सौरव गांगुली के नाम और पहचान का इस्तेमाल करना फिल्म दूसरा के निर्माताओं को पड़ा भारी, दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 करोड़ की बैंक गारंटी देने का दिया आदेश
क्रिकेट की दुनिया में जब भी सौरव गांगुली का नाम लिया जाता है, तो 2002 के नेटवेस्ट सीरीज फाइनल की याद जरूर आती है. लॉर्ड्स के मैदान पर भारत की ऐतिहासिक जीत और उसके बाद बालकनी में खड़े होकर गांगुली का अपनी शर्ट उतारकर लहराना आज भी क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में ताजा है. लेकिन अब यही यादगार पल एक फिल्म को लेकर कानूनी विवाद की वजह बन गया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म दूसरा के निर्माताओं को बड़ा झटका देते हुए सौरव गांगुली के व्यक्तित्व और प्रचार से जुड़े अधिकारों के उल्लंघन का मामला माना है. अदालत ने फिल्म बनाने वाली कंपनी को दो करोड़ रुपये की बिना शर्त बैंक गारंटी जमा कराने का निर्देश दिया है.
गांगुली का शर्ट उतारकर जश्न मनाना शामिल
यह पूरा मामला फिल्म दूसरा से जुड़ा है. इस फिल्म के निर्देशक अभिनव देव हैं और इसका निर्माण रमेश देव प्रोडक्शंस प्राइवेट लिमिटेड ने किया है. फिल्म के ट्रेलर और प्रचार में भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी के दौरान गांगुली के करियर से जुड़े कई खास पलों का इस्तेमाल किया गया था. इनमें 2002 के नेटवेस्ट सीरीज फाइनल में भारत की जीत और लॉर्ड्स की बालकनी में गांगुली का शर्ट उतारकर जश्न मनाना भी शामिल है.
व्यावसायिक फायदे के लिए किया जा रहा
गांगुली को इस बात पर आपत्ति थी कि उनकी पहचान और क्रिकेट करियर से जुड़े खास पलों का इस्तेमाल उनकी अनुमति के बिना फिल्म के प्रचार और व्यावसायिक फायदे के लिए किया जा रहा है. उनका कहना था कि किसी व्यक्ति की पहचान, नाम, तस्वीर और उससे जुड़ी लोकप्रियता को इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि उससे फिल्म को बाजार में फायदा मिले और संबंधित व्यक्ति की सहमति भी न ली जाए.
गांगुली की पहचान के इस्तेमाल पर रोक लगाई
इस मामले में सिर्फ गांगुली ही नहीं, बल्कि फिल्म निर्माण कंपनी लव फिल्म्स भी अदालत पहुंची थी. कंपनी का कहना था कि उसके पास गांगुली की जिंदगी और क्रिकेट करियर पर अधिकृत बायोपिक बनाने के विशेष अधिकार हैं. दोनों पक्षों ने अदालत से मांग की थी कि 'दूसरा' फिल्म की रिलीज, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज और प्रचार सामग्री के जरिए गांगुली की पहचान के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए.
दरअसल, गांगुली और लव फिल्म्स के बीच 5 अगस्त 2021 को एक समझौता हुआ था. इसके तहत कंपनी को गांगुली की जिंदगी, निजी अनुभवों और क्रिकेट करियर पर आधारित फिल्म समेत ऑडियो-विजुअल सामग्री बनाने और उसका व्यावसायिक इस्तेमाल करने के विशेष अधिकार दिए गए थे.
कंपनी का दावा है कि उसने इस अधिकृत बायोपिक पर काफी पैसा लगाया है. इस फिल्म का नाम दादा - द सौरव गांगुली स्टोरी रखा गया है. इसमें अभिनेता राजकुमार राव गांगुली की भूमिका निभाने वाले हैं और इसकी रिलीज 14 मई 2027 तय की गई है.
विवाद उस समय बढ़ा जब 12 अक्टूबर को दूसरा फिल्म का ट्रेलर और प्रचार अभियान सामने आया. गांगुली और लव फिल्म्स का आरोप था कि फिल्म में उनके क्रिकेट करियर की ऐसी घटनाओं का इस्तेमाल किया गया है, जिनसे दर्शकों को गांगुली की याद आती है. इससे लोगों के बीच यह धारणा भी बन सकती है कि गांगुली का इस फिल्म से कोई संबंध है या उन्होंने इसके लिए अपनी सहमति दी है.
विवाद खत्म करना आसान नहीं होगा
मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस तेजस करिया की पीठ के सामने हुई. अदालत ने पाया कि फिल्म की कहानी और गांगुली की पहचान से जुड़े पहलू एक-दूसरे से इतने जुड़े हुए हैं कि केवल कुछ हिस्सों को हटाकर विवाद खत्म करना आसान नहीं होगा.
इसी वजह से अदालत ने फिल्म पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय कुछ शर्तें लगाईं. कोर्ट ने निर्माताओं को निर्देश दिया कि फिल्म की शुरुआत और आखिर में हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में एक डिस्क्लेमर दिखाया जाए. इसमें साफ बताया जाए कि सौरव गांगुली ने फिल्म में अपनी पहचान और व्यक्तित्व के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी है. साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि फिल्म का उद्देश्य उनके व्यक्तित्व और प्रचार से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करना नहीं है.
अदालत ने कहा कि यह डिस्क्लेमर दो दिनों के भीतर फिल्म में शामिल करना होगा. इसके अलावा निर्माताओं को दो सप्ताह के अंदर कोर्ट के रजिस्ट्रार के पास दो करोड़ रुपये की बिना शर्त बैंक गारंटी जमा करानी होगी.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अगर फिल्म निर्माता इन शर्तों का पालन नहीं करते हैं, तो उन्हें फिल्म या उससे जुड़े किसी भी हिस्से का व्यावसायिक इस्तेमाल करने से रोका जा सकता है. यानी फिल्म का प्रचार, प्रदर्शन और उससे कमाई करने पर भी रोक लग सकती है.
इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है. फिल्म के निर्माताओं की तरफ से पहले यह दलील दी गई थी कि दूसरा सौरव गांगुली की बायोपिक नहीं है, बल्कि राजस्थान की एक लड़की तारा की काल्पनिक कहानी है. फिल्म में गांगुली के करियर की घटनाओं को उस किरदार के लिए प्रेरणा के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. निर्माताओं का यह भी कहना था कि मैच से जुड़े फुटेज के इस्तेमाल के लिए संबंधित अधिकार रखने वालों से अनुमति ली गई थी.
किसी मशहूर खिलाड़ी की पहचान
लेकिन अदालत के सामने सवाल सिर्फ मैच के फुटेज के कॉपीराइट का नहीं था. मामला यह भी था कि क्या किसी मशहूर खिलाड़ी की पहचान, उसके करियर के चर्चित पलों और लोकप्रियता का इस्तेमाल बिना उसकी सहमति के किसी फिल्म को व्यावसायिक फायदा पहुंचाने के लिए किया जा सकता है.
इस पूरे विवाद से एक बात साफ होती है कि किसी खिलाड़ी का नाम और उसकी पहचान केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं रहती. सालों की मेहनत से बनी लोकप्रियता भी उसकी अपनी पहचान का हिस्सा होती है. फिल्म, विज्ञापन या किसी दूसरे व्यावसायिक काम में इसका इस्तेमाल करते समय कानूनी अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है.
निर्माताओं के सामने साफ शर्तें रख दी
सौरव गांगुली के मामले में अब अदालत ने फिल्म निर्माताओं के सामने साफ शर्तें रख दी हैं. आने वाले समय में यह मामला इस बात को लेकर भी अहम हो सकता है कि किसी मशहूर खिलाड़ी के जीवन से जुड़ी घटनाओं को काल्पनिक कहानी में दिखाने की सीमा आखिर कहां तक हो सकती है.
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