नई दिल्ली। सरकार के साथ मिलकर समुदाय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को मुहैया कराने में सक्रिय रूप से सहयोग कर रही पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया (पीएसआई इंडिया) संस्था को मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष समारोह में सीएसआर टाइम्स अवार्ड से नवाजा गया। संस्था को रूरल एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट की कैटेगरी में स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया फाउंडेशन से वित्त पोषित “मातृछाया” कार्यक्रम के लिए गोल्ड अवार्ड प्रदान किया गया है। इसके अलावा निवाबूपा हेल्थ इंश्योरेंस से वित्त पोषित हेल्थ केयर- हेल्थ फॉर आल (इंटिग्रेटेड प्राइमरी हेल्थ केयर डिलीवरी टिल दि लास्ट माइल) कार्यक्रम के लिए सिल्वर अवार्ड प्राप्त हुआ है।
पीएसआई इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर मुकेश शर्मा ने बताया कि मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के उद्देश्य से मातृछाया कार्यक्रम की अनूठी पहल उत्तर प्रदेश में की गयी है। इसके तहत पहले चरण में स्वास्थ्य विभाग की मदद से बहराइच, बलरामपुर और हरदोई जिलों के एक-एक सीएचसी का चयन किया गया। इसके बाद वहां के प्रसव स्थल व प्रसव कक्ष की व्यवस्थाओं का मानक के अनुरूप आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण किया गया। इसके साथ ही प्रसव बिस्तरों, नवजात शिशु देखभाल क्षेत्र, नर्सिंग स्टेशन और सही तरीके से हाथ धुलने की व्यवस्था को सुनिश्चित किया गया। इससे प्रसूता और नवजात को एक स्वस्थ और बेहतर माहौल प्राप्त हुआ । इसके लिए सीएसआर टाइम्स गोल्ड अवार्ड प्राप्त होने से निश्चित रूप से इस कार्यक्रम से जुड़े साथियों और संस्था का उत्साहवर्धन होगा और हमारा प्रयास होगा कि सेवाओं को और गुणवत्तापूर्ण बनाया जाए।
दूसरी ओर हरियाणा के गुरुग्राम में दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को घर बैठे गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर पीएसआई इंडिया और निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस के सहयोग से चिकित्सकों, स्वास्थ्य कर्मियों और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित चार मेडिकल मोबाइल यूनिट को संचालित किया जा रहा है। मेडिकल मोबाइल यूनिट ग्रामीणों के सामान्य रोगों की जांच करने के साथ ही जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं भी प्रदान करती है। इसके अलावा परामर्श और आवश्यकता पड़ने पर रेफर की भी सुविधा प्रदान करती है। हेल्थ फॉर आल कार्यक्रम के तहत किशोर-किशोरियों को इस अवस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों व एनीमिया से बचने के बारे में भी परामर्श प्रदान किया जाता है। इस कार्यक्रम के लिए सीएसआर टाइम्स सिल्वर अवार्ड से संस्था को नवाजा गया है।
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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को पुलिस से कहा कि वे राजधानी के सभी पुलिस स्टेशनों में महिला कर्मचारियों के लिए सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें लगाएं और उनके लिए अलग वॉशरूम की सुविधा दें। कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे छह हफ़्ते के अंदर सभी पुलिस स्टेशनों का सर्वे करके इन सुविधाओं की उपलब्धता की जांच करें। चीफ़ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि सर्वे रिपोर्ट के आधार पर पुलिस को यह पक्का करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने चाहिए कि हर पुलिस स्टेशन में महिला कर्मचारियों के लिए सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और अलग वॉशरूम हो। इस मामले की सुनवाई 23 सितंबर को होगी और कोर्ट ने पुलिस से उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए एक हलफ़नामा मांगा है।
महिला पुलिसकर्मियों के लिए काम की जगह पर मासिक धर्म के दौरान साफ़-सफ़ाई और सैनिटेशन की बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की मांग वाली याचिका पर केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस को नोटिस जारी करते हुए यह आदेश दिया गया। बेंच ने कहा, सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर, पुलिस को हर थाने में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और महिला कर्मियों के लिए अलग वॉशरूम की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए। साथ ही यह भी कहा हम चाहते हैं कि पुलिस कमिश्नर दिल्ली के सभी थानों का सर्वे करवाएँ... यह सर्वे छह हफ़्ते में पूरा किया जाना चाहिए। NGO 'जस्टिस फॉर राइट्स फाउंडेशन' की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि महिला पुलिसकर्मियों के लिए ऐसी ज़रूरी सुविधाएँ अनुच्छेद 21 के तहत संवैधानिक आदेश के लिए बहुत ज़रूरी हैं, क्योंकि ये सम्मान, स्वास्थ्य, निजता और काम की जगह पर मानवीय स्थितियों के साथ जीने के अधिकार का एक अहम हिस्सा हैं।
RTI के तहत मिली जानकारी का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता ने कहा कि दिल्ली के सैकड़ों पुलिस स्टेशनों में हज़ारों महिला पुलिसकर्मी तैनात हैं, लेकिन सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें सिर्फ़ कुछ ही स्टेशनों पर उपलब्ध हैं और साफ़-सफ़ाई की सुविधाओं और बुनियादी ढांचे के लिए कोई बजट या पॉलिसी नहीं है। याचिका में कहा गया, सरकार की यह चूक महज़ एक प्रशासनिक गलती से कहीं ज़्यादा है... ऐसी बुनियादी सुविधाएँ न दे पाना महिला पुलिसकर्मियों की गरिमा, स्वास्थ्य, निजता और काम करने की सुरक्षित स्थितियों का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के ख़िलाफ़ है।
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