ति तक पहुंचाना ही उनके (आंबेडकर के) काम का वह हिस्सा है, जो अब न्यायपालिका और बार (वकीलों) के जिम्मे आता है।’’ उन्होंने कहा कि आंबेडकर जानते थे कि अकेले अदालतें कभी भी समानता को एक जीवंत वास्तविकता नहीं बना सकतीं, क्योंकि लोकतंत्र के बारे में उनका दृष्टिकोण अदालत कक्ष से कहीं आगे तक फैला हुआ था। उन्होंने कहा कि आंबेडकर इस विश्वास को संविधान सभा में लेकर गए थे और अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी कि जब तक राजनीतिक लोकतंत्र के आधार में सामाजिक लोकतंत्र — यानी जीवन का एक ऐसा तरीका जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देता है — नहीं होगा, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि आंबेडकर ने यह भी चेतावनी दी थी कि भारत विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहा है, जहां राजनीति में तो समानता होगी, लेकिन उसके सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी।
Illinois में चुनाव जीतीं Saba Haider बोलीं, गाजियाबाद में मिले संस्कारों से मिली जनसेवा की सीख
गाजियाबाद, छह नवंबर अमेरिका के इलिनोइस राज्य की प्रतिनिधि सभा के लिए निर्वाचित भारतीय मूल की सबा हैदर ने कहा कि गाजियाबाद में उनकी परवरिश और माता-पिता की प्रेरणा ने उन्हें जनसेवा का नजरिया दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी भी पृष्ठभूमि से आए लोगों की मदद की सीख बचपन से ही दी जाती थी। गाजियाबाद में सबा के परिवार ने उनका एक बयान मीडिया के साथ साझा किया गया, जिसमें उन्होंने कहा, “हमारे घर में, हम कभी यह नहीं पूछते थे कि आपके पास कितने पैसे हैं, या आप कहां से आए हैं।
हम बस यही पूछते थे-आपको किस चीज की जरूरत है? गाजियाबाद में भी यही होता था और अब इलिनोइस में भी यही हो रहा है-परिवार वही है, नियम भी वही है।” गाजियाबाद के एक उच्च-मध्यम वर्गीय परिवार में अपने बचपन को याद करते हुए, सबा ने बताया कि उनके माता-पिता एक सरल सिद्धांत का पालन करते थे, जो उनके परिवार की जीवनशैली का मुख्य आधार बन गया। उन्होंने कहा कि वह सिद्धांत किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करना था, चाहे उसकी पहचान या हालात कुछ भी हों।
बयान में उन्होंने बताया कि उनके पिता एक सरकारी इंजीनियर थे और काम के लिए रोज पड़ोसी शहरों में जाते थे, जबकि उनकी मां घर संभालती थीं। सबा ने कहा कि वह अपने माता-पिता को पड़ोसियों को अस्पताल ले जाने, बच्चों को किताबें देने, बुजुर्गों की मदद करने और इलाके में बसने वाले नए परिवारों का मार्गदर्शन करते देखकर बड़ी हुईं। उन्होंने कहा, “हमने कभी नहीं पूछा कि वे कौन हैं, कहां से आए हैं, या बदले में क्या दे सकते हैं।
हमने केवल पूछा - आपको क्या चाहिए?” सबा ने कहा कि किशोरावस्था में उन्होंने भी यही तरीका अपनाया, घर पर पड़ोस के छोटे बच्चों को मुफ्त ट्यूशन पढ़ाया, बुजुर्ग पड़ोसियों का हालचाल जाना और सामुदायिक गतिविधियों को आयोजित करने में मदद की। उन्होंने कहा, “मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि विशेषाधिकार आराम के लिए नहीं, सेवा के लिए है। वह दिन भर ईमानदारी से अपना काम करते थे और घर आकर पड़ोसियों की सेवा करते थे।” उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार आज भी उनका मार्गदर्शन करते हैं।
सबा ने कहा कि गाजियाबाद में उनका परिवार अब भी जरूरतमंदों की मदद करता है और वह इलिनोइस में भी उसी दृष्टिकोण का पालन कर रही हैं। उन्होंने कहा कि बचपन के इन अनुभवों को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़ते हुए हैदर ने कहा कि इन्होंने जीवन-यापन की लागत से निपटने, शिक्षा को सस्ती बनाने और बच्चों के लिए सुरक्षित समुदाय सुनिश्चित करने की उनकी प्रतिबद्धता को आकार दिया है। उन्होंने कहा, “मेरे परिवार के लिए, जरूरतमंद की मदद करना कभी राजनीति नहीं थी।
यह बस हमारे जीने का तरीका था।” उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद से ताल्लुक रखने वाली सबा ने तीन नवंबर को हुए अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में इलिनोइस के 84वें हाउस डिस्ट्रिक्ट से जीत हासिल की।
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