निकल गई अकड़...मिड टर्म चुनाव में कैसे भारतवंशियों ने धुआं उड़ा दिया?
अमेरिका में मिड टर्म चुनाव के नतीजों में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन को जोरदार झटका लगता नजर आ रहा है। वहीं विपक्षी दल डेमोक्रेट्स ने अच्छी खासी बढ़त बनाई है। इस चुनाव में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव की सभी 435 सीटों यानी कि भारत के हिसाब से समझे तो लोकसभा की सीटें और वहीं सीनेट की सिर्फ 35 सीटों यानी भारत के हिसाब से राज्यसभा और 36 राज्यों के गवर्नर पदों पर मुकाबला हुआ है। अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों के शुरुआती नतीजों में कई भारतवंशी उम्मीदवारों ने शानदार प्रदर्शन किया है। डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार और पूर्व स्कूल प्रिंसिपल पिया डांडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से रिपब्लिकन नेता कैसी अस्कर को हराकर जीत दर्ज की है। वे अमेरिकी कांग्रेस में पहुंचने वाली भारतीय मूल की दूसरी महिला बनी हैं। भारतीय मूल के नेता सुहास सुब्रह्मण्यम ने भी इन चुनावों में जीत हासिल की है। ओहायो के गवर्नर पद के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार विवेक रामास्वामी फिलहाल डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन से पीछे चल रहे हैं। रो खन्ना, प्रमिला जयपाल और अमी बेरा जैसे भारतवंशी नेता भी अपनी-अपनी सीटों पर चुनावी मैदान में हैं।
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चुनाव परिणाम ना केवल यूएस कांग्रेस यानी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर नियंत्रण तय करेंगे, बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के शेष हिस्से और उनके बिल संबंधी एजेंडे की दिशा भी अब निर्धारित करेंगे। सीबीएस न्यूज़ के एग्जिट पोल के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग भी 38% दर्ज की गई है जो कि गिरावट आई है। मिड टर्म चुनाव के दौरान किसी मौजूदा राष्ट्रपति के लिए यह सबसे कम अप्रूवल रेटिंग में से एक मानी जा रही है। एग्जिट पोल के अनुसार लगभग 3/4 मतदाता देश की वर्तमान दिशा को लेकर असंतुष्ट है। साथ ही 2 साल पहले की तुलना में अर्थव्यवस्था को लेकर नकारात्मक सोच रखने वालों की संख्या भी बढ़ गई है। यानी कि ट्रंप के ट्रंप को लेकर निराशा बढ़ी है। सीएनएन के वोटर पोल के शुरुआती आंकड़ों में पता चला है कि 10 में से छह मतदाता राष्ट्रपति ट्रंप के कामकाज को लेकर असंतुष्ट हैं। बढ़ती महंगाई, आर्थिक चुनौतियां और राजनीतिक ध्रुवीकरण मतदाताओं के प्रमुख मुद्दे बनकर उभरे हैं। वोटर पोल में यह भी सामने आया है कि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप का समर्थन करने वाले लगभग पांचवें हिस्से के मतदाता अब उनके प्रदर्शन से असंतुष्ट हैं।
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सर्वे के अनुसार लगभग 3/4 मतदाताओं ने कहा है कि देश की वर्तमान स्थिति से वह खुश नहीं है और उन्हें लगता है कि हालात खराब हुए हैं। लगभग 40% मतदाताओं ने खुद को ट्रंप के कार्यकाल से नाराज बताया और बदलाव की मांग की है। यही है कि यह नतीजे अब बदलते नजर आ रहे हैं। जहां ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन को जोरदार झटका लगता जा रहा है। वहीं विपक्षी दल डेमोक्रेट्स यहां बढ़त बनाए हुए हैं।
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अमेरिका में एक ऐसा चुनाव हो रहा है जिस पर सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। इस चुनाव में एक तरफ हैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार माइक रोजर्स और दूसरी तरफ है डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल सैयद। अब इस मुकाबले में ऐसा क्या खास है कि इसकी चर्चा अमेरिका से लेकर यूरोप और एशिया तक हो रही है? तो समझिए दरअसल अगर अब्दुल अल सैयद चुनाव जीत जाते हैं तो वो अमेरिकी इतिहास में पहले मुस्लिम अमेरिकी सीनेट बन सकते हैं। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। इस एक सीट का फैसला अमेरिकी संसद के सबसे ताकतवर सदनों में से एक यानी सीनेट का राजनीतिक संतुलन भी बदल सकता है। अगर सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत खो देती है तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए आने वाले 2 साल में कानून पास कराना, अपनी नीतियों को आगे बढ़ाना और कई अहम नियुक्तियां करवाना मुश्किल हो सकता है। यानी मिशिगन की एक सीट पर मुकाबला है। लेकिन इसके राजनीतिक मायने पूरे अमेरिका के लिए हैं।
अमेरिका में इस समय राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो रहा है। डोनाल्ड ट्रंप जनवरी 2025 में दूसरी बार राष्ट्रपति बने थे। अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल 4 साल का होता है और अगला राष्ट्रपति चुनाव 2028 में होना है। लेकिन इस बीच अमेरिकी संसद के चुनाव होते हैं जिन्हें मिड टर्म इलेक्शन कहा जाता है। मिड टर्म यानी राष्ट्रपति के 4 साल के कार्यकाल के बीच होने वाले चुनाव। अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहते हैं और इसके दो सदन हैं। पहला है हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स जिसे आसान भाषा में अमेरिका की लोकसभा समझ सकते हैं। दूसरा है सेनेट जिसे मोटे तौर पर भारत की राज्यसभा से समझा जा सकता है। हालांकि दोनों देशों की संसदीय व्यवस्था में कई बड़े अंतर हैं। सबसे पहले हाउस की बात करते हैं। इसमें कुल 435 वोटिंग सदस्य होते हैं और हर राज्य को उसकी आबादी के हिसाब से सीटें मिलती हैं। वहीं ज्यादा आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें और कम आबादी वाले राज्यों को कम सीटें मिलती हैं। हाउस के सदस्यों का कार्यकाल सिर्फ 2 साल होता है। इसलिए हर दो साल में हाउस की सभी 435 सीटों पर चुनाव होते हैं। यानी राष्ट्रपति चुनाव हो या मिड टर्म चुनाव हाउस की हर सीट पर जनता वोट करती है।
सीनेट का चुनाव क्या होता है?
अमेरिका में कुल 50 राज्य हैं और हर राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं। इस तरह सीनेट में कुल 100 सदस्य होते हैं। यहां दिलचस्प बात यह है कि चाहे कैलिफोर्निया जैसा बड़ा राज्य हो या आबादी के लिहाज से छोटा राज्य दोनों को सीनेट में बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है। यानी हर राज्य के दो सेनेटर और इनका कार्यकाल छ साल का होता है। लेकिन सभी 100 सेटर एक साथ चुने जाते हैं। एक साथ नहीं चुने जाते हैं। ये बड़ी महत्वपूर्ण बात। सभी सभी जो 100 सीनिटर हैं वो एक साथ नहीं चुने जाते। हर दो साल में लगभग 1/3 सीटों पर चुनाव होता है। इसी वजह से मिड टर्म चुनाव में सीनेट की पूरी 100 सीटों पर नहीं बल्कि कुछ सीटों पर ही मुकाबला होता है।
सीनेट इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
राष्ट्रपति अमेरिकी सरकार चलाते हैं। राष्ट्रपति जी हां, अमेरिका की सरकार चलाते हैं। लेकिन उन्हें हर काम के लिए संसद के साथ तालमेल भी रखना पड़ता है। कानून बनाने के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है। बजट और सरकारी खर्च से जुड़े विधेयकों में हाउस की अहम भूमिका होती है। वहीं राष्ट्रपति के कई बड़े अधिकारियों और संघीय जजों की नियुक्तियों को मंजूरी देने का अधिकार सीनेट के पास होता है। तो अंतरराष्ट्रीय संधियों की पुष्टि में भी सीनेट की अहम भूमिका है। यानी अगर राष्ट्रपति की पार्टी के पास सीनेट का बहुमत नहीं है तो सरकार के कई अहम फैसलों पर राजनीतिक और संसदीय अड़चनें बढ़ सकती हैं।
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