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ईरानी एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के बाद ईरान ने इजरायली रिफाइनरी पर किया हमला

तेहरान, 8 मार्च (आईएएनएस)। ईरानी एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के बाद ईरान ने इजरायली रिफाइनरी पर हमला किया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) ने जानकारी दी। आईआरजीसी बताया कि उसने शनिवार रात इजरायल के हाइफा में एक रिफाइनरी पर हमला किया, जो उसके अपने ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बदले में किया गया था।

ईरान के राष्ट्रीय सैन्य बल (आईआरजीसी) ने अपने आधिकारिक समाचार आउटलेट सेपाह न्यूज़ पर जारी एक बयान में कहा कि हाइफा रिफाइनरी पर हमले के जवाब में खेइबरशेकान मिसाइलों से हमला किया गया। इस बीच, सिन्हुआ समाचार एजेंसी ने बताया कि राष्ट्रीय ईरानी ऑयल रिफाइनरी और वितरण कंपनी ने कहा कि शनिवार रात को अमेरिका-इजरायल के हमलों में देश का ऊर्जा ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया।

कंपनी ने कहा कि तेहरान और अल्बोरज प्रांतों में कई तेल डिपो मिसाइलों की चपेट में आ गए और उनमें आग लग गई। अग्निशमन दल आग पर काबू पाने में लगे हुए हैं। शनिवार रात को तेहरान पर भारी हमले किए गए। ईरानी राजधानी के विभिन्न हिस्सों में जोरदार विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं।

28 फरवरी को, इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका ने तेहरान और कई अन्य ईरानी शहरों पर संयुक्त हमले किए थे। जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के साथ-साथ उनके परिवार के कुछ सदस्यों, उच्च पदस्थ सैन्य कमांडरों और नागरिकों सहित कई अन्य लोग मारे गए। ईरान ने मध्य पूर्व में इजरायल और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर मिसाइल और कई ड्रोन हमलों के माध्यम से जवाब दिया।

ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने इन हमलों को लेकर शनिवार को कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल का उद्देश्य देश को तोड़ना और विभाजित करना है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से यह स्वीकार करने की बात कही कि उन्होंने गलती की है और इजरायल से धोखा खा गए हैं।

लारीजानी ने कहा कि अमेरिकियों ने हमारे लोगों के दिलों पर गहरा घाव छोड़ा है। हम उन्हें नहीं भूलेंगे। अरबिया को दिए एक साक्षात्कार में ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि वह और उनके सऊदी समकक्ष फैसल बिन फरहान अल सऊद लगातार एक-दूसरे के संपर्क में हैं। उन्होंने आगे कहा कि सऊदी अधिकारियों ने ईरान को आश्वासन दिया है कि वे अपने क्षेत्र, हवाई क्षेत्र या जलक्षेत्र को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देंगे।

--आईएएनएस

एसडी/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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सरिता ने बनाया रिश्वतखोरों की आवाज पहचानने वाला सिस्टम:30 हजार केस की जांच कर चुकीं यजुला, छोटे सुराग से बड़े क्राइम सॉल्व करने वाली साइंटिस्ट

हत्या के बाद जमीन पर पड़ी खून की बूंद…मोबाइल में रिकॉर्ड आवाज…कपड़ों पर मिला DNA जो खुली आंखों से दिखाई नहीं देता। अक्सर यही छोटे-छोटे सुराग बड़े अपराधों का सच सामने लाते हैं। राजस्थान में इन सुरागों की मदद से गंभीर अपराधों की गुत्थियां सुलझाने में स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की महिला वैज्ञानिक अहम भूमिका निभा रही हैं। हत्या, दुष्कर्म, साइबर अपराध जैसे संवेदनशील मामलों में डीएनए प्रोफाइलिंग से लेकर वॉइस एनालिसिस तक इनकी जांच अक्सर निर्णायक साबित होती है। महिला दिवस पर पढ़िए ऐसी ही महिला वैज्ञानिकों की कहानी… 2008 में जयपुर के गोविंदगढ़ में एक ही परिवार के चार लोगों की मौत हो गई। महीनों की जांच के बावजूद पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। विसरा और अन्य सैंपल जांच के लिए स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी भेजे गए। टॉक्सिकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. यजुला गुप्ता ने साक्ष्यों की जांच की। जांच में सामने आया कि चारों को पहले नशे का इंजेक्शन दिया गया। फिर दर्द निवारक दवा और अंत में जहरीला इंजेक्शन लगाकर हत्या की गई। यह खुलासा मृतकों के शरीर पर मिले कैनुला के बेहद बारीक निशानों से हुआ। इसी आधार पर हुई पूछताछ में परिवार के ही मेल नर्स बेटे ने प्रॉपर्टी के लालच में पूरे परिवार की हत्या करना कबूल कर लिया। इसी तरह चर्चित यूट्यूबर एल्विश यादव की रेव पार्टियों में सांप के जहर के इस्तेमाल के मामले में भी सैंपल जांच के लिए डॉ. यजुला के पास भेजे गए थे। उनकी रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि सांप के जहर को अंडे की जर्दी में इंजेक्ट कर एंटीवेनम तैयार किया गया था। वर्तमान में टॉक्सिकोलॉजी विभाग की उप निदेशक डॉ. यजुला गुप्ता पिछले 27 वर्षों में 30 हजार से अधिक मामलों की जांच कर चुकी हैं। वह बताती हैं कि फॉरेंसिक में आने का उनका कोई तय इरादा नहीं था। पीएचडी के बाद उन्होंने जूनियर साइंटिफिक असिस्टेंट के पद के लिए आवेदन किया और चयन हो गया। वह बताती हैं- जब मैंने 1999 में जॉइन किया तब लैब में करीब 10 हजार केस पेंडिंग थे। टॉक्सिकोलॉजी में हम सिर्फ दो महिला वैज्ञानिक थीं। डॉ. यजुला बताती हैं कि क्राइम सीन पर कई बार बेहद वीभत्स हालात होते हैं, लेकिन सच तक पहुंचना ही मकसद होता है। स्टेट फॉरेंसिक साइंस लैब की फिजिक्स डिवीजन में सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर सरिता कुमारी ने राजस्थान का पहला ऑडियो ऑथेंटिकेशन सिस्टम शुरू किया। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से आने वाली ऑडियो रिकॉर्डिंग की वैज्ञानिक जांच को व्यवस्थित रूप से शुरू करने का श्रेय उन्हें जाता है। बीते पांच वर्षों में वे 400 से ज्यादा मामलों में अपनी रिपोर्ट दे चुकी हैं। सरिता बताती हैं- बचपन में सीआईडी सीरियल में फॉरेंसिक लैब देखकर इस क्षेत्र में आने की इंस्पिरेशन मिली। एसीबी से मिलने वाली ऑडियो फाइल कई बार बेहद लंबी होती है। कुछ मामलों में 8–10 घंटे तक लगातार रिकॉर्डिंग सुननी पड़ती है। दो बेटियों की मां सरिता के लिए प्रोफेशनल और पर्सनल जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। उनका कहना है कि हर केस अपने साथ नई मुश्किलें लेकर आता है। एक ट्रैप केस में जिस व्यक्ति को पकड़ा गया था और जिसकी आवाज का सैंपल भेजा गया था, दोनों अलग निकले। लैब में हुए मिलान से सच्चाई सामने आई और एक निर्दोष व्यक्ति बच गया। कई मामलों में सिर्फ आवाज के पैटर्न से आरोपी की पहचान संभव हुई। 8 जनवरी 2014 को वे फिजिक्स डिवीजन की पहली महिला अधिकारी के रूप में नियुक्त हुई थीं। स्टेट फॉरेंसिक साइंस लैब, जयपुर के आर्सेनल और एक्सप्लोसिव डिवीजन में रश्मि गुप्ता अकेली महिला वैज्ञानिक हैं, क्योंकि यहां का काम सीधे विस्फोटकों, ज्वलनशील पदार्थों और हथियारों से जुड़ा होता है। रश्मि बताती हैं- हमारे पास जो सैंपल आते हैं, वे अक्सर बेहद ज्वलनशील और खतरनाक होते हैं। जांच के दौरान आग लगने या दुर्घटना का जोखिम हमेशा बना रहता है। एक छोटी सी चूक भी गंभीर हादसे में बदल सकती है। वे पिछले 19 वर्षों में 1000 से ज्यादा क्राइम सीन की जांच कर चुकी हैं। जयपुर बम ब्लास्ट, अजमेर रोड गैस टैंकर ब्लास्ट, भांकरोटा गैस कांड जैसे मामलों में उनकी जांच रिपोर्ट ने अहम भूमिका निभाई। 2022 में उदयपुर में रेलवे ट्रैक पर हुए विस्फोट के मामले में डॉ. रश्मि और उनकी टीम ने इनका विश्लेषण कर जांच एजेंसियों को महत्वपूर्ण सुराग दिए। आठ महीने के बेटे की मां होने के बावजूद वे इस जोखिम भरे विभाग में पूरी जिम्मेदारी के साथ काम कर रही हैं। स्टेट फॉरेंसिक साइंस लैब की केमिस्ट्री डिवीजन में कार्यरत फॉरेंसिक साइंटिफिक असिस्टेंट (FSA) मीना ने पढ़ाई के दौरान ही इस क्षेत्र में आना तय कर लिया था। मीना कहती हैं- समाज में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसक अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे मामलों में सच सामने लाने और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए विज्ञान सबसे मजबूत हथियार है। मैं चाहती थी कि इसी हथियार के साथ इस लड़ाई का हिस्सा बनूं। वे मानती हैं कि फॉरेंसिक कोई ग्लैमर भरा पेशा नहीं, बल्कि बेहद जिम्मेदारी और धैर्य वाला विज्ञान है। हमारी लैब में किए गए वैज्ञानिक परीक्षण ही कई बार अदालत में सच और झूठ के बीच फर्क तय करते हैं। टोंक की रहने वाली जूनियर साइंटिफिक असिस्टेंट (JSA) मोताली आफाक ने बचपन में टीवी पर आने वाले क्राइम शो ‘सीआईडी’ में फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. सालुंखे और उनकी असिस्टेंट डॉ. तारिका को देखकर फॉरेंसिक साइंटिस्ट बनने का सपना देखा था। टोंक से निकलकर इस फील्ड तक पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन परिवार के सहयोग से मोताली ने टीचिंग, पुलिस या मेडिकल जैसे पारंपरिक विकल्पों की बजाय फॉरेंसिक साइंस को चुना। मोताली कहती हैं- रेप या चाइल्ड अब्यूज जैसे मामलों की फाइल जब हमारे पास आती है तो कई बार रूह कांप जाती है। लेकिन उसी पल खुद को संभालकर हम इस सोच के साथ काम करते हैं कि हमारी जांच किसी पीड़ित को इंसाफ दिला सकती है। दोहरी भूमिका : चुनौती सिर्फ क्राइम नहीं, जिंदगी भी फॉरेंसिक लैब में काम करने वाली महिला वैज्ञानिकों के लिए लड़ाई सिर्फ अपराध से नहीं, बल्कि जिंदगी की जिम्मेदारियों से भी होती है। नारकोटिक्स विभाग की असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. गीता वाधवानी कहती हैं- मैं दिव्यांग हूं, लेकिन कभी काम को हल्के में नहीं लिया। परिवार और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारी कई बार थका देती है, फिर भी जब किसी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करते हैं तो सबसे बड़ा डर यही होता है कि हमारी वजह से कोई निर्दोष सजा न पाए। केमिस्ट्री विभाग की असिस्टेंट डायरेक्टर ममता कंवर राठौड़ बताती हैं- क्राइम सीन पर कई बार बेहद संवेदनशील हालात में काम करना पड़ता है। भीड़ के बीच भी हमें पूरे कंट्रोल के साथ सबूत जुटाने होते हैं। जन्मदिन या छुट्टियां हमारे लिए अक्सर फाइलों और केसों के बीच ही गुजरती हैं। ममता पिछले 20 वर्षों में 10 हजार से ज्यादा मामलों पर काम कर चुकी हैं। पॉलीग्राफ डिवीजन की डॉ. प्रज्ञा राजमोहिते का काम अपराधियों के दिमाग को पढ़ना है। वे रेपिस्ट, सीरियल किलर और पेशेवर अपराधियों के साथ बैठकर ब्रेन मैपिंग, नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट करती हैं। कहती हैं- ऐसे लोगों के आमने-सामने बैठना जोखिम भरा होता है। लेकिन सच तक पहुंचने के लिए हमें कानून और सुरक्षा प्रोटोकॉल के बीच बेहद सावधानी से काम करना पड़ता है। टॉक्सिकोलॉजी विभाग की एफएसए पूर्णिमा जिंदल के मुताबिक, इस पेशे की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर केस इंसान और समाज के नए पहलू दिखाता है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में सच सामने लाना हमारे लिए सिर्फ काम नहीं, जिम्मेदारी भी है। फॉरेंसिक साइंस क्या है और कैसे काम करती है फॉरेंसिक साइंस वह प्रक्रिया है, जिसमें क्राइम सीन से मिले साक्ष्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर सच तक पहुंचा जाता है। खून के धब्बे, डीएनए, उंगलियों के निशान, गोली-कारतूस, आवाज की रिकॉर्डिंग या किसी रसायन के अंश जैसे सुराग लैब में माइक्रोस्कोप, केमिकल टेस्ट और डीएनए प्रोफाइलिंग से जांचे जाते हैं। इनकी वैज्ञानिक रिपोर्ट कई मामलों में अदालत में निर्णायक सबूत बनती हैं। नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू होने के बाद गंभीर अपराधों में फॉरेंसिक जांच की अहमियत और बढ़ गई है। अब कई मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाना अनिवार्य माना जा रहा है, ताकि जांच सिर्फ बयान या शक नहीं बल्कि ठोस प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़े।

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