Rahul Gandhi की दिल्ली रैली में न पहुंचने पर MP Youth Congress के 60 पदाधिकारी निलंबित
भोपाल, छह नवंबर नयी दिल्ली में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित रैली में शामिल नहीं होने के कारण मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस के 60 पदाधिकारियों को निलंबित किए जाने से पार्टी की प्रदेश इकाई में असंतोष सामने आया है। निलंबित नेताओं ने इस कार्रवाई को एकतरफा और अलोकतांत्रिक करार दिया है। प्रभावित नेताओं का दावा है कि वे परिवार के सदस्यों की बीमारी और अंतिम संस्कार संबंधी रस्मों जैसे वास्तविक निजी कारणों से एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित रैली में शामिल नहीं हो सके थे।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस कार्रवाई से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को उनका मजाक उड़ाने का मौका मिल गया है। युवा कांग्रेस ने तीन नवंबर को मध्यप्रदेश के पांच उपाध्यक्षों, 14 महासचिवों, 32 सचिवों और नौ जिला अध्यक्षों समेत कुल 60 पदाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबन आदेश में रैली में अनुपस्थित रहने को संगठनात्मक अनुशासनहीनता बताते हुए कहा गया था कि अगले आदेश तक यह कार्रवाई प्रभावी रहेगी।
नेताओं का दावा है कि निलंबन से पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस तक जारी नहीं किया गया। कांग्रेस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर एक नवंबर को नयी दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली आयोजित की थी। युवा कांग्रेस के निलंबित सचिव दिव्यांशु मिश्रा उर्फ अंशु ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि परिवार के एक सदस्य की तबीयत गंभीर रूप से खराब होने के कारण वह रैली में शामिल नहीं हो सके।
उन्होंने कहा, मैंने पार्टी नेतृत्व को इसकी विधिवत जानकारी दे दी थी। मैं कांग्रेसी हूं और चाहे कुछ भी हो जाए, कांग्रेसी ही मरूंगा। उन्होंने याद दिलाया कि वह राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने के लिए कश्मीर भी गए थे।
युवा कांग्रेस के मैहर जिला अध्यक्ष सौरभ शर्मा ने कहा कि वह अपने भतीजे के जन्म के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम के कारण रैली में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने कहा, कांग्रेस ने मुझे बहुत कुछ दिया है। मैंने कार्यक्रम से पहले ही प्रदेश नेतृत्व को अपनी अनुपस्थिति की जानकारी दे दी थी।
युवा कांग्रेस के महासचिव रोहित राजौरिया ने कहा कि 17 अक्टूबर को उनके चाचा का निधन हो गया था और वह उनकी मृत्यु के 13वें दिन आयोजित कार्यक्रम के कारण रैली में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने कहा, मैंने पार्टी नेताओं को अपने चाचा के निधन की जानकारी दे दी थी। राजौरिया ने बताया कि वह 12 अक्टूबर को नयी दिल्ली में राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में आयोजित विपक्षी गठबंधन इंडिया के मार्च में शामिल हुए थे।
नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर कई अन्य निलंबित नेताओं ने इस कार्रवाई को अभूतपूर्व और अलोकतांत्रिक बताया। उनका कहना था कि पार्टी के संविधान में किसी पदाधिकारी को निलंबित करने से पहले कारण बताओ नोटिस जारी करने का प्रावधान है। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ मीम और कार्टून प्रसारित कर रहे हैं, जिससे उन्हें अपने क्षेत्रों में शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है।
कुछ नेताओं ने कहा, इस कार्रवाई से हमारे क्षेत्रों में हमारी बदनामी हुई है और भाजपा को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल गया है।
संविधान निरंतर जिम्मेदारी, इसके आदर्शों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना कर्तव्य: CJI Surya Kant
नयी दिल्ली, छह नवंबर प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कहा कि संविधान एक निरंतर जिम्मेदारी है और इसके आदर्शों को जीवंत बनाने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाता है। भारत मंडपम में एससी, एसटी एवं ओबीसी एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा भारत रत्न डॉ. बी.आर. आंबेडकर का जीवन, संघर्ष और संवैधानिक विरासत विषय पर आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत के महान सपूत आंबेडकर असाधारण विद्वता के धनी और अडिग साहस वाले सुधारक थे, और उन्होंने अपने सबसे महत्वपूर्ण संघर्षों में से कई लड़ाइयां कानून के जरिये लड़ीं।
सीजेआई ने कहा कि उनका मानना है कि उन संघर्षों का सबसे स्थायी परिणाम देश का संविधान है। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने हमेशा महसूस किया है कि संविधान एक निरंतर जिम्मेदारी है, क्योंकि जहां इसका पाठ (मूल रूप) पूर्ण है, वहीं इसके आदर्शों को जीवन देने का महान कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता है।’’ उन्होंने कहा कि आंबेडकर स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री बनने और प्रारूप समिति की अध्यक्षता करने से बहुत पहले, बार के एक ऐसे सदस्य थे जो मुकदमे के बोझ और न्याय के लिए लंबे इंतजार को अच्छी तरह समझते थे। सीजेआई ने कहा, ‘‘वह समझते थे कि शिक्षा स्वतंत्रता का पहला साधन है, क्योंकि यह काम करने का रास्ता खोलती है, सार्वजनिक जीवन में अपनी बात रखने का अधिकार देती है और अपने अधिकारों का दावा करने का आत्मविश्वास प्रदान करती है।’’ उन्होंने उल्लेखनीय दूरदर्शिता के साथ उस प्रावधान की पैरवी की, जिसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर मौलिक अधिकारों को लागू कराने के अधिकार को स्वयं एक मौलिक अधिकार बना दिया, और संविधान सभा के समक्ष इसे संविधान की आत्मा बताया था।
सीजेआई ने कहा, ‘‘उस व्यक्ति के लिए जिसे अन्याय का सामना करना पड़ा है और जिसके पास जाने के लिए कोई अन्य ठिकाना नहीं है, ऐसा अधिकार जिस तक उसकी पहुंच नहीं है, जिसे समझ नहीं सकता, या जिसका दावा करने का खर्च नहीं उठा सकता, वह केवल कागजों पर ही एक अधिकार बनकर रह जाता है; और उसे कागज से निकालकर उस व्यक्ति तक पहुंचाना ही उनके (आंबेडकर के) काम का वह हिस्सा है, जो अब न्यायपालिका और बार (वकीलों) के जिम्मे आता है।’’ उन्होंने कहा कि आंबेडकर जानते थे कि अकेले अदालतें कभी भी समानता को एक जीवंत वास्तविकता नहीं बना सकतीं, क्योंकि लोकतंत्र के बारे में उनका दृष्टिकोण अदालत कक्ष से कहीं आगे तक फैला हुआ था। उन्होंने कहा कि आंबेडकर इस विश्वास को संविधान सभा में लेकर गए थे और अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी कि जब तक राजनीतिक लोकतंत्र के आधार में सामाजिक लोकतंत्र — यानी जीवन का एक ऐसा तरीका जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देता है — नहीं होगा, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि आंबेडकर ने यह भी चेतावनी दी थी कि भारत विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहा है, जहां राजनीति में तो समानता होगी, लेकिन उसके सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी।
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