राजपाल यादव की एक और केस में बढ़ीं मुश्किलें, 25 लाख रुपए के चेक बाउंस मामले में गिरफ्तीरी के निर्देश
Rajpal Yadav Arrest Warrant: बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव की एक और केस में मुश्किलें बढ़ गई हैं. 25 लाख रुपए के चेक बाउंस केस में महू की अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया है.
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स्कूल में निर्माणाधीन खंभा गिरने से हुई थी 12 साल की छात्रा की मौत, SC ने स्कूल के दो पदाधिकारियों को दी राहत
महाराष्ट्र के एक आश्रम स्कूल में हुए दर्दनाक हादसे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. स्कूल परिसर में निर्माणाधीन खंभा गिरने से 12 साल की बच्ची की जान चली गई थी. इस घटना के बाद स्कूल के अध्यक्ष और हॉस्टल अधीक्षक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया है. हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया है कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि बच्ची की मौत के लिए किसी की जिम्मेदारी ही नहीं बनती. मामले में दूसरे आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रह सकती है.
12 साल की छात्रा के साथ यह हादसा हुआ
यह घटना 15 फरवरी 2020 की है. महाराष्ट्र के अमरावती जिले में स्थित एक आश्रम स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली 12 साल की छात्रा के साथ यह हादसा हुआ था. स्कूल परिसर में एक खंभे का निर्माण कार्य चल रहा था. इसी दौरान निर्माणाधीन खंभा अचानक बच्ची के ऊपर गिर गया. खंभे के नीचे दबने से उसे गंभीर चोटें आईं और उसकी मौत हो गई. जिस जगह बच्चे पढ़ाई करते हैं और अपना समय बिताते हैं, वहां इस तरह का हादसा होना अपने आप में बेहद गंभीर सवाल खड़े करता है.
निर्माण ठीक तरीके से नहीं कराया गया
बच्ची की मौत के बाद उसके पिता ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. उनका आरोप था कि स्कूल के निदेशक और हॉस्टल अधीक्षक ने निर्माण कार्य में घटिया सामग्री के इस्तेमाल और जरूरी सावधानियों की अनदेखी की. उनका कहना था कि खंभे का निर्माण ठीक तरीके से नहीं कराया गया था और सुरक्षा के इंतजाम भी नहीं किए गए थे. इसी शिकायत के आधार पर स्कूल के अध्यक्ष और हॉस्टल अधीक्षक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया.
इसके बाद दोनों आरोपियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया और अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला खत्म करने की मांग की. लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. हाईकोर्ट के सामने रखी गई जांच रिपोर्ट में निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए थे. केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट में सीमेंट, रेत और गिट्टी के मिश्रण का अनुपात सही नहीं पाया गया था. वहीं, घटनास्थल के पंचनामे में खंभे की नींव मजबूत नहीं होने की बात सामने आई थी.
जरूरी सावधानियां नहीं बरती गईं
हाईकोर्ट का मानना था कि निर्माण के दौरान जरूरी सावधानियां नहीं बरती गईं. भले ही किसी की जान लेने का इरादा न रहा हो, लेकिन खराब निर्माण सामग्री के इस्तेमाल से किसी को गंभीर नुकसान या मौत होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया था.
बच्ची की मौत होने की आशंका
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. आरोपियों की ओर से कहा गया कि उनके खिलाफ ऐसे सबूत नहीं हैं, जिनसे यह साबित हो कि उन्होंने जानबूझकर कोई ऐसा काम किया जिससे बच्ची की मौत होने की आशंका थी. उनका कहना था कि निर्माण कार्य ठेकेदार और उसकी टीम कर रही थी. इसलिए निर्माण की गुणवत्ता में कमी के लिए सीधे तौर पर उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
दूसरी तरफ, अभियोजन पक्ष ने कहा कि मामले में लापरवाही के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं. उसके मुताबिक, आरोपियों के खिलाफ कम से कम लापरवाही का मामला तो बनता ही है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 304 और 304A के बीच अंतर को समझाया.
अदालत ने कहा कि किसी की मौत हो जाने भर से हर लापरवाही आपराधिक अपराध नहीं बन जाती. इसके लिए यह देखना जरूरी है कि आरोपी को अपने काम के संभावित नतीजों की कितनी जानकारी थी और उसकी कथित लापरवाही का मौत से सीधा संबंध था या नहीं. सामान्य स्तर की लापरवाही और आपराधिक लापरवाही के बीच फर्क करना भी जरूरी है.
छात्र की मौत होने की पूरी आशंका
पीठ ने माना कि निर्माण कार्य में कमी या सावधानी न बरतने की बात सामने आ सकती है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि स्कूल के अध्यक्ष और हॉस्टल अधीक्षक को यह जानकारी थी कि इस निर्माण से किसी छात्र की मौत होने की पूरी आशंका है. अदालत के मुताबिक, निर्माण का वास्तविक काम ठेकेदार और उसकी टीम कर रही थी. इसलिए उपलब्ध सामग्री के आधार पर इन दोनों पदाधिकारियों को सीधे तौर पर बच्ची की मौत के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर इस हादसे के लिए किसी की शुरुआती तौर पर जिम्मेदारी बनती दिखाई देती है, तो वह निर्माण कार्य करने वाला ठेकेदार हो सकता है. हालांकि, अदालत ने यह टिप्पणी शुरुआती स्तर पर की है. इसका अंतिम फैसला मुकदमे में सामने आने वाले सबूतों के आधार पर ही होगा.
इस मामले में सबसे भावुक पल वह था, जब पीठ ने बच्ची की मौत पर अपना दुख जाहिर किया. अदालत ने कहा कि 12 साल की बच्ची का अपने ही स्कूल में खंभे के नीचे दबकर मर जाना बेहद पीड़ादायक है. माता-पिता किस दर्द से गुजर रहे होंगे, इसकी कल्पना भी की जा सकती है. लेकिन न्याय करते समय भावनाओं के बजाय कानून और उपलब्ध सबूतों को ध्यान में रखना जरूरी है.
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल के अध्यक्ष और हॉस्टल अधीक्षक के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि दूसरे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा कानून के मुताबिक आगे बढ़ सकता है.
घटना से कितना सीधा संबंध
इस फैसले से एक बात फिर सामने आई है कि किसी हादसे में मौत होना और किसी व्यक्ति का आपराधिक रूप से दोषी होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. अदालत को यह देखना पड़ता है कि किसकी क्या जिम्मेदारी थी और उसकी भूमिका का घटना से कितना सीधा संबंध था. हालांकि, इस कानूनी फैसले के बीच एक सवाल अब भी बना हुआ है कि स्कूलों में निर्माण कार्य के दौरान बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है.
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