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एआईएफ के डिस्क्लोजर से जुड़े नियमों में हो सकता है बदलाव, सेबी चीफ ने दिए संकेत

मुंबई, 11 मार्च (आईएएनएस)। बाजार नियामक भारत में अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (एआईएफ) के डिस्क्लोजर से जुड़े नियमों में बदलाव कर सकता है। सेबी चीफ ने बुधवार को एक कार्यक्रम में इस बात के संकेत दिए।

इंडियन वेंचर एंड अल्टरनेटिव कैपिटल एसोसिएशन (आईवीसीए) के इवेंट में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि एआईएफ अनुभवी निवेशक वर्ग के लिए हैं क्योंकि इन उत्पादों में अकसर गैर-तरल परिसंपत्तियां, जटिल संरचनाएं और लंबी अवधि शामिल होती हैं।

उन्होंने कहा कि प्रबंधकों और वितरकों को औपचारिक जोखिम डिस्क्लोजर से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना होगा कि निवेशक अपने द्वारा खरीदे जा रहे उत्पादों को समझें।

साथ ही कहा कि वित्तीय प्रणाली के हाशिये पर स्थित एआईएफ अब पूंजी निर्माण का एक प्रमुख स्रोत बन गए हैं।

पांडेय ने कहा कि एआईएफ नवीकरणीय ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर, आपूर्ति श्रृंखला और रणनीतिक विनिर्माण सहित आर्थिक मजबूती से जुड़े क्षेत्रों में पूंजी लगा रहे हैं। ये निवेश अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों को वित्त पोषित कर रहे हैं जहां पारंपरिक ऋणदाताओं की पहुंच सीमित हो सकती है।

सेबी चीफ ने संकेत दिया है कि नियामक एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाएगा जिसमें कड़ी निगरानी के साथ लक्षित लचीलापन भी शामिल होगा। एआईएफ इकाइयों और निवेशों का विमुद्रीकरण, साथ ही डिपॉजिटरी को शुद्ध परिसंपत्ति मूल्यों की रिपोर्टिंग जैसे कदम पारदर्शिता और निगरानी में सुधार लाने और पूरे सिस्टम में परिचालन जोखिम को कम करने के उद्देश्य से उठाए गए हैं।

साथ ही, केवल मान्यता प्राप्त निवेशकों को सेवाएं देने वाली योजनाएं अधिक लचीले नियामक ढांचे के तहत काम कर सकती हैं क्योंकि प्रतिभागियों को अनुभवी माना जाता है।

पांडेय ने यह भी कहा कि सेबी नई एआईएफ योजनाओं के लॉन्च में तेजी लाने के तरीकों का अध्ययन कर रहा है। विचाराधीन विकल्पों में से एक लाइटर लॉन्च मॉडल है, जिसमें मर्चेंट बैंकर की उचित जांच-पड़ताल नियामक अनुमोदनों को सुव्यवस्थित करने में सहायक हो सकती है।

भारत में मान्यता प्राप्त निवेशकों की संख्या मई 2025 में 649 से बढ़कर फरवरी 2026 तक 2,100 से अधिक हो गई है।

--आईएएनएस

एबीएस/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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Strait Of Hormuz Crisis: अगर बंद हुआ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तो भारत पर क्या होगा असर? ईंधन से लेकर रसोई गैस और खेती तक पड़ सकता है बड़ा संकट

Strait Of Hormuz Crisis: दुनिया की करीब 8 अरब आबादी आज ऊर्जा और ईंधन पर निर्भर है. हर दिन अरबों पाउंड तेल और गैस जमीन से निकाले जाते हैं ताकि दुनिया की अर्थव्यवस्था चलती रहे. भारत जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर करती है. यह एक संकरा समुद्री मार्ग है, लेकिन वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है. अगर इस रास्ते पर युद्ध, तनाव या किसी कारण से जहाजों की आवाजाही रुक जाती है, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर पड़ सकता है.

कच्चे तेल की आपूर्ति पर बड़ा खतरा

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. इसमें से करीब 40 से 60 प्रतिशत तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते ही भारत तक पहुंचता है. सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े तेल उत्पादक देश इसी मार्ग से तेल भेजते हैं. अगर यहां तनाव बढ़ता है और जहाजों की आवाजाही रुकती है, तो भारत के रणनीतिक तेल भंडार कुछ ही हफ्तों तक काम आएंगे. इसके बाद परिवहन, उद्योग और बिजली उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है और महंगाई तेजी से बढ़ सकती है.

रसोई गैस और एलपीजी की किल्लत

भारत में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा भी इसी समुद्री मार्ग से आता है. अगर यह रास्ता बाधित होता है तो घरों में इस्तेमाल होने वाली रसोई गैस की भारी कमी हो सकती है. इससे गैस सिलेंडर की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. इसके अलावा भारत अपनी एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का भी करीब 50 से 60 प्रतिशत आयात इसी रास्ते से करता है, जो बिजली घरों और बड़े उद्योगों के लिए जरूरी होती है.

खेती और खाद की आपूर्ति पर असर

भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां खेती के लिए उर्वरक यानी खाद की निरंतर आपूर्ति जरूरी होती है. भारत को मिलने वाले करीब 30 प्रतिशत उर्वरक भी इसी मार्ग से आते हैं. अगर समय पर खाद की आपूर्ति नहीं हुई तो फसल की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो सकता है.

उद्योग और निर्माण क्षेत्र पर भी संकट

ईंधन के अलावा पेट्रोकेमिकल उत्पाद, सिंथेटिक कपड़े बनाने का कच्चा माल, प्लास्टिक और पेंट उद्योग से जुड़ी कई चीजें भी इसी रास्ते से आती हैं. इसके अलावा निर्माण क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाला चूना पत्थर भी इसी मार्ग से भारत पहुंचता है. यदि यह आपूर्ति रुकती है तो कई उद्योगों में उत्पादन प्रभावित हो सकता है.

हीरा उद्योग पर भी असर

भारत का हीरा उद्योग भी इस समुद्री मार्ग पर काफी हद तक निर्भर है. इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात से आने वाले रफ डायमंड इसी रास्ते से भारत पहुंचते हैं. अगर यह मार्ग बंद होता है तो सूरत और मुंबई के हीरा कारोबार पर बड़ा असर पड़ सकता है.

क्या हैं भारत के विकल्प?

अगर लंबे समय तक बंद रहता है, तो भारत को अफ्रीका या अमेरिका जैसे दूर के देशों से तेल और गैस मंगाने पड़ सकते हैं. इससे परिवहन लागत बढ़ेगी और सामान पहुंचने में ज्यादा समय लगेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट लंबे समय तक चलता है तो एक महीने के भीतर ही बाजार में कई जरूरी चीजों की कमी और कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

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