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BARC ने निकाली 105 पदों पर भर्ती, 31 मार्च तक करें आवेदन, जानें सेलेक्शन प्रोसेस और पात्रता 

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, मुंबई ने फिजिकल, केमिकल और लाइफ साइंसेज क्षेत्र में जूनियर रिसर्च फैलोशिप पदों पर भर्ती (BARC Recruitment 2026) निकाली है। जिसके लिए आवेदन प्रक्रिया 10 मार्च से शुरू हो चुकी है। योग्य उम्मीदवार 31 मार्च 2026 तक आधिकारिक वेबसाइट https://barc.gov.in/ पर जाकर आवेदन कर सकते हैं।   इससे पहले अधिसूचना पढ़ने की …

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Sheetala Ashtami 2026: शीतलाष्टमी व्रत से होती है सौभाग्य में वृद्धि

शीतलाष्टमी का त्योहार पर मां शीतला के भक्त व्रत रखकर, विविध पकवान बनाते हैं और मां शीतला के चरणों में अर्पित करते हैं तो आइए हम आपको शीतलाष्टमी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 

जानें शीतलाष्टमी के बारे में 

हिंदू धर्म में होली के आठ दिनों बाद चैत्र मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि पर बसौड़ा या फिर शीतला अष्टमी का व्रत रखा जाता है। यह पावन पर्व रोग-शोक को हरने वाली मां शीतला की पूजा के लिए समर्पित है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार शीतला अष्टमी (बसोड़ा पूजा) के दिन मां शीतला की विधि-विधान से पूजा और उनके लिए व्रत रखने वाले साधक सौभाग्य और आरोग्य दोनों की प्राप्ति होती है। 

शीतलाष्टमी व्रत का शुभ मुहूर्त 

पंचांग के अनुसार शीतला अष्टमी (बसोड़ा पूजा) का व्रत इस साल 11 मार्च 2026 को रखा जाएगा। जिस चैत्र मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत पड़ता है, वह इस साल 11 मार्च 2026 को पूर्वाह्न 01:54 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 12 फरवरी 2026 को भोर के समय 04:19 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च 2026, बुधवार के दिन मनाया जाएगा। इस दिन देवी शीतला की पूजा के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त प्रात:काल 06:36 बजे से लेकर सायंकाल 06:27 बजे तक रहेगा।

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शीतलाष्टमी को इसलिए कहते है बसौड़ा

पंडितों के अनुसार शीतला माता की पूजा से जुड़े इस व्रत को बसौड़ा कहते हैं, इसका अर्थ बासी या फिर बसियौरा होता है। इस व्रत वाले दिन शीतला देवी को बासी खाने का भोग लगाया जाता है। इस पंरपरा के पीछे धार्मिक मान्यता है कि एक बार एक गांव के लोगों ने इस व्रत को करते हुए शीतला माता को गरमागरम खाने का भोग लगाया, जिसे खाते ही माता का मुंह जल गया था। ऐसा माना जाता है कि माता शीतला के नाराज होते ही उस गांव में आग लग गई और एक बुजुर्ग महिला की झोपड़ी को छोड़कर सभी घर जल कर राख हो गये। तब सभी ग्रामीण उस झोपड़ी में गये और उस बुजुर्ग महिला से पूंछा कि आखिर उसकी झोपड़ी क्यों नहीं जली तो उसने बताया कि उसके पास माता को भोग लगाने के लिए ताजा खाना नहीं था, इसलिए उसने माता को बासी भोजन का ही भोग लगा दिया। जिससे प्रसन्न होकर माता ने उस पर अपना आशीर्वाद बरसाया। तभी से शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है।

शीतलाष्टमी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा 

शास्त्रों के अनुसार शीतला माता को समर्पित बसौड़ा की पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठें और स्नान-ध्यान करने के बाद इस व्रत को विधि-विधान से करने का संकल्प करें। इस व्रत में देवी शीतला की भोग सामग्री एक दिन पूर्व ही बना लें. शीतला माता के इस व्रत में माता को भोग लगाने के लिए दाल-भात, मालपुआ, मिठाई, फल आदि अर्पित किया जाता है। देवी शीतला की कृपा पाने के लिए साधक को पूजा में इस व्रत की कथा और शीतला स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। पूजा के अंत में आरती करने के बाद साधक को भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगना चाहिए। 

जानें मां शीतला की महिमा के बारे में 

पंडितों के अनुसार मां शीतला का वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शीतला का स्वरूप शीतल और रोगों का नाश करने वाला बताया गया है। मां शीतला का वाहन गधा है। उनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम की पत्तियां होती हैं. गर्मी के मौसम में इनकी पूजा का महत्व अधिक बताया गया है।

बच्चों के सेहत के लिए विशेष लाभकारी है बसौड़ा की पूजा 

शीतला अष्टमी के दिन बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए मां शीतला को चांदी का एक चौकोर टुकड़ा अर्पित करना शुभ माना इसके बाद मां शीतला को खीर का भोग लगाएं और बच्चे के साथ बैठकर उनकी पूजा करें। पूजा के बाद उस चांदी के चौकोर टुकड़े को लाल धागे में बांधकर बच्चे के गले में पहना दें।

महिलाएं करती हैं बसौड़ा का व्रत 

पंडितों के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन कुछ महिलाएं प्रातःकाल स्नान कर व्रत रखती हैं और शीतला माता की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान माता को बासी पकवानों का भोग अर्पित करने के साथ ही नीम के पत्ते, हल्दी, रोली और जल चढ़ाया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं नीम की पत्तियों से घर की शुद्धि भी करती हैं, जिसे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी उपयोगी माना जाता है।

शीतलाष्टमी के दिन ये करें, होगा लाभ 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घर और आस-पास की साफ-सफाई रखें। माता शीतला के मंदिर जाकर दर्शन करें। नीम की पत्तियों का उपयोग करें। बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रार्थना करें।

शीतलाष्टमी पर ऐसा न करें, हो सकती है मुश्किल 

पंडितों के अनुसार घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाना चाहिए। ताजा भोजन बनाने से बचना चाहिए। घर में झगड़ा या कलह नहीं करना चाहिए। अशुद्धता या गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। इन नियमों का पालन करना इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

शीतलाष्टमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास 

शास्त्रों में शीतलाष्टमी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है, इस कथा के अनुसार एक नगर में लोग माता शीतला की पूजा नहीं करते थे। वे स्वच्छता और धार्मिक नियमों की भी उपेक्षा करते थे। एक दिन नगर में भयंकर महामारी फैल गई। लोग एक-एक करके रोगों की चपेट में आने लगे। तब एक वृद्ध महिला ने लोगों को माता शीतला की पूजा करने और घर-परिवार में स्वच्छता बनाए रखने की सलाह दी। जब लोगों ने माता की आराधना की और नियमों का पालन किया, तब धीरे-धीरे महामारी समाप्त हो गई। तभी से यह परंपरा प्रचलित हुई कि चैत्र कृष्ण अष्टमी को माता शीतला की पूजा की जाए और उनसे रोगों से रक्षा की प्रार्थना की जाए।

शीतलाष्टमी के बाद करें बासी भोजन से परहेज 

पंडितों के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन ही बासी भोजन का सेवन किया जाता है। इसे स्वास्थ्य के लिहाज से भी उचित माना जाता है। इसके बाद सामान्य दिनों में बासी भोजन खाने से परहेज किया जाता है, क्योंकि मौसम परिवर्तन के कारण इस दिन के बाद से बासी भोजन खराब होना शुरू हो जाता है। 

आधुनिक समय में शीतलाष्टमी का महत्व भी है खास 

आज के समय में जब दुनिया बार-बार महामारी और संक्रमण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब शीतलाष्टमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि स्वच्छता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और संयमित जीवन ही मानव जीवन की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

शीतला अष्टमी पर बनाए जाते हैं ये खास व्यंजन

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला अष्टमी के अवसर पर कई घरों में एक दिन पहले ही खास व्यंजन बनाए जाते हैं। इनमें पूरी, कढ़ी, मीठे चावल, हलवा और अन्य पारंपरिक पकवान शामिल होते हैं।अगले दिन सुबह सबसे पहले माता शीतला को इन व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और फिर पूरे परिवार के लोग प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करते हैं। कई स्थानों पर मंदिरों में भी विशेष पूजा और भंडारे का आयोजन किया जाता है।

- प्रज्ञा पाण्डेय 

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