रात के अंधेरे में लाल हुआ चंद्रमा! देखिए साल के पहले ग्रहण की झलक, अब 2029 तक नहीं मिलेगा ऐसा मौका
Chandra Grahan 2026: मंगलवार की शाम गुवाहाटी (असम) के साफ आसमान में साल के पहले चंद्रग्रहण की शुरुआत हुई, जिसके विजुअल्स सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह ग्रहण एक बेहद सुविधाजनक समय पर लगा है, जिससे आम लोगों को इसे देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की जरूरत नहीं पड़ी. जैसे-जैसे रात बढ़ी, चमकीले पूर्ण चंद्रमा पर पृथ्वी की गहरी छाया पड़नी शुरू हो गई. जब चंद्रमा पूरी तरह से इस छाया में डूबा, तो वह तांबे जैसे लाल रंग की चमक बिखेरने लगा, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'पूर्णता' (Totality) कहा जाता है. खगोलविदों ने चेतावनी दी है कि यह साल 2029 तक 'रक्त चंद्रमा' देखने का आखिरी बड़ा मौका है. इसके बाद अगले छह चंद्रग्रहणों के दौरान चंद्रमा पृथ्वी की गहरी छाया में पूरी तरह नहीं डूबेगा. 2027 में होने वाले ग्रहण केवल 'उपछाया' (Penumbral) ग्रहण होंगे, जिनमें चंद्रमा का धुंधलापन महसूस करना भी मुश्किल होगा. ऐसे में आज रात का यह अनुभव वैज्ञानिकों और आकाश प्रेमियों के लिए बेहद खास है. भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी इस ग्रहण का सबसे शानदार नजारा दिखाई दे रहा है, जहां आसमान पूरी तरह अंधेरा होने के कारण चांद की लालिमा और भी निखर कर सामने आई है.
Rubika Liyaquat Show: ईरान, इजराइल और भारत… कौन साथ, कौन अकेला? कर्नल दानवीर ने बताई सच्चाई
कर्नल दानवीर ने भारत के विदेश नीति रुख पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत को जरूरत पड़ी थी, तब इजराइल ने बिना शर्त समर्थन दिया. भारत ने स्पाइस बॉम्ब्स, स्काई स्ट्राइकर, हेरोप और हेरोन ड्रोन का इस्तेमाल किया और इजराइली मिसाइलों ने शहरों की सुरक्षा सुनिश्चित की. कर्नल दानवीर ने सवाल किया कि क्या ऐसे में भारत को इजराइल का धन्यवाद नहीं कहना चाहिए. उन्होंने बताया कि ईरान ने भारत को कभी हथियार नहीं दिए और न ही पाकिस्तान पर कोई दबाव बनाया. उन्होंने पॉलिटिकल आलोचना पर भी टिप्पणी की. उनका कहना था कि भारत का रुख स्ट्रैटेजिक और संतुलित होना चाहिए. उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने कई बार मुस्लिम देशों के साथ संबंध बनाए रखे, भले ही आलोचक सवाल उठाएं. कर्नल दानवीर ने यह भी कहा कि भारत को अपनी विदेश नीति घरेलू राजनीति से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए. उन्होंने इतिहास और ऑपरेशन सिंदूर के उदाहरण देकर समझाया कि जब वास्तविक मदद की जरूरत थी, तब इजराइल और अमेरिका खड़े थे.
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