Supreme Court का आदेश: केवल Salary देखकर उम्मीदवारों से नहीं छिन सकता OBC Reservation का लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से स्पष्ट किया कि किसी उम्मीदवार के माता-पिता की सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) या निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) की नौकरी से मिलने वाली सैलरी के आधार पर अकेले यह तय नहीं किया जा सकता कि वह उम्मीदवार OBC 'क्रीमी लेयर' में आता है या नहीं, और उसे आरक्षण से बाहर रखा जाना चाहिए या नहीं। केंद्र सरकार की इस अपील को खारिज करते हुए कि 11 मार्च, 2026 के फैसले को केवल भविष्य के मामलों में लागू किया जाए, कोर्ट ने कहा कि उसके सामने मौजूद उम्मीदवार आरक्षण के लाभ, और उसके परिणामस्वरूप मिलने वाली नियुक्ति तथा पदों के आवंटन के हकदार हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो चयन, नियुक्तियां, वरिष्ठता (सीनियरिटी) और पदोन्नतियां (प्रमोशन) पहले ही पूरी हो चुकी हैं, उन्हें फिर से नहीं खोला जाएगा। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और आर महादेवन की पीठ ने सरकार को फैसले को लागू करने के लिए दो महीने का अतिरिक्त समय दिया है। इससे पहले मार्च में सरकार को छह महीने का समय दिया गया था।
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केवल वेतन से तय नहीं हो सकता 'क्रीमी लेयर' का दर्जा
'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन' मामले में अदालत ने फैसला सुनाया था कि किसी व्यक्ति के 'क्रीमी लेयर' में होने का निर्धारण केवल उसके माता-पिता के वेतन या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) अथवा निजी कंपनी से होने वाली आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। 1993 के कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) के तहत, निर्धारित आय या संपत्ति की जांच के साथ-साथ माता-पिता के पद के स्तर और श्रेणी पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस फैसले को दोहराते हुए, पीठ ने कहा कि इस मामले से जुड़े उम्मीदवार OBC 'नॉन-क्रीमी लेयर' के दायरे में आते हैं और वे उन चयन प्रक्रियाओं में आरक्षण का लाभ पाने के हकदार हैं, जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया था।
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भविष्य में लागू करने की केंद्र की अपील खारिज
केंद्र ने अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए इस फैसले को भविष्य से लागू करने का आग्रह किया था। केंद्र का तर्क था कि अगर इसे पिछली और चल रही भर्तियों पर लागू किया जाता है, तो इससे ऐसे लोग प्रभावित हो सकते हैं जो इस मामले का हिस्सा नहीं थे, और इससे "पूरी तरह से प्रशासनिक अव्यवस्था" पैदा हो सकती है।
CJI सूर्यकांत के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट पर SC सख्त, केरल कांग्रेस के सभी पदाधिकारियों को अवमानना का नोटिस
सोशल मीडिया पर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ टिप्पणी करना कितना भारी पड़ सकता है, इसका एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केरल कांग्रेस के सभी पदाधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी किया है. अदालत ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष समेत सभी पदाधिकारियों से पूछा है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए. इस मामले में अदालत ने साफ किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे राजनीतिक दल अपनी सुविधा के हिसाब से देखें.
दूसरे शख्स को ढूंढ लिया जाएगा
पूरा विवाद 12 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर डाली गई एक पोस्ट से शुरू हुआ. यह पोस्ट केरल कांग्रेस के आधिकारिक एक्स अकाउंट से साझा की गई थी. इसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संबोधित करते हुए कहा गया था कि अगर कानून-व्यवस्था संभालना उनके अधिकार क्षेत्र का काम नहीं है, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए. पोस्ट में आगे यह भी कहा गया था कि उनकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को ढूंढ लिया जाएगा, जो यह जिम्मेदारी संभाल सके.
न्यायाधीश के पद की गरिमा के खिलाफ बताया
इस पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर काफी विवाद हुआ. कई लोगों ने इसे न्यायपालिका और मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा के खिलाफ बताया. मामला बढ़ने के बाद पोस्ट को हटा दिया गया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के वकील विनीत जिंदल ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले में कार्रवाई की मांग की. एक अन्य वकील श्रीजेश एसआर की ओर से भी इस संबंध में शिकायत की गई थी. इन शिकायतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और इसे याचिका के रूप में दर्ज किया.?
राजनीतिक फायदे या नुकसान के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए
शुक्रवार, 6 नवंबर को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई की. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि संविधान सबसे ऊपर है. कोई व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक संगठन संविधान से बड़ा नहीं हो सकता. न्यायपालिका की स्वतंत्रता देश के लोकतांत्रिक ढांचे का अहम हिस्सा है और इसे राजनीतिक फायदे या नुकसान के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय के फैसलों की आलोचना करने का अधिकार सभी को है. किसी फैसले से असहमति जताना या उस पर सवाल उठाना गलत नहीं है. लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता, जिससे न्यायपालिका को डराने या न्यायिक कामकाज में दखल देने की कोशिश हो. पीठ ने कहा कि अदालत की गरिमा और अधिकार को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
बिना शर्त माफी भी मांगी गई
सुनवाई के दौरान केरल कांग्रेस की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि विवादित पोस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की जानकारी या मंजूरी के बिना डाली गई थी. जैसे ही मामला सामने आया, पोस्ट को हटा दिया गया. पार्टी की ओर से बिना शर्त माफी भी मांगी गई है.
पार्टी की तरफ से यह भी बताया गया कि पोस्ट डालने वाले व्यक्ति विजय थोट्टाथिल को उसकी जिम्मेदारी से हटा दिया गया है. केरल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सनी जोसेफ ने पहले भी कहा था कि इस पोस्ट का पार्टी नेतृत्व से कोई लेना-देना नहीं था और न ही किसी ने मुख्य न्यायाधीश के इस्तीफे की मांग करने की अनुमति दी थी.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माफी की बात पर भी सवाल उठाया. जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि अदालत यह देखेगी कि माफी केवल कागज पर लिखी गई है या वास्तव में दिल से मांगी गई है. यानी सिर्फ गलती स्वीकार कर लेने से मामला अपने आप खत्म नहीं हो जाएगा. अदालत यह भी समझना चाहती है कि इस पोस्ट के पीछे क्या परिस्थितियां थीं और इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है.
पीठ ने केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और सचिव समेत सभी पदाधिकारियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है. उनसे जवाब मांगा गया है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए.
अदालत ने सहायता मांगी
इस मामले में अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं अरविंद दातार और सिद्धार्थ अग्रवाल की मदद लेने का संकेत दिया है. उन्हें न्याय मित्र (Amicus Curiae) के रूप में नियुक्त करने पर विचार किया गया है, ताकि वे अदालत को बता सकें कि मामले में सिविल अवमानना बनती है या आपराधिक अवमानना. इसके अलावा अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से भी अदालत ने सहायता मांगी है. यहां यह समझना जरूरी है कि अभी सुप्रीम कोर्ट ने केरल कांग्रेस के पदाधिकारियों को दोषी घोषित नहीं किया है. फिलहाल उन्हें नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया है. अदालत आगे उपलब्ध तथ्यों और जवाबों के आधार पर तय करेगी कि अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की जरूरत है या नहीं. इस मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर को होगी. अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि केरल कांग्रेस के पदाधिकारी अदालत के सामने क्या जवाब देते हैं और उनकी माफी को लेकर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है.
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