Video: 7 साल से न्यूजीलैंड में वनडे मैच जीतने को तरस रही टीम इंडिया की इस बार कैसी है तैयारी
भारत और न्यूजीलैंड के बीच 5 मैचों की वनडे सीरीज शुरू होने जा रही है, जिसमें टीम इंडिया अपनी जीत की लय को बरकरार रखने की कोशिश करेगी। शुभमन गिल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में टीम के माहौल, खिलाड़ियों की भूमिका, और हार्दिक पांड्या की गैरमौजूदगी पर चर्चा हुई। टीम के सीनियर खिलाड़ी जैसे विराट कोहली और रोहित शर्मा टीम के लिए अहम हैं, जबकि युवा खिलाड़ियों में भी मच्योरिटी दिख रही है। टीम की बल्लेबाजी मजबूत है और फील्डिंग व प्लानिंग भी अच्छी रही है। हालांकि, हार्दिक पांड्या की फिटनेस चिंता का विषय है और टीम को 100% फिट ऑलराउंडर की जरूरत है। गेंदबाजी में जसप्रीत बुमराह की अनुपस्थिति चुनौतीपूर्ण है, और नए गेंदबाजों को आजमाया जा रहा है, जिनमें अर्शदीप की यॉर्कर और लंबे स्पेल की क्षमता सराही गई है, लेकिन लगातार 10 ओवर तक अच्छा प्रदर्शन जरूरी है। कुल मिलाकर, टीम इंडिया की बल्लेबाजी मजबूत है, लेकिन गेंदबाजी और ऑलराउंडर की कमी जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, जिन पर काम करने की जरूरत है।
Delhi Riots: मस्जिद में आगजनी के मामले में पांच आरोपी बरी, अदालत ने गवाहों के बयानों पर उठाए सवाल
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 के दौरान हुए दंगों से जुड़े एक मामले में दिल्ली की अदालत ने पांच लोगों को बरी कर दिया है. मामला करावल नगर इलाके की अल्लाह वाली मस्जिद में कथित तोड़फोड़ और आगजनी से जुड़ा था. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ऐसे ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया, जिनके आधार पर उनके अपराध को संदेह से परे साबित किया जा सके.
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने अंकित, सौरभ शर्मा, रोहित, राहुल कुमार और सचिन को सभी आरोपों से बरी कर दिया. अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और पुलिस की ओर से पेश किए गए सीसीटीवी फुटेज को कानूनी रूप से स्वीकार करने में कमी को फैसले का अहम आधार माना.
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 24 फरवरी 2020 को अल्लाह वाली मस्जिद में तोड़फोड़ और आगजनी की गई थी. आरोप था कि मस्जिद के बाहर बने चबूतरे पर एक मूर्ति रखी गई और इमारत की चार मंजिलों पर रखे सामान में आग लगा दी गई.पुलिस ने मामले की जांच के दौरान आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज जुटाई थी. इसी फुटेज और गवाहों के बयानों के आधार पर पांचों आरोपियों की पहचान कथित दंगाई भीड़ के सदस्यों के रूप में की गई. मामले में आरोपियों पर दंगा करने, हथियारों के साथ दंगा करने, गैरकानूनी जमावड़ा, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और आगजनी जैसे आरोप लगाए गए थे.
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने कुल 14 गवाहों के बयान दर्ज कराए. इनमें दो पुलिसकर्मी भी शामिल थे, जिन्होंने घटना देखने और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान करने का दावा किया था.
घटनाओं के समय को लेकर सामने आया अंतर
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की कहानी में मस्जिद में तोड़फोड़ और आगजनी की दो अलग-अलग घटनाओं का जिक्र था. पहली घटना 24 फरवरी 2020 की रात करीब 11 बजे और दूसरी घटना 25 फरवरी को सुबह करीब 11 बजे होने का दावा किया गया था. हालांकि, मस्जिद के सामने रहने वाले स्वतंत्र गवाह अली अहमद ने अदालत को बताया कि उसने घटना शाम करीब 8 बजकर 15 मिनट पर देखी थी. उसके मुताबिक, भीड़ ने मस्जिद में तोड़फोड़ की और आग लगाई थी. लेकिन उसने पांचों आरोपियों में से किसी की भी पहचान नहीं की.
अदालत ने इस गवाही को महत्वपूर्ण माना. उसका कहना था कि 24 फरवरी की रात 11 बजे हुई बताई गई घटना और उसमें इन पांचों आरोपियों की मौजूदगी साबित करने के लिए कोई गवाह सामने नहीं आया.गवाह अली अहमद ने यह भी बताया था कि मस्जिद में तोड़फोड़ की घटना केवल एक बार हुई थी. घटना के बाद वह करीब चार दिनों तक अपने घर में ही रहा था. यह बयान अभियोजन पक्ष की ओर से बताई गई दो अलग-अलग घटनाओं की कहानी से मेल नहीं खाता था.
पुलिसकर्मियों के बयानों में भी विरोधाभास
अदालत ने पुलिस के दो गवाहों एएसआई जुनैद और एएसआई मिथिलेश के बयानों की भी जांच की. दोनों ने 25 फरवरी को सुबह करीब 11 बजे हुई कथित घटना के संबंध में गवाही दी थी. लेकिन सुनवाई के दौरान उनके बयानों में कई अंतर सामने आए. अदालत ने पाया कि दोनों पुलिसकर्मी घटनास्थल पर अपनी मौजूदगी और उस समय उनकी गतिविधियों के बारे में एक जैसी बात नहीं बता सके. न्यायाधीश ने माना कि इन विरोधाभासों के चलते दोनों पुलिसकर्मियों की गवाही पर भरोसा करके आरोपियों को घटना से जोड़ना उचित नहीं होगा. अदालत के मुताबिक, उनके बयान आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय नहीं थे.
सीसीटीवी फुटेज भी अदालत में स्वीकार नहीं
इस मामले में पुलिस ने आरोपियों की पहचान साबित करने के लिए सीसीटीवी फुटेज पर भी भरोसा किया था. लेकिन अदालत ने इस सबूत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को अदालत में सबूत के तौर पर पेश करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत जरूरी प्रमाणपत्र देना होता है. अदालत ने पाया कि पुलिस की ओर से दिया गया प्रमाणपत्र कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता था. सीसीटीवी फुटेज वाली डीवीडी के संबंध में भी वैध प्रमाणपत्र साबित नहीं किया जा सका. ऐसे में अदालत ने फुटेज को आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल करने योग्य सबूत नहीं माना.
संदेह का लाभ देकर किया बरी
अदालत ने गवाहों के बयानों में अंतर, पुलिसकर्मियों की गवाही की विश्वसनीयता और सीसीटीवी फुटेज से जुड़ी कानूनी कमी को देखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है. इसी आधार पर पांचों आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया और सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.
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