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एएआईबी ने बारामती विमान दुर्घटना पर प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी, पायलटों का प्री-फ्लाइट ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट था निगेटिव

नई दिल्ली, 28 फरवरी (आईएएनएस)। विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो ने शनिवार को बारामती विमान हादसे की प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप दी, जिसमें अजित पवार और अन्य चार लोगों की 28 जनवरी को जान चली गई थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दस्तावेज प्रारंभिक तथ्यों और जांच के शुरुआती चरणों में एकत्रित साक्ष्यों पर आधारित है। यह जानकारी अस्थायी है और भविष्य में बदल सकती है, इसलिए इसमें दी गई जानकारी से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता जब तक कि विशेष रूप से उल्लेख न किया गया हो।

आईसीएओ के कन्वेंशन की एनेक्स 13 और एयरक्राफ्ट (हादसों और घटनाओं की जांच) नियम, 2025 के अनुसार, किसी भी हादसे या घटना की जांच का एकमात्र उद्देश्य भविष्य में हादसों और घटनाओं को रोकना है, न कि किसी पर दोष या जिम्मेदारी लगाना।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों पायलट पहले भी बारामती आ चुके थे और एयरफील्ड की टोपोग्राफी से परिचित थे। कंपनी के रिकॉर्ड के अनुसार, पीआईसी और एफओ के पास कई वीआईपी उड़ानों और नियंत्रित न किए गए एयरफील्ड्स, जैसे बारामती में उड़ान भरने का अनुभव था।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि दोनों पायलटों का प्री-फ्लाइट ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट विमान में पैरामेडिक द्वारा किया गया और वीडियो क्लिप व बीए स्लिप के अनुसार, यह परीक्षण नकारात्मक (संतोषजनक) पाया गया।

हादसे के दिन बारामती हवाईअड्डे पर दृश्यता लगभग 3,000 मीटर थी, जो वीएफआर उड़ान के लिए आवश्यक न्यूनतम 5,000 मीटर से काफी कम थी।

एएआईबी ने अपनी अंतरिम सुरक्षा सिफारिशों में छोटे एयरफील्ड्स पर संचालन की कड़ी निगरानी, उनकी लाइसेंसिंग की समीक्षा और लैंडिंग तथा मौसम संबंधी अवसंरचना में तुरंत सुधार की सिफारिश की है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जांच अभी जारी है और कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर का डेटा अभी डाउनलोड किया जाना बाकी है, जिसमें अमेरिकी नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड की मदद ली जाएगी।

--आईएएनएस

एएमटी/डीकेपी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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सात वर्षों में त्रिपुरा में फ्लोरीकल्चर क्षेत्र में 332 प्रतिशत की वृद्धि

अगरतला, 28 फरवरी (आईएएनएस)। त्रिपुरा में पिछले सात वर्षों के दौरान फ्लोरीकल्चर (फूलों की खेती) के क्षेत्रफल में 332 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राज्य के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री रतन लाल नाथ ने शनिवार को यह जानकारी देते हुए कहा कि सरकार की पहल और स्थानीय बाजारों में बढ़ती मांग के कारण किसानों की आय में भी इजाफा हुआ है।

मंत्री ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2018-19 से राज्य में फूलों की खेती का दायरा तेजी से बढ़ा है। बेहतर कीमत मिलने और मांग में निरंतर वृद्धि के चलते किसान पारंपरिक फसलों से हटकर फ्लोरीकल्चर की ओर रुख कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि फ्लोरीकल्चर एक अत्यंत लाभकारी क्षेत्र के रूप में उभरा है, जो किसानों को आय के नए अवसर प्रदान कर रहा है। हालांकि यह खेती हर जगह संभव नहीं है, लेकिन जहां परिस्थितियां अनुकूल हैं, वहां यह कृषि गतिविधियों में सबसे अधिक आय देने वाली फसलों में शामिल है।

मंत्री के अनुसार, पहले बिशालगढ़ जैसे क्षेत्रों में किसान सब्जी की खेती करते थे, लेकिन अब वे अधिक लाभ के लिए फूलों की खेती अपना रहे हैं। सरकार का उद्देश्य लोगों को आत्मनिर्भर बनाना और जमीनी स्तर पर रोजगार सृजन करना है। फूलों का उपयोग केवल सजावट के लिए ही नहीं, बल्कि होली के प्राकृतिक रंग, दवाइयों और इत्र निर्माण में भी होता है, जिससे इनकी मांग लगातार बनी रहती है।

त्रिपुरा की उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त वर्षा और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु विभिन्न प्रकार के फूलों की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है। पारंपरिक किस्मों जैसे गेंदा, ग्लैडियोलस और गुलाब की खेती का क्षेत्र 2018-19 से अब तक 60 प्रतिशत बढ़ा है।

वहीं, उच्च तकनीक आधारित फ्लोरीकल्चर में भी राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। एंथुरियम, ऑर्किड और जरबेरा जैसे फूल अब संरक्षित खेती (प्रोटेक्टेड कल्टीवेशन) के तहत सफलतापूर्वक उगाए जा रहे हैं। इस अवधि में हाई-टेक फ्लोरीकल्चर क्षेत्र में 124 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

मंत्री ने बताया कि 200 वर्ग मीटर क्षेत्र में फूलों की खेती करने वाले किसान औसतन 10,000 रुपये से अधिक का मासिक लाभ कमा रहे हैं। स्थानीय बाजार में मजबूत मांग के कारण किसानों को अच्छी कीमत मिल रही है।

फ्लोरीकल्चर को मजबूती देने के लिए राज्य सरकार ने पश्चिम त्रिपुरा जिले के बदरघाट गार्डन में 400 वर्ग मीटर का आर्केडियम और 400 वर्ग मीटर का हार्डनिंग सेंटर स्थापित किया है। हाल ही में शुरू की गई इस सुविधा का नाम ‘सेंटर ऑफ फ्लोरीकल्चर एंड लैंडस्केपिंग’ रखा गया है। इसके निर्माण पर लोक निर्माण विभाग की सहायता से 4.50 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।

इसके अलावा, लेम्बूचरा में 65 कानी भूमि पर केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पहल से ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन फ्लावर्स’ विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत ऑर्किड, एंथुरियम, जरबेरा, गुलाब, क्राइसेंथेमम और विभिन्न सजावटी पत्तेदार पौधों की खेती की जाएगी। साथ ही किसानों को प्रशिक्षण और उच्च गुणवत्ता वाले पौधों की आपूर्ति भी की जाएगी।

मंत्री ने आशा व्यक्त की कि इन पहलों से त्रिपुरा फ्लोरीकल्चर के उभरते केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत करेगा और फूलों के उत्पादन में नए कीर्तिमान स्थापित करेगा।

--आईएएनएस

डीएससी

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