लोकसभा में बड़ा राजनीतिक भूचाल: स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, 10 घंटे की मैराथन बहस शुरू; सत्ता-विपक्ष में तीखा टकराव
नई दिल्ली में संसद के बजट सत्र के दौरान भारतीय राजनीति में एक असाधारण और दुर्लभ घटनाक्रम सामने आया है। विपक्षी दलों ने एकजुट होकर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया है, जिसे सदन ने चर्चा के लिए स्वीकार भी कर लिया है।
यह कदम न केवल मौजूदा सत्र को बेहद गर्मा देने वाला है, बल्कि भारतीय संसदीय इतिहास में भी इसे एक महत्वपूर्ण पल माना जा रहा है। आजादी के बाद यह केवल तीसरी बार है जब लोकसभा के स्पीकर को हटाने की मांग औपचारिक प्रस्ताव के जरिए सदन में लाई गई है, जिससे संसद के भीतर संवैधानिक बहस और राजनीतिक टकराव तेज हो गया है।
Speaking during the debate on the no-confidence motion against the Speaker, Congress MP Gaurav Gogoi says, "This resolution has been brought as a responsibility to protect the dignity of the House, not personally against Om Birla." pic.twitter.com/xeH08wCWa2
— ANI (@ANI) March 10, 2026
Debate on no-confidence motion agaisnt Speaker: Congress MP Gaurav Gogoi says," In future when there will be research on parliamentary records, statistics will tell that Kiren Rijiju was the Parliamentary Affairs Minister, who interrupted the Opposition the most."
— ANI (@ANI) March 10, 2026
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अविश्वास प्रस्ताव और 10 घंटे की मैराथन चर्चा
कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने विपक्षी खेमे की ओर से स्पीकर को पद से हटाने का औपचारिक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ, जिसके बाद नियमों के तहत इसे बहस के लिए मंजूरी दी गई।
सदन ने इस गंभीर विषय पर गंभीरता से विचार करने के लिए कुल 10 घंटे का समय आवंटित किया है। विपक्ष ने स्पीकर पर सदन की कार्यवाही के दौरान पक्षपात करने और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की अनदेखी करने का सीधा आरोप लगाया है।
जगदंबिका पाल की अध्यक्षता पर संवैधानिक रार
प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होते ही सदन की अध्यक्षता को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा संवैधानिक टकराव पैदा हो गया। सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने रूल बुक का हवाला देते हुए आपत्ति जताई कि जब स्पीकर के खिलाफ ही प्रस्ताव हो, तो उनकी मंजूरी से नियुक्त व्यक्ति या पैनल का सदस्य अध्यक्षता नहीं कर सकता।
हालांकि, सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और निशिकांत दुबे ने अनुच्छेद 94 का बचाव करते हुए कहा कि डिप्टी स्पीकर की अनुपस्थिति में पैनल का कोई भी सदस्य सदन चलाने के लिए अधिकृत है।
डिप्टी स्पीकर का पद खाली होने पर सरकार की घेराबंदी
कांग्रेस ने इस मौके पर सरकार को 'संवैधानिक खालीपन' के मुद्दे पर बुरी तरह घेरा है। सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि पिछले कई वर्षों से डिप्टी स्पीकर का पद न भरकर सरकार ने लोकतांत्रिक परंपराओं का अपमान किया है।
विपक्ष का तर्क है कि यदि आज डिप्टी स्पीकर का पद भरा होता, तो अविश्वास प्रस्ताव जैसी महत्वपूर्ण चर्चा के समय अध्यक्षता को लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं होता। चर्चा के दौरान गौरव गोगोई ने सरकार की नीतियों और नेतृत्व पर तीखे प्रहार किए।
संसदीय इतिहास के पन्नों में दर्ज पुराने उदाहरण
देश की आजादी से अब तक स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव आने के केवल दो पिछले उदाहरण मौजूद हैं। सबसे पहला प्रस्ताव 18 दिसंबर 1954 को देश के पहले स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ लाया गया था, जो कि मतदान के बाद गिर गया था।
इसके बाद अप्रैल 1987 में तत्कालीन स्पीकर हुकम सिंह के खिलाफ भी विपक्ष ने निष्पक्षता के अभाव का आरोप लगाते हुए प्रस्ताव पेश किया था। वर्तमान प्रस्ताव भी उन्हीं ऐतिहासिक कानूनी बारीकियों और राजनीतिक उठापटक के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
Delhi High Court: ED ने केजरीवाल से जुड़े केस में दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रखा पक्ष, कहा- हमें सुने बिना दोषी ठहराया
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को राउज एवेन्यू कोर्ट ने बरी कर दिया था, लेकिन इस अब इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। ईडी ने आबकारी नीति भ्रष्टचार मामले में आरोपियों को बरी करते समय उसके खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई है। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की कोर्ट आज इस याचिका पर सुनवाई कर रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईडी की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू पेश हुए। ईडी की तरफ से दलील दी गई कि सीबीआई की कार्यवाही में किसी भी रूप में पक्षकार नहीं थी और प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज किए जाने से पहले उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। ईडी ने पक्ष रखा कि यह स्थिति प्राकृतिक न्याय और न्यायिक मर्यादा के मूलभूत सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।
एएसजी राजू ने कहा कि जज को इस मामले से निपटने का कोई अधिकार नहीं था... इससे हम प्रभावित होते हैं। ईडी को बिना सुनवाई के ही दोषी ठहरा दिया है। उन्होंने पक्ष रखा कि ऐसे मामले में जहां ईडी का कोई लेना-देना नहीं है, अगर माननीय न्यायाधीश ने हमारी बात सुनी होती तो वे ये टिप्पणियां कर सकते थे। तीसरे पक्ष का मामला होने के कारण जहां ईडी का कोई लेना देना नहीं है, तो ऐसी टिप्पणियां करने का कोई मतलब नहीं था।
उन्होंने कहा कि अपराध से प्राप्त धन का मामला जज के सामने नहीं था, उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार नहीं किया गया था। उन्होंने जांच एजेंसी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की। उधर, प्रतिवादियों में से एक के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम चौधरी ने कहा कि यह टिप्पणियां किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि इस मामले की खूबियों पर आधारित है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जज ने जो कहा है, वह जरूरी नहीं कि इसी मामले के संदर्भ में हो। कई बार जज इस तरह की सामान्य टिप्पणियां करते हैं। इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। कोर्ट ने कहा कि हमें श्री राजू की बात सिर्फ यह देखने के लिए सुननी है कि क्या इस तरह की टिप्पणियां की जा सकती थीं। हाईकोर्ट ने कहा कि हमारा सवाल यह है कि ये टिप्पणियां सामान्य हैं, इनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने कहा कि उन्होंने एक पैराग्राफ यहां से और दूसरा वहां से लिया है। इसे पूरे संदर्भ में समझना होगा। अन्यथा यह अधूरा विश्लेषण होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस पूरे फैसले को चुनौती दी गई है। जब उस मामले का फैसला किया जाएगा, तब इस पर भी फैसला पढ़ा जाएगा। आज नोटिस स्वीकार करेंगे और इस मामले की सुनवाई भी उसी दिन होगी। दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ की जाएगी।
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