मिलान शीतकालीन ओलंपिक खेलों में चीनी खेल प्रतिनिधिमंडल की प्रगति स्पष्ट : चीनी राजकीय खेल प्राधिकरण
बीजिंग, 1 मार्च (आईएएनएस)। मिलान शीतकालीन ओलंपिक खेल समारोह में चीनी खेल प्रतिनिधिमंडल के प्रदर्शन की समीक्षा हेतु सार महासभा पेइचिंग में आयोजित की गई।
इस अवसर पर चीनी राजकीय खेल प्राधिकरण के महानिदेशक काओ चीतान ने कहा कि चीनी खेल प्रतिनिधिमंडल ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है और उसकी समग्र प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति में स्पष्ट वृद्धि देखी गई है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में चीन अब भी अग्रणी देशों का पीछा करने वाली भूमिका में है और यह स्थिति मूल रूप से बदली नहीं है।
मिलान शीतकालीन ओलंपिक खेलों में चीनी प्रतिनिधिमंडल ने 5 स्वर्ण, 4 रजत और 6 कांस्य पदक जीतकर कुल 15 पदक अपने नाम किए, जो चीन के बाहर आयोजित शीतकालीन ओलंपिक खेलों के इतिहास में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। कुल 126 चीनी खिलाड़ियों ने 92 इवेंटों में भाग लिया। भागीदारी करने वाले खिलाड़ियों और इवेंटों की संख्या, दोनों ही चीन के बाहर आयोजित शीतकालीन ओलंपिक के इतिहास में सर्वाधिक रहीं।
चीनी टीम ने 8 विभिन्न इवेंटों में पदक हासिल किए, जिससे आइस और स्नो इवेंटों के बीच संतुलित विकास का संकेत मिला। कई युवा खिलाड़ियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए भविष्य के लिए मजबूत संभावनाओं का परिचय दिया।
इसके साथ ही महानिदेशक काओ चीतान ने स्पष्ट किया कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा की व्यापक स्थिति को देखते हुए चीन के शीतकालीन खेलों की आधारभूत स्थिति में अभी भी सुधार की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण की अवधारणा और उपाय पूरी तरह प्रगतिशील नहीं हैं, जिन इवेंटों में बढ़त हासिल हुई है, उनकी संख्या सीमित है, प्रतिभा भंडार पर्याप्त नहीं है और बड़ी प्रतियोगिताओं के प्रबंधन स्तर में अभी और सुधार की गुंजाइश बनी हुई है।
काओ चीतान ने आगे कहा कि भविष्य में चीन खेल प्रबंधन प्रणाली तथा प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धा व्यवस्था में गहन सुधार को आगे बढ़ाएगा। विविध मॉडल के माध्यम से प्रतिभा विकास की प्रक्रिया को सुदृढ़ किया जाएगा और अधिक इवेंटों में स्वर्ण पदक हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया जाएगा।
उन्होंने यह भी बल दिया कि राष्ट्रीय खेल क्षेत्र को दीर्घकालिक दृष्टि अपनाते हुए खेल शक्ति के निर्माण को तेज करना चाहिए। प्रतिस्पर्धात्मक खेलों की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ सार्वजनिक जन व्यायाम सेवा व्यवस्था के सुधार पर भी समान रूप से ध्यान केंद्रित किया जाएगा, ताकि खेल विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुंच सके।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
--आईएएनएस
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पेट्रोल-डीजल की बढ़ सकती है कीमत, जानिए क्या है हॉर्मुज का रास्ता और क्यों इसके बंद होने से डर रहे हैं बड़े देश?
पिछले 24 घंटों में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच टकराव ने खतरनाक मोड़ ले लिया है. हालात तब और विस्फोटक हो गए जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की खबर सामने आई. इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ा और ईरान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान ने उन देशों में स्थित अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बनाया है, जहां उनकी सैन्य या रणनीतिक मौजूदगी है. इन देशों में इजरायल, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और सऊदी अरब जैसे नाम शामिल हैं. इससे पूरे मध्य-पूर्व में अस्थिरता और गहरी हो गई है.
सबसे गंभीर संकेत स्ट्रेस ऑफ होमुर्ज को लेकर सामने आया है. ईरान ने दुनिया के इस बेहद अहम समुद्री मार्ग को बंद करने का इशारा दिया है. यह वही रास्ता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है. जानकारों का मानना है कि अगर यह स्ट्रेस ऑफ होमुर्ज बंद होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ सकता है.
नक्शे पर कहां है यह समुद्री रास्ता?
हॉर्मुज का यह रास्ता नक्शे पर एक तरफ ओमान और यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) के बीच है और दूसरी तरफ ईरान है. यह रास्ता खाड़ी देशों (Persian Gulf) को खुले समुद्र से जोड़ता है. अगर आप इसे ऊपर से देखें, तो यह बहुत संकरा है. इसकी सबसे कम चौड़ाई सिर्फ 33 किलोमीटर है। जहाजों के आने-जाने के लिए जो लेन बनी है, वह तो सिर्फ 3 किलोमीटर ही चौड़ी है. इतनी कम जगह होने की वजह से यहां जहाजों पर हमला करना या रास्ता रोकना बहुत आसान हो जाता है.
इस रास्ते से कितना तेल और गैस निकलता है?
आप सोच रहे होंगे कि एक छोटे से समुद्री रास्ते के बंद होने से दुनिया क्यों डर रही है? असल में, यहां से दुनिया का बहुत बड़ा कारोबार होता है. साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, हर दिन यहां से करीब 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है. अगर रुपयों में बात करें, तो साल भर में करीब 500 अरब डॉलर का ऊर्जा कारोबार इसी रास्ते से होता है. इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे बड़े तेल उत्पादक देश इसी रास्ते के भरोसे अपना माल दुनिया भर में बेचते हैं.
गैस का भी है बड़ा रोल
ईंधन के मामले में यह रास्ता सिर्फ पेट्रोल-डीजल (कच्चा तेल) के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि खाना पकाने और फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाली गैस (LNG) के लिए भी बहुत खास है. दुनिया भर में जितनी गैस जहाजों के जरिए एक देश से दूसरे देश भेजी जाती है, उसका पांचवा हिस्सा इसी रास्ते से निकलता है. इसमें कतर का सबसे बड़ा हाथ है, जो दुनिया को बहुत बड़ी मात्रा में गैस बेचता है. अगर यह रास्ता रुकता है, तो घरों की रसोई से लेकर बड़ी फैक्ट्रियों तक का काम ठप हो सकता है.
एशिया और भारत पर इसका क्या असर होगा?
इस रास्ते के बंद होने का सबसे बड़ा झटका एशिया के देशों को लगेगा. आंकड़े बताते हैं कि यहां से निकलने वाले तेल का 84% हिस्सा चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में जाता है. भारत और चीन जैसे देशों की फैक्ट्रियां, बस-ट्रेनें और बिजली घर इसी तेल और गैस पर टिके हैं. अगर सप्लाई रुकती है, तो इन देशों में चीजों के दाम बहुत तेजी से बढ़ेंगे और आम आदमी की जिंदगी मुश्किल हो जाएगी.
अभी वहां क्या हालात हैं?
अभी की ताज़ा खबर यह है कि ईरान की सेना (IRGC) रेडियो के जरिए वहां से गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी दे रही है कि किसी को भी आगे बढ़ने की इजाजत नहीं है. हालांकि, ईरान ने अभी तक कागजी तौर पर इस रास्ते को बंद करने का एलान नहीं किया है, लेकिन डर इतना है कि तेल और गैस ले जाने वाली कंपनियों ने खुद ही अपने जहाजों को रोक दिया है. कई जहाज समुद्र के बीच में ही लंगर डालकर खड़े हो गए हैं क्योंकि उन्हें हमले का डर है. अभी स्थिति 'रुको और देखो' वाली है. यूरोपीय संघ के अधिकारियों का कहना है कि ईरान ने आधिकारिक तौर पर रास्ता बंद नहीं किया है, लेकिन माहौल इतना खराब है कि कोई भी जहाज वहां से निकलने का रिस्क नहीं लेना चाहता.
अगर रास्ता बंद हुआ तो क्या होगा?
जानकारों का कहना है कि अगर ईरान ने वाकई यह रास्ता रोक दिया, तो तेल की कीमतें रातों-रात बहुत ऊपर चली जाएंगी. डर की वजह से ही बाजार में हड़कंप मच जाएगा. अभी एक जहाज पर ओमान के तट के पास हमला भी हुआ है, जिससे यह साफ हो गया है कि अब सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि तेल ले जाने वाले जहाजों को भी निशाना बनाया जा रहा है. अगर यह सिलसिला लंबा चला, तो कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है.
पूरी दुनिया की कमाई और महंगाई पर असर
अगर तेल महंगा होता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता. सामान ढोने वाले ट्रक महंगे हो जाएंगे, जिससे सब्जियां और अनाज महंगा होगा. जानकारों का मानना है कि अगर तेल के दाम 100 डॉलर पर टिक गए, तो पूरी दुनिया में महंगाई करीब 0.7% तक बढ़ जाएगी. इससे लोगों की बचत कम होगी और दुनिया भर के देशों के बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, जिससे लोन लेना भी महंगा हो जाएगा.
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