मलेशियाई पीएम अनवर इब्राहिम ने ईरान-इजरायल हमले की निंदा की, डिप्लोमैटिक रास्ता अपनाने की अपील की
नई दिल्ली, 28 फरवरी (आईएएनएस)। इजरायल ने ईरान के खिलाफ प्रिवेंटिव एयरस्ट्राइक किया। इजरायल के ऑपरेशन रोअरिंग लॉयन में अमेरिका भी शामिल हो गया है और ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैनिक कार्रवाई कर रही है। मिडिल ईस्ट में इस वक्त जंग के हालात बने हुए हैं। वहीं मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने हमले की कड़ी निंदा की है और सभी देशों से डिप्लोमैटिक रास्ता अपनाने की अपील की।
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कहा, ईरान पर इजराइली हमले और उनके साथ हुई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई, मिडिल ईस्ट को तबाही के कगार पर ले आई है। इजरायल का ये हमला शुरू करना चल रही बातचीत को रोकने और दूसरे देशों को एक ऐसे झगड़े में घसीटने की एक घटिया कोशिश थी जिसे रोकना नामुमकिन साबित हो सकता है।
मलेशियाई पीएम ने आगे कहा, दुश्मनी को तुरंत और बिना किसी शर्त के खत्म करना बहुत जरूरी है। मैं अमेरिका और ईरान से गुजारिश करता हूं कि वे इसे और बढ़ाने के बजाय एक डिप्लोमैटिक रास्ता अपनाएं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी गुजारिश करता हूं कि वह बिना किसी दोहरे मापदंड के तुरंत काम करे।
उन्होंने आगे कहा कि इसके अलावा, इस समय मेरी चिंता ईरान और इलाके में दूसरी जगहों पर मलेशियाई लोगों की सुरक्षा है। मैं इस बारे में अगले कदमों के बारे में क्षेत्रीय साझेदारों के साथ संपर्क में रहूंगा।
सऊदी अरब ने यूएई, बहरीन, कतर, जॉर्डन और कुवैत पर ईरान के हमलों की “कड़े शब्दों” में निंदा की है। सऊदी अरब ने “देश की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों” के लगातार उल्लंघन पर “गंभीर नतीजे” की चेतावनी दी।
ब्रिटेन ने फिर कहा है कि ईरान को कभी भी न्यूक्लियर हथियार बनाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई में मौजूद ब्रिटिश नागरिकों से तुरंत पनाह लेने को कहा है।
ब्रिटिश एयरवेज ने 3 मार्च तक तेल अवीव और बहरीन के लिए विमान रद्द कर दी हैं। एयरलाइन ने एक बयान में कहा, “हम हालात पर करीब से नजर रख रहे हैं और हमने 3 मार्च तक तेल अवीव और बहरीन के लिए अपनी विमान कैंसिल करने का ऑपरेशनल फैसला लिया है और आज अम्मान के लिए अपनी सेवाएं भी कैंसिल कर दी हैं। सुरक्षा हमेशा हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है और हम अपने यात्रियों से उनके ट्रैवल ऑप्शन के बारे में सलाह देने के लिए संपर्क कर रहे हैं।”
--आईएएनएस
केके/डीएससी
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मिडिल ईस्ट में अमेरिका की महा-घेराबंदी, ईरान के चारों तरफ तैनात किए 'तैरते किले'
मिडिल ईस्ट में हालात अब उस मोड़ पर पहुंच गए हैं जहां से वापसी का रास्ता मुश्किल नजर आ रहा है. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई बड़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि इन हमलों का मुख्य मकसद ईरान की नौसेना और उसके मिसाइल ठिकानों को पूरी तरह खत्म करना है. इस सैन्य कार्रवाई के पीछे अमेरिका की एक सोची-समझी रणनीति है, जिसे एक बड़े 'शक्ति प्रदर्शन' के रूप में देखा जा रहा है. अमेरिका ने ईरान पर न केवल मिसाइलों से प्रहार किया है, बल्कि अपनी विशाल सेना की तैनाती करके उस पर रणनीतिक दबाव भी बनाने की कोशिश की है.
समंदर में 'तैरते किलों' का पहरा
इस तनाव के बीच अमेरिकी नौसेना की ताकत सबसे ज्यादा चर्चा में है. अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के पानी में अपने एक दर्जन से ज्यादा शक्तिशाली युद्धपोत तैनात कर दिए हैं. इनमें सबसे प्रमुख हैं. USS Abraham Lincoln और USS Gerald R. Ford. ये सिर्फ जहाज नहीं, बल्कि समंदर में तैरते हुए ऐसे किले हैं जिन पर दर्जनों लड़ाकू विमान हर वक्त हमले के लिए तैयार रहते हैं. वर्तमान में 'अब्राहम लिंकन' अरब सागर में मोर्चा संभाले हुए है, जबकि 'जेराल्ड आर. फोर्ड' भूमध्य सागर में तैनात है. इनके साथ नौ विध्वंसक (Destroyers) और तीन युद्धपोत भी सक्रिय हैं. डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि दो एयरक्राफ्ट कैरियर की एक साथ मौजूदगी इस बात का सबूत है कि हालात बेहद गंभीर हैं और अमेरिका किसी भी बड़ी जंग के लिए पूरी तरह तैयार है.
आसमान में अदृश्य शिकारियों की गूंज
अमेरिका ने ईरान की सीमा के पास अपने सबसे आधुनिक और घातक लड़ाकू विमानों का जमावड़ा लगा दिया है. इस हवाई बेड़े में F-22 Raptor और F-35 Lightning II जैसे स्टील्थ फाइटर जेट शामिल हैं. इन विमानों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये दुश्मन के रडार की पकड़ में आए बिना हमला कर सकते हैं. इसके अलावा F-15 Eagle और F-16 Fighting Falcon जैसे अनुभवी विमान भी आसमान में पहरा दे रहे हैं. लंबी दूरी के ऑपरेशन्स को अंजाम देने के लिए अमेरिका KC-135 Stratotanker का इस्तेमाल कर रहा है. ये 'हवाई पेट्रोल पंप' की तरह काम करते हैं, जो आसमान में ही लड़ाकू विमानों में ईंधन भर देते हैं, जिससे ये विमान बिना जमीन पर उतरे लगातार घंटों तक हमला जारी रख सकते हैं.
जमीन पर अभेद्य घेराबंदी और हजारों सैनिक
सिर्फ पानी और आसमान ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी अमेरिका ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. मिडिल ईस्ट के अलग-अलग देशों में अमेरिका के हजारों सैनिक और दर्जनों सैन्य अड्डे इस समय 'हाई अलर्ट' पर हैं. कतर का अल उदीद (Al Udeid) और यूएई का अल धफरा (Al Dhafra) एयर बेस इस समय मुख्य कमांड सेंटर बने हुए हैं.
इसके साथ ही कुवैत में स्थित कैंप अरिफ़जान (Camp Arifjan) और कैंप ब्यूहरिंग से सेना की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा रहा है. बहरीन, सऊदी अरब, ओमान और इराक में भी अमेरिकी ठिकाने सक्रिय हैं. ये अड्डे न केवल जवाबी हमले के लिए तैयार हैं, बल्कि यहां तैनात मिसाइल डिफेंस सिस्टम ईरान की ओर से आने वाली किसी भी मिसाइल को हवा में ही मार गिराने की क्षमता रखते हैं.
घेराबंदी का असली मकसद
सवाल उठता है कि इतनी भारी तैनाती की ज़रूरत क्यों पड़ी? रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इसके तीन बड़े कारण हैं. पहला है 'निरोध' (Deterrence)यानी ईरान को यह साफ संदेश देना कि अगर उसने कोई हिमाकत की, तो अमेरिका पल भर में जवाब देने के काबिल है. दूसरा है 'त्वरित हमला' यानी जरूरत पड़ने पर ईरान के परमाणु या सैन्य ठिकानों पर तुरंत प्रहार करना.
और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण है व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा. खाड़ी देशों और अरब सागर से होकर दुनिया का एक बड़ा व्यापार गुजरता है. अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि युद्ध के माहौल में भी ये समुद्री रास्ते खुले रहें और उसके सहयोगियों को कोई नुकसान न पहुंचे. कुल मिलाकर, अमेरिका का यह विशाल सैन्य ढांचा ईरान को यह बताने के लिए काफी है कि वह एक लंबी और निर्णायक लड़ाई के लिए पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरा है.
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