Bosch Share: ₹50,000 का है एक शेयर, अब बोर्ड से मिली स्टॉक स्प्लिट और बोनस की मंजूरी, 1 के बदले मिलेंगे 20 शेयर
Bosch Share: ऑटो कंपोनेंट कंपनी बॉश ने तिमाही नतीजों के साथ शेयरधारकों को स्टॉक स्प्लिट और बोनस का डबल तोहफा दिया, लेकिन शेयर में मुनाफावसूली दिखी। मुनाफे में ₹130 करोड़ का एकमुश्त फायदा भी शामिल है। जानिए आपके शेयरों का क्या होगा और नतीजे कैसे रहे
इजरायल में नेतन्याहू या आइजेनकोट किसकी बनेगी सरकार? ये हैं तीन संभावित रास्ते
इजरायल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर होता दिखाई दे रहा है. लंबे समय से प्रधानमंत्री पद पर काबिज बेंजामिन नेतन्याहू के सामने अब उनकी सत्ता बचाने की चुनौती है. अक्टूबर 2026 में हुए आम चुनाव के बाद उनके नेतृत्व वाला गठबंधन बहुमत से दूर रह गया है. दूसरी तरफ, विपक्षी नेता और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में 67 सांसदों का समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है.
पहली नजर में यह आंकड़ा आइजेनकोट की मजबूत स्थिति दिखाता है, लेकिन इजरायल की राजनीति में केवल सांसदों का समर्थन मिलना सरकार बनाने की गारंटी नहीं है. वजह है अलग-अलग दलों की विचारधारा, अरब पार्टियों को लेकर विपक्ष के भीतर मतभेद और अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों की शर्तें. ऐसे में सवाल है कि क्या आइजेनकोट नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर पाएंगे? इजरायल में नई सरकार बनाने के कौन-कौन से रास्ते हैं?
चुनाव में किसे कितनी सीटें मिलीं?
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है. इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं और सामान्य तौर पर सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है. 27 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला.
नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी गठबंधन को 53 सीटें मिलीं. वहीं, आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें हासिल हुईं. इन दोनों के अलावा अरब समुदाय से जुड़ी पार्टियों ने कुल 19 सीटें जीतकर चुनाव में अपनी ताकत बढ़ा दी.
इनमें रा'म (Ra'am) पार्टी को 8 और जॉइंट लिस्ट को 11 सीटें मिली हैं. इस तरह अरब पार्टियां सरकार गठन के लिहाज से निर्णायक स्थिति में आ गई हैं. यानी उनके समर्थन के बिना किसी भी बड़े राजनीतिक खेमे के लिए बहुमत जुटाना मुश्किल हो सकता है.
67 सांसदों का समर्थन मिलने के बाद भी आइजेनकोट के सामने मुश्किल क्यों?
5 नवंबर को अरब बहुल जॉइंट लिस्ट ने भी आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति के सामने समर्थन देने का फैसला किया. इससे पहले रा'म पार्टी भी उनके समर्थन की घोषणा कर चुकी थी. दोनों दलों के समर्थन के साथ आइजेनकोट के पक्ष में 67 सांसदों की सिफारिशें हो गईं.
इस समर्थन में आइजेनकोट की याशर पार्टी की 21, नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाले बी'याचद की 12, यायर गोलान के डेमोक्रेट्स की 8 और एविग्डोर लिबरमैन की यिसरायल बेतेनु की 7 सीटें भी शामिल हैं. इनके साथ जॉइंट लिस्ट की 11 और रा'म की 8 सीटें जुड़ती हैं.
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा. राष्ट्रपति के सामने किसी नेता को सरकार बनाने की सिफारिश करना और उसके नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होना दो अलग बातें हैं. अरब पार्टियों ने आइजेनकोट को समर्थन देने की बात कही है, लेकिन इससे यह तय नहीं हो जाता कि वे उनके मंत्रिमंडल का हिस्सा भी बनेंगी. दूसरी ओर, आइजेनकोट के कुछ सहयोगी दल अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर सरकार के पक्ष में नहीं हैं.
सरकार बनाने के तीन संभावित रास्ते
1. अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार
आइजेनकोट के सामने पहला रास्ता यह है कि वे रा'म और जॉइंट लिस्ट के समर्थन से सरकार बनाएं. दोनों के पास कुल 19 सीटें हैं. इनका साथ मिलने से विपक्षी खेमे का आंकड़ा 67 तक पहुंच जाता है.
हालांकि यह रास्ता राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील है. आइजेनकोट पहले भी अरब पार्टियों के समर्थन पर सरकार बनाने को लेकर असहमति जता चुके हैं. उनका कहना रहा है कि सरकार को इजरायल को यहूदी, लोकतांत्रिक, उदारवादी और समानता पर आधारित देश के रूप में स्वीकार करना होगा. साथ ही सभी नागरिकों के लिए सैन्य, राष्ट्रीय या नागरिक सेवा की शर्त भी उनकी प्रमुख प्राथमिकताओं में है.
अरब पार्टियों के लिए फिलिस्तीन का मुद्दा, गाजा में युद्ध और इजरायल के अरब नागरिकों के अधिकार अहम हैं. ऐसे में दोनों पक्षों के बीच साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनाना आसान नहीं होगा. इसके अलावा बेनेट और लिबरमैन जैसे सहयोगी भी अरब दलों पर निर्भर सरकार के विरोध में रहे हैं.
2. अति-रूढ़िवादी यहूदी दलों का साथ
दूसरा रास्ता अति-रूढ़िवादी यहूदी दल यूनाइटेड टोरा जूडिज्म (UTJ) का समर्थन हासिल करना है. यह दल लंबे समय से नेतन्याहू का सहयोगी रहा है, लेकिन सैन्य सेवा से धार्मिक छात्रों को छूट देने के मुद्दे पर उसकी नाराजगी बढ़ी है.
UTJ के सात सांसद हैं. यदि यह दल आइजेनकोट के पक्ष में मतदान करने के बजाय मतदान से दूर रहता है या तटस्थ रुख अपनाता है, तो सदन में सरकार के विश्वास मत का गणित बदल सकता है. इजरायल में विश्वास मत के लिए हर स्थिति में कुल 120 में से 61 वोट हासिल करना जरूरी नहीं होता. मतदान में हिस्सा लेने वाले सांसदों के बीच साधारण बहुमत भी सरकार के पक्ष में जा सकता है.
लेकिन इस रास्ते में भी बड़ी अड़चन है. आइजेनकोट सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय सेवा की बात करते हैं, जबकि UTJ धार्मिक छात्रों को सैन्य सेवा से छूट दिलाना चाहता है. दोनों पक्षों को अपनी प्रमुख मांगों पर समझौता करना पड़ सकता है.
3. नेतन्याहू के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार
तीसरा विकल्प राष्ट्रीय एकता सरकार का है, जिसमें नेतन्याहू और उनके विरोधी दल एक साथ आ सकते हैं. ऐसी सरकार में प्रधानमंत्री पद को लेकर बारी-बारी से जिम्मेदारी संभालने का समझौता भी हो सकता है.
इजरायल में पहले भी इस तरह की व्यवस्था देखने को मिली है. 2020 में नेतन्याहू और बेनी गैंट्ज के बीच सत्ता साझा करने का समझौता हुआ था, हालांकि यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकी. अक्टूबर 2023 में हमास के हमले के बाद भी गैंट्ज और आइजेनकोट नेतन्याहू की आपातकालीन युद्ध सरकार में शामिल हुए थे.
फिलहाल यह विकल्प मुश्किल नजर आता है, क्योंकि आइजेनकोट और उनके सहयोगियों ने चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का वादा किया था. ऐसे में उनके साथ सरकार बनाना राजनीतिक रूप से बड़ा यू-टर्न होगा.
राष्ट्रपति हर्जोग की भूमिका क्या है?
इजरायल में चुनाव के बाद राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग राजनीतिक दलों के नेताओं से बातचीत करते हैं. इसके बाद वह उस सांसद को सरकार बनाने का मौका देते हैं, जिसे वह बहुमत जुटाने में सबसे सक्षम मानते हैं. जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा सिफारिशें पाने वाले नेता को ही यह जिम्मेदारी मिले.
6 नवंबर तक राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया था कि दोनों खेमों के बीच मतभेद और संभावित सहयोगियों की शर्तों के कारण स्थिति आसान नहीं है. वह रविवार, 8 नवंबर को तय करने वाले हैं कि नेतन्याहू या आइजेनकोट में से किसे पहले सरकार बनाने का मौका दिया जाए. चुने गए नेता को सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलेंगे. जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकता है.
क्या नेतन्याहू फिर भी सत्ता में बने रह सकते हैं?
हां. अगर आइजेनकोट 67 सांसदों की सिफारिशों के बावजूद स्थिर गठबंधन नहीं बना पाते, तो नेतन्याहू की वापसी की संभावना बनी रहेगी. नई सरकार के शपथ लेने तक मौजूदा सरकार कामकाज संभालती रहती है. यानी सरकार गठन में देरी होने पर नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं.
अगर सरकार बनाने की कोशिशें नाकाम होती हैं तो राष्ट्रपति किसी दूसरे सांसद को मौका दे सकते हैं. आखिरकार कोई भी नेता बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता, तो देश में फिर से चुनाव कराए जा सकते हैं.
इस तरह इजरायल में फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है. आइजेनकोट के पास संख्या का समर्थन जरूर है, लेकिन उन्हें अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को एक मंच पर लाना होगा. दूसरी तरफ नेतन्याहू के लिए यह राजनीतिक संकट से निकलने का मौका भी बन सकता है. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि इजरायल में सत्ता परिवर्तन होगा या नेतन्याहू एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध का फायदा उठाकर कुर्सी बचाने में सफल रहेंगे.
यह भी पढ़ें - नेतन्याहू की सत्ता से विदाई तय? इजरायल में आइसेनकोट के पास पहुंचा बहुमत
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Moneycontrol
News Nation








