ईरान, इजराइल जंग की आड़ में चीन ने रूस को बुरी तरह से दबोच लिया है। अगर आप बम, धमाकों और मिसाइल हमलों को ही जंग मानते हैं, तो चीन ने रूस के साथ जो किया है, उसे देखकर आपको जंग की नई परिभाषा याद करनी होगी। भारत कई बार रूस को चेतावनी दे चुका है। लेकिन रूस इस कदर चीन के जाल में फंस गया था कि होश उड़ा देने वाला खेल हो गया है। बार-बार गले मिलने वाला हमेशा पीठ पर ही वार करता है। चीन ने रूस के साथ वही कर दिया है। दरअसल चीन ने रूस की जड़े तो उसी समय काटनी शुरू कर दी थी जिस समय यूक्रेन जंग शुरू हुई थी। लेकिन पिछले तीन-चार महीनों में चीन ने रूस को घेरने की रफ्तार बढ़ा दी। इसी कड़ी में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक रूस की सुरक्षा एजेंसी एफएसबी ने चीन से जुड़ा एक दस्तावेज तैयार किया है। इस दस्तावेज में बताया गया है कि रूस और चीन की खुफिया एजेंसियों के बीच छिपी हुई जंग शुरू हो चुकी है।
दस्तावेज के मुताबिक भले ही राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया के सामने दोस्ती दिखाते हैं लेकिन रूस को अंदर ही अंदर डर था कि चीन उसकी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है। आठ पन्नों के इस दस्तावेज में रूस ने चीन को दुश्मन तक कहा है। और अब रूस को चीन से जो डर था वो सच साबित हो गया है। चीन ने रूस के दक्षिणी और पूर्वी इलाके में घेराबंदी कर ली है। सबसे पहले देखिए कि रूस के पूर्वी इलाके में चीन ने क्या किया है। दरअसल चीन ने रूस के व्लादीक शहर और अमूर ओब्लास्ट इलाके के एक आइलैंड को अपना बता दिया है। चीन ने कहा है कि यह दोनों इलाके 150 साल पहले हमारे थे और अब हमें यह वापस चाहिए। 2023 में जब रूस यूक्रेन से भयंकर जंग लड़ रहा था, उसी बीच चीन के पर्यावरण मंत्रालय ने एक सरकारी नक्शा जारी किया था। इस नक्शे में रूस के कई शहरों को चीनी नामों के साथ दिखाने का निर्देश दिया गया था। इसी नक्शे में रूस का पूर्वी शहर व्लादिवोस्तोक भी शामिल था।
आपको बता दें कि व्लादीक रूस का वो इलाका है जहां से एक कॉरिडोर बनाया गया है जो सीधे भारत के चेन्नई तक जुड़ रहा है। इस कॉरिडोर को व्लादीक चेन्नई कॉरिडोर कहा जाता है। आने वाले महीनों में रूस इसी कॉरिडोर के जरिए भारत को तेल और दूसरा सामान भेजने वाला था। लेकिन उससे पहले ही चीन ने इस इलाके पर दावा ठोक दिया है। आपको बता दें कि 2016 में पीएम मोदी पुतिन के साथ व्लादी स्टोक गए थे। उस समय भी रूस ने भारत को अपने इस डर के बारे में बताया था। रूस चाहता था कि व्लादीक में भारत की इन्वेस्टमेंट और हिस्सेदारी बढ़ जाए ताकि चीन इस इलाके पर कब्जा ना कर पाए। बहरहाल अब चीन के राष्ट्रवादी लोगों ने कहा है कि हमें रूस से यह इलाके छीनने होंगे। रूस के दक्षिणी इलाके पर चीन ने कैसा हमला किया है। पहली बार खुलासा हुआ है कि चीन ने सेंट्रल एशियाई देशों में ऐसी घुसपैठ की है जिसने मॉस्को को हिला दिया है।
कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहे कजाकिस्तान, किरगिस्तान, ताजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान में चीन ने रूस को पूरी तरह से धकेल दिया है। यह देश कभी रूस के पक्के दोस्त हुआ करते थे। रूस इस इलाके में वीटो पावर रखता था। मगर चीन ने यहां पर पूरा समीकरण बदल दिया है। रूस को उखाड़ फेंक चीन सेंट्रल एशिया में अब आर्थिक महाशक्ति बन गया है। चीन अपने हिसाब से यहां पर नियम और शर्तें तय कर रहा है। चीन इस इलाके में लॉजिस्टिक ऊर्जा, सप्लाई चेन, फाइनेंस और डिजिटल गवर्नेंस के अहम नेटवर्क सिस्टम्स को कंट्रोल कर रहा है। हैरानी की बात देखिए कि रूस सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहा क्योंकि रूस भी अब आर्थिक रूप से चीन पर इतना ज्यादा निर्भर हो चुका है कि वह सेंट्रल एशिया में चीन की मनमानी को रोकने की स्थिति तक में नहीं है। रूस अगर समय रहते ही चीन से दूर नहीं होता तो आने वाले समय में उसके लिए बहुत बुरा होने वाला है।
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इजराइल और अमेरिका ने ईरान के हर कोने में तबाही मचा दी है। ईरान के चप्पे-चप्पे पर मिसाइलें गिर रही हैं। तेहरान के शहरान फ्यूल डिपो में जबरदस्त आग लग गई है। ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम लगभग 80% तबाह हो चुका है। लेकिन इस भीषण बमबारी के बीच भी ईरान का एक ऐसा छोटा सा इलाका है जिसे इजराइल और अमेरिका अभी तक ना तो छू पाए हैं और शायद आगे भी नहीं छू पाएंगे। सिर्फ 20 स्क्वायर किलोमीटर का यह इलाका ईरान की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी। अगर इस इलाके को उड़ा दिया जाए तो कुछ ही घंटों में पूरा ईरान तबाह हो जाएगा। लेकिन ईरान के इस इलाके में ऐसा क्या है कि अमेरिका और इजराइल इसे छूने से डर रहे हैं। दरअसल ईरान में चल रही भीषण जंग के बीच यह चमत्कार खार्ग द्वीप में हुआ है। ईरान के खार्ग द्वीप में अमेरिका और इजराइल पत्ता तक नहीं हिला पाए हैं। खार्ग आइलैंड ईरान के तट से सिर्फ 25 कि.मी. दूर उत्तरी फारस की खाड़ी में स्थित है। यह एक 20 स्क्वायर किलोमीटर का कोरल द्वीप है। आपको बता दें कि खार्ग आइलैंड को ईरान की अर्थव्यवस्था का पावर हाउस कहा जाता है। ईरान का लगभग सारा कच्चा तेल यहीं से लोड होता है और दुनिया भर में जाता है। ईरान की अर्थव्यवस्था का 40% बजट यहीं से आता है। ईरान का सरकारी खजाना और ईरान की सेना की सैलरी इसी द्वीप से कमाए गए पैसों से आती है।
ऐसे में अगर अमेरिका या इजराइल ईरान के खार्ग द्वीप पर हमला कर देता है। तो ईरान की अर्थव्यवस्था कुछ ही दिनों में बर्बाद हो जाएगी। लेकिन इसी के साथ असल मायनों में तीसरा विश्व युद्ध भी शुरू हो जाएगा। हैरानी की बात देखिए कि ईरान ने खार्ग द्वीप पर केवल पुराने हॉक मिसाइल सिस्टम को ही तैनात कर रखा है। अमेरिका और इजराइल चाहे तो वह चुटकियों में इस पूरे द्वीप को उड़ा सकते हैं। लेकिन अमेरिका और इजराइल ऐसा नहीं कर पा रहे। इसकी तीन बड़ी वजह हैं। पहली यह कि खारक द्वीप पर अटैक करने का मतलब है कि बाजार से 20 लाख बैरल तेल गायब करना। अगर ऐसा हुआ तो ब्रैंड क्रूड ऑयल की कीमत $50 प्रति बैरल तक जा सकती है जो पूरी दुनिया को एक भयानक मंदी में झोंक सकता है। दूसरी वजह यह है कि चीन अपनी जरूरत का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 14 लाख बैरल तेल प्रतिदिन ईरान के खार्ग द्वीप से ही लेता है। खार्ग द्वीप पर हमला चीन को सीधे-सीधे युद्ध में उतरने का बहाना दे देगा। तीसरी वजह जिसके कारण इजरायल और अमेरिका खार्क द्वीप पर हमला करने से बच रहे हैं वो ये है कि तेल की कीमतें बढ़ेंगी।
खार्ग द्वीप क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
फ़ारसी खाड़ी में, ईरान की मुख्य भूमि के तट से लगभग 24 किलोमीटर दूर स्थित खारग द्वीप ईरान के लिए एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण भूभाग है, क्योंकि ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने से पहले इसी द्वीप से होकर गुजरता है। सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस द्वीप की लोडिंग क्षमता लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन है। ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए खार्ग द्वीप का महत्व इसे एक खतरनाक स्थिति में डालता है, खासकर चल रहे युद्ध के दौरान जब अमेरिका और इज़राइल ईरान को कमजोर करने के तरीके तलाश रहे हैं। हालांकि, सीएनबीसी की रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि द्वीप पर नियंत्रण तभी संभव होगा जब अमेरिका और इज़राइल ईरान में जमीनी सेना भेजें। हालांकि अमेरिका अभी ईरान में जमीनी सेना भेजने के लिए उत्सुक नहीं दिख रहा है, राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐसी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया है। शनिवार को ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा कि जमीनी सेना की तैनाती संभव है, लेकिन केवल "बहुत अच्छे कारण" होने पर ही। ट्रंप ने कहा था अगर हमने कभी ऐसा किया, तो ईरानी] इतने तबाह हो जाएंगे कि वे जमीनी स्तर पर लड़ने में सक्षम नहीं होंगे। शायद किसी समय हम ऐसा करेंगे। हमने अभी तक ऐसा नहीं किया है। हम अभी ऐसा नहीं करेंगे। शायद हम बाद में ऐसा करेंगे।
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