बिहार में आठ महीने के भीतर होगा सभी बांधों की सुरक्षा का व्यापक ऑडिट
बिहार सरकार ने बाढ़ की तैयारियों को मजबूत करने और बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए बांधों की सुरक्षा का व्यापक आकलन आठ महीने के भीतर पूरा करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में बुधवार को यहां हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में जल संसाधन विभाग के इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। प्रस्ताव में कहा गया है कि बांध टूटने की स्थिति में संभावित जलमग्न क्षेत्रों का नक्शा तैयार करने के लिए ‘डैम ब्रेक एनालिसिस’ किया जाएगा।
प्रत्येक बांध के लिए जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के समन्वय से आपातकालीन कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इसके अलावा, बांधों के निरीक्षण, निगरानी, रखरखाव और आपातकालीन कार्रवाई की प्रक्रियाओं को मानकीकृत करने के लिए संचालन एवं रखरखाव संबंधी पुस्तिकाएं भी तैयार की जाएंगी। अधिकारियों के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य बांधों में गाद जमा होने और मानसून के दौरान बाढ़ से जुड़े जोखिमों से निपटने के साथ-साथ राज्य में बांध सुरक्षा और जल संसाधन प्रबंधन को बेहतर बनाना है।
मंत्रिमंडल ने राज्य में बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए अगले तीन वर्षों में निम्न-दाब (एलटी) बिजली वितरण नेटवर्क को मजबूत करने के लिए 11,096.55 करोड़ रुपये की योजना को भी मंजूरी दी। ऊर्जा विभाग के स्वीकृत प्रस्ताव के अनुसार, राज्य में बिजली की अधिकतम मांग 2012 के 1,802 मेगावाट से बढ़कर 9,475 मेगावाट हो गई है। इससे मौजूदा बिजली वितरण ढांचे पर दबाव बढ़ा है।
प्रस्ताव में कहा गया है कि पहले की योजनाओं के तहत लगाए गए कम क्षमता वाले ‘एलटी एरियल बंच्ड’ (एबी) केबल और वितरण ट्रांसफार्मर पर अत्यधिक भार पड़ रहा है। ऐसे में उनकी क्षमता बढ़ाना आवश्यक हो गया है। मंत्रिमंडल विभाग के अपर मुख्य सचिव अरविंद कुमार चौधरी ने प्रेसवार्ता में बताया कि सरकार ने ‘उत्तर बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड’ (एनबीपीडीसीएल) और ‘दक्षिण बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड ’(एसबीपीडीसीएल) को राज्य सरकार की गारंटी पर वित्तीय संस्थानों और बैंकों से ऋण लेने की अनुमति देने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी।
इसके तहत एनबीपीडीसीएल 6,066 करोड़ रुपये और एसबीपीडीसीएल 5,030.55 करोड़ रुपये जुटाएगी। इस राशि का इस्तेमाल बिजली वितरण नेटवर्क को मजबूत करने की योजना के क्रियान्वयन में किया जाएगा। मंत्रिमंडल ने बिहार एमएसएमई नीति, 2026 को भी मंजूरी दी।
इस नीति का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में एक करोड़ परिवारों को उद्यमी बनाना और एक करोड़ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित करना है। ‘एक करोड़ उद्यमी परिवार—समृद्ध बिहार की नींव’ की परिकल्पना पर आधारित इस नीति को उद्योग विभाग ने आठ अक्टूबर को जारी किया था, जिसके बाद इसे राज्य मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिली। नीति के तहत बिहार के साख-जमा अनुपात को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने, राज्य के प्रत्येक जिले में कम से कम एक औद्योगिक क्लस्टर विकसित करने और सभी 38 जिलों में एमएसएमई केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
राज्य सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और चक्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए जैव ईंधन एवं संपीड़ित जैव गैस (सीबीजी) उत्पादन प्रोत्साहन नीति, 2026 के क्रियान्वयन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। मंत्रिपरिषद ने इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस नीति के क्रियान्वयन के लिए उद्योग विभाग को नोडल एजेंसी बनाया गया है, जबकि उद्योग निदेशक को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है।
नीति का उद्देश्य कृषि अवशेषों, पशु अपशिष्ट, नगरपालिका के ठोस कचरे और चीनी मिलों से निकलने वाले प्रेसमड का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर सीबीजी और जैव ईंधन परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। मंत्रिमंडल ने पटना में भूमिगत सड़क कॉरिडोर विकसित करने की संभावनाओं का अध्ययन कराने के लिए 18.21 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले प्रस्ताव को प्रशासनिक स्वीकृति भी प्रदान की। इस व्यवहार्यता अध्ययन में शहर के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाले भूमिगत मार्गों के विकास की संभावनाओं की जांच की जाएगी।
इनमें आर ब्लॉक चौराहे से कंकड़बाग और डाकबंगला चौराहे से पटना वीमेंस कॉलेज तक भूमिगत मार्ग विकसित करने के विकल्प शामिल हैं। इसके अलावा शहर के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ने की संभावनाओं का भी अध्ययन किया जाएगा।
Delhi High Court ने जेल नियमों की अनदेखी पर DG Prisons को थमाया अवमानना नोटिस
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को खुली और अर्ध-खुली कारागारों में कैदियों के लिए सुविधाओं से जुड़े न्यायिक निर्देशों का पालन न किए जाने को गंभीरता से लेते हुए, महानिदेशक (कारागार) को अवमानना का नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा कि उन्होंने आदेशों की ‘पूरी तरह से अनदेखी’ की है। उच्च न्यायालय ने दिल्ली के मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी करने की चेतावनी भी दी।
अदालत ने कहा कि सरकारी अधिकारी इस मामले को बहुत हल्के में ले रहे हैं, जबकि उच्चतम न्यायालय ने ‘ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस’ (ओसीआई) के लिए एक प्रोटोकॉल तैयार करने और वहां भेजे जा सकने वाले कैदियों की पहचान करने के निर्देश दिए हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव साम्ब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश पारित होने के आठ महीने बीत जाने के बावजूद, इसके अनुपालन की कोई जानकारी नहीं मिली है और न ही राज्य सरकार या दिल्ली जेल प्रशासन की ओर से इस दिशा में शायद ही कोई कदम उठाए गए हैं। पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के फरवरी 2026 के निर्देश और उसके बाद उच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद, सरकार और जेल प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की और यह मामला ‘जरा भी आगे नहीं बढ़ा’।
पीठ ने कार्यवाही के दौरान महानिदेशक (कारागार) की अनुपस्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई। उच्च न्यायालय ने कहा कि उन्होंने यहां उपस्थित न होकर और अपने अधीन एक अधिकारी से हलफनामा भरवाकर-जो कि अधूरी जानकारी के साथ अदालत में दाखिल किया गया-अदालत के आदेशों के प्रति ‘पूरी तरह से अवहेलना’ दिखाई है। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट देने के लिए जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों का रवैया ‘पूरी तरह से लापरवाह और असंवेदनशील’ था।
उच्च न्यायालय राज्य में अर्ध खुली और खुली जेलों से जुड़े मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रहा था। इससे पहले, अदालत ने दिल्ली सरकार से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा था, जिसमें यह बताया जाए कि 26 फरवरी को उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।अदालत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार, ओसीआई के प्रबंधन के लिए हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को एक निगरानी समिति गठित करनी होगी, जिसकी अध्यक्षता राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष या उनके द्वारा नामित व्यक्ति करेंगे। न्यायमूर्ति साम्ब्रे और न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि क्या राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार मौजूदा नियमों और विनियमों को तैयार किया है या उनमें संशोधन किया है।
इस पर, दिल्ली सरकार के स्थायी वकील (आपराधिक) संजय लाओ ने अधिकारियों के निर्देश पर कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं है। पीठ ने सवाल किया कि क्या उसे यह बयान दर्ज कर लेना चाहिए कि नियमों में किसी संशोधन या बदलाव की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने रेखांकित किया कि उच्चतम न्यायालय ने सरकारी अधिकारियों से कहा था कि वे निगरानी समिति की बैठक में सचिव के पद से नीचे के अधिकारियों को न भेजें।
हालांकि, स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, बैठक में उप-सचिव स्तर के एक अधिकारी को भेजा गया। न्यायमूर्ति साम्ब्रे ने कहा, ‘‘आप दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष के सामने होने वाली निगरानी समिति की बैठक में अपने जोकरों को भेजते हैं। क्या आप चाहते हैं कि हम बैठक का कार्यवृत्त दिखाएं कि आप समिति की बैठक में शामिल होने के लिए किसे नामित कर रहे हैं?’’ उन्होंने कहा, ‘‘ सरकार ने यहां जो कुछ भी किया है, हम अपने आदेश में उनका उल्लेख कर तमाशा नहीं बनाना चाहते।’’ दिल्ली सरकार के वकील ने जब यह समझाने की कोशिश की कि अधिकारियों ने क्या कदम उठाए हैं, तो पीठ ने कहा कि वे मामलों को बहुत हल्के में ले रहे हैं और यह पूरी तरह से ‘दिखावा’ है।
पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘‘आपको जवाबदेह नहीं ठहराया गया है; उच्चतम न्यायालय के प्रति जवाबदेह तो उच्च न्यायालय को ठहराया गया है।’’ इसके बाद, सरकारी वकील और गृह विभाग के विशेष सचिव ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे सुनवाई की अगली तारीख पर अदालत के सामने अनुपालन रिपोर्ट दिखाएंगे। वकील ने यह भी आश्वासन दिया कि 30 अक्टूबर को होने वाली समिति की अगली बैठक में दिल्ली सरकार और जेल प्रशासन विभाग के उच्च-स्तरीय अधिकारी, सभी जरूरी निर्देशों और रिपोर्टों के साथ शामिल होंगे। इन आश्वासनों के बाद, अदालत ने दिल्ली के मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी करने की प्रक्रिया टाल दी, लेकिन महानिदेशक (जेल) से कहा कि वे 18 नवंबर तक अवमानना नोटिस पर अपना जवाब दाखिल करें।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 नवंबर को सूचीबद्ध किया।
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