पाकिस्तानी आर्मी का अत्याचार, प्रदर्शकारियों पर ड्रोन से बरसाईं गोलियां, तीन की मौत
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में लगातार पाकिस्तानी आर्मी लोगों पर अत्याचार कर रही है. गुरुवार को सुबह पांच बजे अचानक लोगों के घरों पर ड्रोन से गोलियां बरसाईं गईं. इस हमले में कई लोगों के जख्मी होने की खबर है. अभी सूचना के आधार पर करीब 18 लोगों के घायल होने की खबर है. इस दौरान पाकिस्तान की ओर से सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं. यह घटना रावलकोट के उमर फारूक चौक पर हुई. स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तानी सेना जानबूझ कर घरों और निहत्थे लोगों को निशाना बना रही है. इस तरह का हमला जून 2026 में भी पाकिस्तानी आर्मी की ओर से किया गया था. इसमें करीब 153 लोगों की मौत हो गई थी.
UGC नियमों पर CJI ने उठाया नीति का सवाल, केंद्र सरकार ने कोर्ट में रखा अपना पक्ष
UGC Rule: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाए गए यूजीसी के नए नियमों को लेकर एक बड़ा मोड़ सामने आया है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह इन विवादित नियमों पर नए सिरे से विचार कर रही है. सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वस्त किया कि सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक विशेष समिति के गठन पर भी काम चल रहा है. इस पर मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने स्पष्ट टिप्पणी की कि देश की नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिससे हर युवा संतुष्ट और सुरक्षित महसूस करे. अदालत ने सरकार की इस दलील को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई को चार हफ्तों के लिए आगे बढ़ा दिया है.
कैंपस में समानता और छात्रों की चिंता
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सरकार का पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों की सभी चिंताओं का समग्र समाधान निकालना चाहती है. उनका कहना था कि प्रशासन का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी वर्ग के छात्र के मन में असंतोष, डर या असुरक्षा की भावना पैदा न हो. कोर्ट ने भी इस बात पर जोर दिया कि शिक्षण संस्थानों का माहौल ऐसा होना चाहिए जहां हर पृष्ठभूमि से आने वाला छात्र खुद को समान समझे. नीति निर्धारण में संतुलन बहुत जरूरी है ताकि सुधार की कोशिशें किसी नए विवाद की वजह न बन जाएं.
रोहित वेमुला और पायल तडवी से जुड़ा मामला
यह पूरा कानूनी विवाद अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ और उससे जुड़ी याचिकाओं से संबंधित है. वर्ष 2019 में रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इन दोनों होनहार छात्रों ने कैंपस में कथित रूप से गंभीर जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करने के बाद अपनी जान दे दी थी. इस याचिका में मांग की गई थी कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हाशिए पर खड़े वर्गों के छात्रों की सुरक्षा के लिए कड़े और प्रभावी नियम बनाए जाएं. इसी लंबी कानूनी प्रक्रिया और विचार विमर्श के बाद यूजीसी ने जनवरी 2026 में नए नियमों की अधिसूचना जारी की थी.
नए नियमों पर रोक और पुराना ढांचा
यूजीसी द्वारा 2026 के नियम लागू करने के तुरंत बाद उनके खिलाफ आपत्तियां उठने लगीं. सामान्य वर्ग के छात्रों ने इन नियमों को लेकर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई और इसे कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी. कोर्ट ने उस समय यह व्यवस्था दी थी कि जब तक इस मामले में कोई ठोस हल नहीं निकलता, तब तक 2012 के पुराने दिशा निर्देश ही प्रभावी रहेंगे. याचिकाकर्ताओं का मुख्य आक्षेप रेगुलेशन 3(1)(c) के तहत तय की गई जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर था.
परिभाषा को लेकर उपजा मुख्य विवाद
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नए नियमों में भेदभाव की जो रूपरेखा बनाई गई है, उसमें केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग पर ही ध्यान केंद्रित किया गया है. सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना था कि इस एकतरफा व्यवस्था से गैर आरक्षित वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव का खतरा बढ़ सकता है और झूठी शिकायतों की आशंका भी बनी रहेगी. दूसरी तरफ, अन्य पक्षों का कहना था कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को खत्म करने के लिए विशेष संरक्षण बेहद जरूरी है. अब सरकार द्वारा समिति बनाकर समीक्षा करने के संकेत के बाद उम्मीद जगी है कि सभी पक्षों को स्वीकार्य समाधान निकाला जा सकेगा.
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