Kerala High Court का निर्देश, SNDP नेता Vellappally Natesan पर दो हफ्ते में दाखिल हो चार्जशीट
कोच्चि, छह नवंबर केरल उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारी को माइक्रोफाइनेंस मामलों में एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लापल्ली नटेसन और अन्य आरोपियों के खिलाफ दो सप्ताह के भीतर आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति ए बदरुद्दीन ने शुक्रवार को अंतरिम आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की सरकारी मंजूरी लिए बिना भी आरोपपत्र दाखिल कर सकती है। अदालत ने कहा कि मुकदमे की मंजूरी की आवश्यकता को लेकर विवाद के कारण आरोपपत्र दाखिल करने में देरी हो रही थी।
मामले की जांच के बाद अदालत ने जांच अधिकारी को नटेसन और अन्य आरोपियों के खिलाफ दो सप्ताह के भीतर आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। जांच दल ने उच्च न्यायालय को बताया था कि उसने कई मामलों में आरोपपत्र तैयार कर लिए हैं और संबंधित अदालतों में उन्हें दाखिल करने के लिए मुकदमे की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इससे पहले, अदालत ने पिछड़ा वर्ग विकास विभाग (बीसीडीडी) के सचिव और सक्षम प्राधिकारी को मुकदमे की मंजूरी देने पर विचार करने का निर्देश दिया था।
हालांकि, बीसीडीडी ने अदालत को बताया कि इन मामलों में आरोपियों के खिलाफ मुकदमे के लिए सरकार की मंजूरी आवश्यक नहीं है। यह मामला चेरथला निवासी एम एस अनिल ने उच्च न्यायालय में दायर किया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि नटेसन के खिलाफ जांच धीमी गति से चल रही है।
अनिल ने दलील दी थी कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी आवश्यक है, क्योंकि उन्हें केंद्र या राज्य सरकार से वित्तीय सहायता मिली थी। इस मामले की जांच उच्च न्यायालय की निगरानी में की जा रही है। आरोप है कि केरल राज्य पिछड़ा वर्ग विकास निगम (केएसबीसीडीसी) की माइक्रोफाइनेंस योजना के तहत पिछड़े समुदायों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा आवंटित धन का दुरुपयोग किया गया।
यह धन श्री नारायण धर्म परिपालना (एसएनडीपी) योगम की इकाइयों के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को दिया जाना था। आरोप है कि 2003 से 2014 के बीच फर्जी स्वयं सहायता समूहों के नाम पर गलत उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा कर 15.85 करोड़ रुपये का गबन किया गया। एसएनडीपी योगम समाज सुधारक श्री नारायण गुरु के सिद्धांतों पर स्थापित एक सामाजिक संगठन है।
इसकी स्थापना इझावा समुदाय और अन्य वंचित वर्गों की सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए की गई थी।
गुवाहाटी HC ने आदिवासी कार्यकर्ता Pranab Doley पर लगा NSA हटाया, हिरासत रद्द
गुवाहाटी, छह नवंबर गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत रद्द कर दी। अदालत के फैसले के साथ ही इस कानून के तहत डोले की तीन महीने से अधिक समय से जारी हिरासत समाप्त हो गई। डोले को काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के पास प्रस्तावित पांच सितारा होटल के विरोध में हुए प्रदर्शनों से जुड़े एक मामले में 13 जुलाई को गुवाहाटी में गिरफ्तार किया गया था।
उन्हें गोलाघाट जिला कारागार में रखा गया था। सत्र न्यायालय ने 30 जुलाई को उन्हें जमानत दे दी थी लेकिन राज्य सरकार ने अगले ही दिन उन पर रासुका लगा दिया, जिसके कारण उन्हें जेल में ही रहना पड़ा। डोले के वकील शांतनु बोरठाकुर ने बताया कि न्यायमूर्ति कल्याण राय सुराना और न्यायमूर्ति सुस्मिता फुकन खौंड की खंडपीठ ने कार्यकर्ता की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत रद्द कर दी।
बोरठाकुर ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “सुनवाई पहले ही पूरी हो चुकी थी। अदालत ने आज (शुक्रवार को) अपना फैसला सुनाया। न्यायाधीशों ने हिरासत रद्द करने के कुछ आधार बताए हैं, लेकिन पूरे आदेश की प्रति उपलब्ध होने के बाद ही उनका विस्तृत ब्योरा पता चल सकेगा।” उन्होंने बताया कि न्यायाधीशों ने जिन आधारों का उल्लेख किया, उनमें से एक यह था कि डोले के खिलाफ लगाए गए आरोप पुराने थे और उनका मौजूदा स्थिति से सीधा संबंध नहीं था।
कार्यकर्ता के वकील ने बताया कि इसके अलावा, अधिकारियों ने हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उन दस्तावेजों और सामग्री की प्रतियां भी उपलब्ध नहीं कराई थीं, जिनके आधार पर हिरासत का आदेश जारी किया गया था और इससे उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। वकील ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति की ओर से दी गई अर्जी पर भी जल्द फैसला किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद डोले को दिन में ही हिरासत से रिहा किए जाने की संभावना है।
राज्य के राजनीतिक विभाग की ओर से जारी रासुका संबंधी आदेश में कहा गया था कि सरकार इस बात से संतुष्ट है कि डोले की गतिविधियां ‘सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ राज्य की सुरक्षा के लिए भी हानिकारक’ थीं। आदेश में यह भी कहा गया था कि रिहा होने पर उनके ऐसी गतिविधियां फिर शुरू करने की आशंका थी।
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