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US Global Dominance| कैसे डॉलर बना सबसे जरूरी करेंसी? |Teh Tak Chapter 5

पैसे की महत्ता को समझाता है। कभी सोचा है कि जब भी पैसे की बात होती है, तो डॉलर को इतनी तवज्जो क्यों दी जाती है? हां दुनिया की सबसे मजबूत मुद्राओं के कारण। अमेरिकी डॉलर भैया डॉलर का इतना भौकाल है कि सब देश अपना फॉरेक्स रिजर्व्स डॉलर्स में क्यों मेंटेन करते हैं। ऐसा कब से शुरू हुआ, किसने लिया ये फैसला और हम सब यस-यस कहकर मानते चले गए। इन्हीं मुद्दों पर बात करेंगे। 
आरक्षित मुद्रा केंद्रीय बैंक और प्रमुख फाइनेंसर संस्थानों फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस द्वारा अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा की एक बड़ी राशि को कहते हैं। जैसे अपने देश का सेंट्रल बैंक आरबीआई फॉरेक्स रिजर्व्स ड़ॉलर्स में मेंटेन करता है। हम वैश्विक स्तर पर व्यापार करते वक्त डॉलर में ही भुगतान करते हैं। साथ ही पेमेंट भी डॉलर में ही ली जाती है। आरक्षित मुद्रा के अनेक फायदे भी होते रिजर्व करेंसी एक्सचेंज रेट के रिस्क को कम करती है।  ऐसा इसलिए क्योंकि किसी देश को व्यापार करने के लिए अपनी करंसी मुद्रा को आरक्षित मुद्रा के साथ एक्सचेंज करने की आवश्यकता नहीं होती। केवल यही नहीं यही रिजर्व वैश्विक लेनदेन को सुविधाजनक बनाने में भी सहायक सिद्ध होता है। दुनिया भर में वस्तुओं की कीमत रिजर्व करेंसी में होती है मसलन डॉलर सो देशों को  उसी करेंसी में रिजर्व मेंटेन करना पड़ता है ताकि इन वस्तुओं को खरीदने बेचने में।  दूसरे देश इसीलिए अमेरिका की मौद्रिक नीति माने मॉनिटरी पॉलिसी की बारिकी से निगरानी करते हैं।  ताकि सुनिश्चित कर सके क्योंकि फॉरेन रिजर्व्स आफ इन्फ्लेशन या बढ़ती कीमतों से प्रभावित ना हो। 

जब करेंसी नहीं थी तब क्या होता था

आज से हजारों साल पहले करेंसी नहीं होती थी। उस टाइम पर लोग बाटर सिस्टम करते थे। मतलब किसी के पास अगर टमाटर है और उसे चावल की जरूरत है तो जिसके पास चावल हैं। उसको टमाटर देकर चावल ले लिया। इसी तरह अपनी जरूरत के हिसाब से लोग गुड्स एंड सर्विसेज को एक्सचेंज करते थे। लेकिन इस बाटर सिस्टम में छोटे मोटे लेन देन तो ठीक थे। लेकिन जब व्यापक स्तर पर लेन देन करना होता था तो दिक्कत आती थी। टमाटर, चावल जैसी चीजें कुछ वक्त बाद खराब हो जाती थी। ऐसे में बड़े ट्रेड करने में लोगों को दिक्कत आती थी। लेकिन कुछ टाइम बाद लोगों ने इसका भी तोड़ निकाला और ऐसी चीज में डील करना चालू किया जो खराब न हो। इसके बाद से ही सोना, चांदी, तांबा में व्यापार शुरू हुआ। लीडिया ने सोना, चांदी, तांबा सभी के सिक्के बना दिए ताकी आसानी से ट्रेड किया जा सके। लेकिन इसमें भी धीरे धीरे समस्या आने लगी। जैसे अगर लोग व्यापार करने के लिए निकलते थे और ज्यादा माल लेना होता था तो बदले में देने के लिए सिक्के ज्यादा मात्रा में ले जाना होता था और ये काफी भारी हो जाते थे। इन्हें चोरी से बचाकर रखना और ट्रांसपोर्ट करने में दिक्कत आती थी। इसका ये तरीका निकाला गया कि मान लीजिए अगर दिल्ली से मुंबई किसी को व्यापार करने जाना होता था। तो वो दिल्ली के किसी व्यापारी को ढूंढ़ लेते थे और कहते थे कि हमें इतना सारा सोना लेकर नहीं जाना है। आप अपने पास ये सोना रख लो। जब हम मुंबई पहुंच जाएंगे तो आप मुंबई में आपके जानने वाले व्यापारी हैं उन्हें वहां पर बोल देना कि हमें वहां पहुंचने पर इतने की मात्रा में सोना दे देगा। आपका जो इसमें बनेगा वो ले लेना। ऐसे में व्यापारी दिल्ली में सोना रखकर एक पेपर पर मुहर और साइन करके दे देता था। फिर पेपर लेकर मुंबई पहुंचने पर पेपर दिखाकर वहां के व्यापारी से सोना-चांदी जो भी है ले लो। रास्ते की धातु के सिक्के ले जाने की दिक्कत इससे खत्म हो गई। आज कल का आपने हवाला का काम सुना है वो भी इसी सिस्टम पर बेस्ड है। ये जो पेपर पर साइन औऱ स्टैंप लगकर मिलता है, इसी से करेंसी का मार्ग प्रशस्त होता है। आज भी आप 500 के नोट पर देखते हो मैं धारक को पांच सौ रुपए अदा करने का वचन देता हूं। ये वही तो है। लेकिन ये पूरी चीज अन आर्गनाइज्ड था और भरोसे पर ही चलता था। आगे चलकर इसे सिस्टम में डालने की दिशा में कदम बढ़ाए गए। साल 1154 में चीन में वेनयान लियांग ने चीन की अथॉरिटी के साथ मिलकर पूरे सिस्टम को आर्गनाइज किया। इसने इसी काम के लिए चीन के अंदर बैंक बना दिए। चीन के लोग बैंक के अंदर जाते थे और अपना सोना जमा करते थे, उसके बदले बैंक नोट ले आते थे। 

डिमांड एंड सप्लाई 

पूरी अर्थव्यवस्था ही डिमांड और सप्लाई चेन पर बेस्ड है जैसे किसी चीज की मांग बढ़े तो उसकी कीमत बढ़ जाती है । ठीक उसी तरह से करेंसी के मामले में भी यही होता है। अगर डॉलर की मांग बढ़ जाती है तो डॉलर की कीमत भी ऑटोमेटिक बढ़ ही जाती है। इसको भी उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि भारत के व्यापारियों को अमेरिका से बड़ी मात्रा में सामान खरीदने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें डॉलर की आवश्यकता होगी। अगर डॉलर की सप्लाई लिमिटेड हो और भारत को डॉलर की ज्यादा जरूरत हो, डॉलर की जो कीमत है वह अपने आप ही बढ़ जाएगी। इससे डॉलर का मूल्य रुपए के मुकाबले भी बढ़ेगा और रुपया कमजोर हो जाएगा।

क्या था ब्रिटेन गुड्स एग्रीमेंट

आज से करीब  75 साल पहले साल था 1944। अमेरिका तब आज के चाइना की तरह मैन्युफैक्चरिंग पावर हाउस हुआ करता था। 1945 में दुनिया के 50% गुड्स अकेले यूएस में ही प्रोड्यूस होते थे। लेकिन और रिच बनने के लिए यूएस एक प्लान लाता है। जो बाद में ब्रिटेन गुड्स एग्रीमेंट बना। इसका कोर पर्पस यूएस के डॉलर को ग्लोबल करेंसी बनाने का था। इसमें अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को प्रेशर किया कि वह अपनी करेंसी की वैल्यू यूएस डॉलर के साथ पैक कर दे। इन रिटर्न यूएस ने प्रॉमिस दिया कि यह कंट्रीज डॉलर को कभी भी गोल्ड में कन्वर्ट करवा सकती है एक फिक्स रेट पर। यानी यूएस के डॉलर की वैल्यू गोल्ड जितनी रहेगी। यानी रातोंरात यूएस का यह पेपर का टुकड़ा गोल्ड की वैल्यू का हो गया। इसके कुछ ही सालों में डॉलर की डिमांड स्काई रॉकेट हो गई। क्योंकि ऑलमोस्ट सारी कंट्रीज डॉलर में ट्रेड करने लगी। 1971 तक यूएस डॉलर को मैसिव स्केल पर प्रिंट करता गया। और तब तक मार्केट में इतने डॉलर्स आ चुके थे जितने का यूएस के पास सोना भी नहीं था। जिसका मतलब ब्रिटेन वुड एग्रीमेंट का पार्ट बनी एक कंट्रीज अपने डॉलर के रिजर्व को लेकर यूएस के पास पहुंच जाती है कि यूएस अपने प्रॉमिस किया था कि डॉलर को गोल्ड में कभी भी कन्वर्ट करवा सकते हैं तो हमें हमारे डॉलर्स के बदले गोल्ड दे दो। तो यूएस सपने में भी यह प्रॉमिस पूरा नहीं कर सकता था। तब यूएस के प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन एक बड़ा कदम उठाते हैं। 15 अगस्त 1971 को यूएस डॉलर को गोल्ड में कन्वर्ट करवाने का सिस्टम ही खत्म कर देता है। लेकिन फिर भी डॉलर ग्लोबली इंपॉर्टेंट बना रहता है। अमेरिका की तरफ से दूसरे देशों को कम टैरिफ ऑफर की जाती थी। दुनिया भर में अपना कैपिटल इन्वेस्ट करता है। ये सब डॉलर के भौकाल को बनाए रखने के लिए किया जाता रहा। 

इसे भी पढ़ें: US Global Dominance | अमेरिका के वैश्विक महाशक्ति बनने की कहानी?|Teh Tak Chapter 1


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US Global Dominance |क्या है ट्रंप का अखंड अमेरिका प्लान |Teh Tak Chapter 4

ऐसा कहा जा रहा था कि दुनिया अब बहुध्रुविय हो रही है। अमेरिका का एकछत्र राज समाप्त हो गया। पावर सेंटर बदल रहा है। लेकिन दिखाई केवल अमेरिका देता है। हुक्म केवल ट्रंप का चलता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कम से कम “लोकतंत्र” जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता था, लेकिन अब खुलकर बुलियन जैसा व्यवहार दिखाई दे रहा है। इसे कूटनीतिक भाषा में फिर से मोनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) के नाम से जोड़ा जा रहा है। यह वही पुराना सिद्धांत है जिसे अमेरिका ने 1823 में पश्चिमी गोलार्ध के देशों में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए अपनाया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के कई देशों ने“शक्ति ही अधिकार नहीं है वाली राजनीति से बाहर निकलने की कोशिश की थी। यूएसएसआर के पतन के बाद तो बहुध्रुवीय विश्व की बातें भी हुईं। लेकिन यह सब तब तक चलता रहा जब तक एक प्रमुख शक्ति अमेरिका को यह मंज़ूर था। अमेरिका ने फिर से यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि वह चाहे तो समस्त नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को तार-तार कर सकता है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिमी गोलार्ध यानी उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका उसकी प्रभाव-क्षेत्र है, और वह अपने आस-पास किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा — चाहे वह रणनीतिक हो, राजनीतिक हो या आर्थिक। लेकिन सिर्फ अमेरिका ही महान शक्ति की राजनीति नहीं कर रहा है। दुनिया के दूसरे छोर पर, भारत के बेहद करीब बैठा चीन भी उसी “ग्रेट पॉवर पॉलिटिक्स” के रास्ते पर चल रहा है। चीन ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र को लगभग अपना प्रभाव-क्षेत्र मान लिया है। वह यहां किसी दूसरी बड़ी ताकत को अपने बराबर या उससे मजबूत होते देखना नहीं चाहता। यही वजह है कि समय-समय पर उसका टकराव जापान, ताइवान और भारत जैसे देशों से होता रहता है। आज चीन भी अपने तरीके से एक नई “चीन सिद्धांत” गढ़ रहा है, ठीक वैसे ही जैसे दो सौ साल पहले अमेरिका ने मोनरो सिद्धांत बनाया था। इसी बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए पिछले दस वर्षों में अमेरिका ने QUAD जैसे समूहों के जरिए चीन को संतुलित करने की कोशिश की। लेकिन अब अमेरिकी राजनीति में आए बदलावों ने पूरी रणनीति को उलझा दिया है। अगर अमेरिका अपनी पारंपरिक संतुलन नीति से पीछे हटता है, तो चीन को एशिया में खुली छूट मिल सकती है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा और खासकर भारत जैसे देशों की सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। साल 1823 की बात है… उस समय अमेरिका अभी 50 साल से भी कम पहले स्वतंत्र हुआ था, और उसने अभी तक पश्चिम की ओर मार्च कर प्रशांत तट पर कब्ज़ा नहीं किया था। उस शुरुआती दौर में, वहां के नेताओं ने पहले ही “अमेरिकी प्रभाव-क्षेत्र” की बात करना शुरू कर दिया था। यह वही समय था जब अमेरिका की स्वतंत्रता से प्रेरित होकर कई दक्षिण और मध्य अमेरिका के उपनिवेश भी यूरोपीय शक्तियों से आज़ादी मांग रहे थे। ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे देश भी स्वतंत्र हुए थे। ऐसे ही समय में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने एक घोषणा जारी की कि पश्चिमी गोलार्ध में यूरोपीय शक्तियों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, यानी उत्तर और दक्षिण अमेरिका अमेरिका के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में माना जाएगा। यह नीति बाद में मोनरो सिद्धांत के नाम से जानी जाने लगी। मोनरो सिद्धांत का मूल उद्देश्य यह था कि यूरोपीय शक्तियाँ अमेरिका के महाद्वीपों में उपनिवेश स्थापित या राजनीतिक रूप से हस्तक्षेप न करें। उस समय अमेरिकी सैन्य शक्ति इतनी मजबूत नहीं थी, इसलिए यह सिद्धांत शुरू में यूरोप पर ज़्यादा असर नहीं डाल पाया। परंतु समय के साथ यह अमेरिका की विदेशी नीति का एक प्रमुख स्तंभ बन गया और बाद के दशकों में कई अवसरों पर इसे लागू किया गया। अगले कुछ वर्षों में अमेरिका ने पश्चिम की ओर विस्तार किया और आखिरकार प्रशांत महासागर के तट तक पहुँच गया। अब पूरा महाद्वीप उसके नियंत्रण में था। विस्तार पूरा हो चुका था, अब बारी थी अपनी सीमाओं को सुरक्षित और मजबूत बनाने की। यहाँ अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति थी। एक ओर अटलांटिक महासागर और दूसरी ओर विशाल प्रशांत महासागर। इन दोनों के बीच स्थित अमेरिका एक प्राकृतिक किले जैसा बन गया। यही कारण है कि सीधे अमेरिका पर हमला करना लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन अब सवाल था शक्ति का विस्तार कैसे किया जाए? चारों ओर समुद्र था, तो आगे बढ़ने का रास्ता क्या हो? अमेरिका ने देखा कि उस समय की बड़ी शक्तियाँ ब्रिटेन, स्पेन और नीदरलैंड अपनी विशाल और ताकतवर नौसेना के दम पर पूरी दुनिया में प्रभाव बनाए हुए थीं। समुद्र पर नियंत्रण का मतलब था वैश्विक व्यापार पर नियंत्रण, और व्यापार पर नियंत्रण का मतलब था असीमित शक्ति। यहीं से अमेरिका ने महाद्वीपीय शक्ति (Continental Power) से आगे बढ़कर समुद्री वैश्विक शक्ति बनने का सपना देखना शुरू किया। जैसे-जैसे अमेरिका की सैन्य ताकत बढ़ी, वैसे-वैसे उसे इस्तेमाल करने की इच्छा भी बढ़ने लगी। कुछ ही वर्षों में अमेरिका ने लैटिन अमेरिका में सक्रिय हस्तक्षेप शुरू कर दिया। 1898 में अमेरिका ने स्पेन के खिलाफ युद्ध लड़ा, जिसे इतिहास में स्पेनिश अमेरिका व़ॉर के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध के बाद क्यूबा को स्पेन से स्वतंत्रता मिली, लेकिन प्यूर्टो रिको अमेरिका के नियंत्रण में आ गया। रूजवेल्ट ने 1904 में मोनरो सिद्धांत को और आक्रामक रूप देते हुए कहा कि अगर पश्चिमी गोलार्ध के किसी देश में अस्थिरता होगी, तो अमेरिका वहाँ हस्तक्षेप करेगा। अब अमेरिका केवल यह नहीं कह रहा था कि यूरोप दूर रहे बल्कि वह खुद इस क्षेत्र का “रक्षक” और “नियंत्रक” बनना चाहता था। अमेरिका जानता है कि अब अमेरिका की तुलना में किसी दूसरी अर्थव्यवस्था या सैन्य शक्ति का स्तर उसकी बराबरी तक नहीं पहुंचा है। अमेरिका ने दुनिया भर में चीन को संतुलित करने की कोशिश की है। चाहे वह क्वाड जैसे सहयोगी समूह बनाकर हो, या खाड़ी और यूरोप में अपने निवारक उपायों को मजबूत करके। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अमेरिका की हालिया नीतियाँ — जिनके कुछ पहलुओं को “डोनरो डॉक्टरेन” जैसा नाम भी दिया गया है। वे चीन के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश का हिस्सा हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अकेली सैन्य कार्रवाई किसी व्यापक प्रभाव को पीछे नहीं धकेल सकती, और यह रणनीति अनिवार्य रूप से लंबी अवधि की नीतियों, आर्थिक सहयोग और कूटनीति से जुड़ी होनी चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार, अमेरिका को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से किसी भी पश्चिमी गोलार्ध के क्षेत्र में अपनी शक्ति दिखाने का अधिकार है। इसमें ट्रंप कोरोलरी भी शामिल है, जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिका के प्रभाव का मुख्य क्षेत्र माना जाता है, बाहरी ताकतों को यहां प्रवेश से रोकने की बात कही जाती है और अमेरिकी सुरक्षा हितों के खतरे पर हस्तक्षेप को सही ठहराया जाता है। ट्रंप प्रशासन ने इसे चीन और रूस जैसे वैश्विक ताकतों के साथ प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। अमेरिका ने वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और पनामा नहर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी प्राथमिकता को इस डोक्ट्रिन के माध्यम से स्पष्ट किया।

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