मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति में, तेहरान और नई दिल्ली के बीच संबंध रणनीतिक धैर्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण रहे हैं। इज़राइल के साथ भारत के बढ़ते रक्षा संबंधों और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उसकी व्यापक रणनीतिक साझेदारी के बावजूद, ईरान ने लगातार भारत को अपने करीब रखने का विकल्प चुना है, और अक्सर संयम और सूक्ष्मता का ऐसा लहजा अपनाया है जो अन्य साझेदारों के प्रति शायद ही कभी अपनाया जाता है। इसका ताजा उदाहरण मंगलवार को देखने को मिला जब दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने बातचीत की। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को अपने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बातचीत की और इसे हालिया घटनाक्रमों पर विस्तृत चर्चा बताया। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष संपर्क में बने रहने पर सहमत हुए।
पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद से यह उनकी तीसरी ऐसी बातचीत थी और ईरान द्वारा मोजतबा खामेनेई को देश का नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किए जाने के बाद यह पहली बातचीत थी। मोजतबा खामेनेई को उनके पिता, अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका-इजराइल के संयुक्त सैन्य हमले में हत्या के कुछ दिनों बाद देश का नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया था। वार्ता के बाद तेहरान ने एक विस्तृत बयान जारी कर अमेरिका और इज़राइल की कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की। हालांकि, बयान में यह भी कहा गया कि भारतीय विदेश मंत्री ने तेहरान और नई दिल्ली के बीच द्विपक्षीय संबंधों को जारी रखने और मजबूत करने के महत्व पर जोर देते हुए क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए निरंतर परामर्श की आवश्यकता पर बल दिया। इस बयान में ईरान का संयम एक सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है, जिससे संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ने के बावजूद तेहरान भारत को अपने पक्ष में रखने में रणनीतिक महत्व देखता है। ईरान समझता है कि नई दिल्ली की नीति सभी पक्षों के साथ खुले तौर पर कोई रुख अपनाए बिना बातचीत जारी रखने की है।
खामनेई की मृत्यु पर भारत द्वारा शोक व्यक्त करना भी तेहरान के प्रति नई दिल्ली के लंबे समय से अपनाए गए राजनयिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। भू-राजनीतिक तनाव के दौर में भी सम्मानजनक संबंध बनाए रखना। अमेरिका-ईरान के सीधे सैन्य टकराव से पहले भी, एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम ने स्थिति को जटिल बना दिया था। भारत द्वारा विकसित किए जा रहे चाबहार बंदरगाह परियोजना पर अमेरिका के प्रतिबंध। ईरान के लिए, चाबहार केवल एक बंदरगाह नहीं बल्कि एक रणनीतिक प्रवेश द्वार है जो प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने में सक्षम है। जब वाशिंगटन के अधिकतम दबाव अभियान के तहत भारत ने निवेश धीमा किया, तब भी तेहरान ने सार्वजनिक रूप से कड़ी आलोचना से परहेज किया। एक साक्षात्कार में अराघची ने चाबहार के लिए भारत द्वारा कम किए गए बजटीय आवंटन को दोनों पक्षों के लिए निराशाजनक बताया, लेकिन भविष्य में काम जारी रहने की उम्मीद जताई।
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टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर ने पूर्व क्रिकेटर और टीएमसी सासंद कीर्ति आजाद के एक बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। इसमें उन्होंने भारतीय टीम के मंदिर जाने पर सवाल उठाया था। कीर्ति आजाद ने एक पोस्ट में लिखा था कि ट्रॉफी 1.4 अरब भारतीयों की है, इसलिए ये सिर्फ एक धर्म की जीत नहीं होनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई है।
अब इस पूरे मामले पर गौतम गंभीर ने करारा जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि, इस सवाल का जवाब देना भी जरूरी नहीं है। ये पूरे देश के लिए बहुत बड़ा पल है और हमें इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाना चाहिए। ऐसी कुछ बातों को उठाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इससे टीम की उपलब्धियां छोटी हो जाती है। अगर आप उन 15 खिलाड़ियों की मेहनत को कम करके दिखाना चाहते हैं तो फिर कल कोई भी उठकर कुछ भी कह सकता है।
उन्होंने कहा कि, ये खिलाड़ियों के साथ भी गलत है। जरा सोचिए कि इन खिलाडियों ने क्या-क्या झेला और कितना दबाव सहा है। साउथ अफ्रीका से हार के बाद टीम पर कितना दबाव था। ऐसे समय में अगर इस तरह का बयान दिया जाता है तो आप अपने ही खिलाड़ियों और अपनी ही टीम को नीचा दिखाते हैं ऐसा करना बिल्कुल गलत है।
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