कहीं आप भी तो नहीं खा रहे सीधा क्रीम से बना घी, जानें क्या कहता है आयुर्वेद
नई दिल्ली, 6 मार्च (आईएएनएस)। आज के समय में शुद्ध घी मिल पाना अपने आप में एक अनोखी बात है। बाजार में मिलने वाले घी में शुद्धता की पहचान कर पाना मुश्किल है, और ज्यादातर घी में मिलावटी पदार्थ को मिलाकर बेचा जाता है।
साथ ही, बाजार में क्रीम से देसी घी निकालने का चलन बहुत बढ़ गया है। लोगों के बीच धारणा है कि डिब्बांबद मिलावटी घी खाने से कई बेहतर है क्रीम से निकला घी खाना, लेकिन क्या आप जानते हैं कि क्रीम से निकला घी शरीर को सिर्फ बीमारी और वसा ही देता है। \
चरक संहिता में कहा गया है, “सर्वस्नेहेषु श्रेष्ठं घृतम्, जिसका अर्थ है कि सभी वसायुक्त पदार्थों में घी सर्वोत्तम है। आयुर्वेद में घी को वसा रहित माना गया है, जिसमें किसी तरह का ट्रांस फैट नहीं होता है। आयुर्वेद में घी बनाने की सही विधि भी बताई गई है, जिसका पालन सदियों से हमारे देश में होता आ रहा है, लेकिन समय की कमी और आधुनिकता ने सब कुछ बदलकर रख दिया है। पहले दूध से दही जमाया जाता है, फिर दही को मथकर माखन निकाला जाता है, और अंत में उसी माखन को पकाकर घृत तैयार किया जाता है, लेकिन आज सीधा दूध से मलाई को इकट्ठा कर घी निकाल दिया जाता है, जिसमें वसा ज्यादा और पोषक तत्व कम होते हैं।
प्राकृतिक तरीके से बनाए गए घी को मटके में धीमी आंच पर पकाने की परंपरा रही है, जिससे घी में केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि पाचन में आसानी और शरीर के लिए बलवर्धक रहा है। प्राकृतिक तरीके से बनाए गए घी को बनाने से पहले दूध को दही के रूप में जमाया जाता है, जो उसके गुणों में वृद्धि करता है। दही में मौजूद प्राकृतिक जीवाणु दही को पौष्टिक और पाचन में आसान बनाते हैं, और उससे निकले मक्खन में वही सारे गुण होते हैं।
प्राकृतिक तरीके से बना घी पाचन में आसान होता है, पाचन अग्नि को भी संतुलित करता है, धातुओं को पोषण देता है, और शरीर का ओज भी बरकरार रखता है। वहीं, सीधा मलाई या क्रीम से बनाए गए घी में दही जमाने वाला चरण नहीं होता है, जिससे घी की गुणवत्ता कम होती है। सीधे क्रीम से घी निकालने पर हाथ में घी नहीं, प्योर वसा आती है। इसका सेवन करने से सिर्फ मोटापा और बीमारी ही मिलती है।
--आईएएनएस
पीएस/पीयूष
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ADR Report: भाजपा ने की कांग्रेस से सात गुना ज्यादा कमाई, आय से ज्यादा ने INC किया खर्च, जानें नेशनल पार्टियों का पूरा ब्योरा
ADR Report: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने वित्तीय साल 2024-25 के लिए राष्ट्रीय पार्टियों की इनकम जारी की है. रिपोर्ट की मानें तो भाजपा की कुल आय 6,769.15 करोड़ है. छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय का 85 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ भाजपा के पास ही है. पिछले साल के मुकाबले भाजपा की कमाई में 55 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. भाजपा की पिछले साल की कमाई कांग्रेस की कमाई से करीब सात गुना ज्यादा है.
देश के छह प्रमुख राष्ट्रीय दल, जिसमें भाजपा, कांग्रेस, आप, बसपा, सीपीएम और एनपीईपी शामिल है. सभी राष्ट्रीय दलों की कुल कमाई 7,960 करोड़ रुपये दर्ज की गई है. पिछले साल के मुकाबले राष्ट्रीय दलों की कुल आय में 41.35 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.
आम आदमी पार्टी की कमाई में 73 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी
वहीं, कांग्रेस की आय 2023-24 में 1,230.73 थी, जो 2024-25 में घटकर 918.29 करोड़ रह गई, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 25 फीसद कम है. आप की कमाई में 73.20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. वहीं बसपा और सीपीएम की आय में ज्यादा अंतर नहीं है.
चंदा और कूपन से सबसे ज्यादा कमाई
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक दलों के पास आने वाले पैसे का मुख्य स्रोत चंदा है, जो नेशनल पार्टियों की कुल आय का 85 प्रतिशत से अधिक यानी करीब 6,772.53 करोड़ रुपये है. बाकी रुपये लोगों और संगठनों से मिले स्वैच्छिक चंदे से आया है, जिसमें भाजपा ने अपनी कुल आय का लगभग 90.48 फीसद हिस्सा चंदे से जुटाया है. इसके अलावा, कांग्रेस ने चंदे के साथ-साथ कूपन बेचकर भी अच्छी खासी कमाई की है. पार्टी को इससे लगभग 350 करोड़ रुपये मिले हैं. बसपा ने अपनी रिपोर्ट में चंदे से कोई आय नहीं दिखाई है. पार्टी की कमाई बैंक से मिले ब्याज और अन्य निवेशों से आए पैसे से की है.
कांग्रेस ने ₹1111 करोड़ खर्च किए
पैसे खर्च करने के मामले में पार्टियों के बीच बड़ा अंतर नहीं दिख रहा है. छह राष्ट्रीय दलों ने मिलकर कुल 4,710.27 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव प्रचार और प्रशासनिक कामों पर करीब 3,335.37 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जो भाजपा की आय का आधा भी नहीं है.
जानें किस पार्टी ने कितना खर्चा किया
इसके अलावा, कांग्रेस ने अपनी कमाई से करीब 193.66 करोड़ रुपये ज्यादा खर्च किए हैं. आसान भाषा में समझाएं तो कांग्रेस की कमाई 918.29 करोड़ रुपये थी लेकिन पार्टी ने खर्च 1,111.95 करोड़ रुपये कर दिए. इसके अलावा, सीपीएम ने अपनी आय का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा खर्च किया है. बसपा और भाजपा ने अपनी आय के अधिकांश हिस्से को भविष्य की जरूरतों के लिए बचाकर रखा है.
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