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Prabhasakshi NewsRoom: Durand Line पर धधकी जंग, पाकिस्तानी हमले का तगड़ा जवाब दे रहे तालिबानी, कई पाक सैनिकों के Surrender के वीडियो वायरल

दक्षिण एशिया की पश्चिमी सरहद पर हालात अब आधिकारिक तौर पर जंग की शक्ल ले चुके हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने साफ शब्दों में कहा है कि अब अफगानिस्तान के साथ खुली जंग चल रही है। यह बयान उस वक्त आया जब दोनों देशों के बीच ताजा हवाई हमले, जमीनी झड़पें और चौकियों पर कब्जे के दावे सामने आए। तालिबान शासित अफगानिस्तान ने दावा किया है कि उसने पाकिस्तानी सीमा चौकियों पर बड़े पैमाने पर हमला कर एक दर्जन से अधिक पोस्ट पर कब्जा किया, 19 चौकियां और दो सैन्य ठिकाने तबाह किए और कई सैनिकों को मार गिराया या पकड़ा। वहीं पाकिस्तान ने ऑपरेशन गजब लिल हक के तहत काबुल, कंधार और पकतिया में बड़े सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया।

हम आपको बता दें कि आज तड़के काबुल में विस्फोटों और लड़ाकू विमानों की आवाज से दहशत फैल गई। इससे कुछ घंटे पहले अफगान बलों ने कहा था कि उन्होंने विवादित डूरंड लाइन पर पाकिस्तानी चौकियों को निशाना बनाया है। पाकिस्तान ने जवाब में हवाई हमले किए और कहा कि यह कार्रवाई सीमा पार से हुई बिना उकसावे की गोलीबारी के जवाब में है। अफगान रक्षा मंत्रालय का कहना है कि लड़ाई आधी रात तक चली और उसके बाद स्थिति काबू में आई। पाकिस्तान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उसके केवल दो सैनिक मारे गए और तीन घायल हुए, जबकि 36 अफगान लड़ाके ढेर किए गए। दूसरी तरफ अफगानिस्तान का दावा है कि 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और कई पकड़े गए। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

इसे भी पढ़ें: Pakistan के रक्षा मंत्री Khawaja Asif का बड़ा ऐलान, Afghanistan से अब 'खुली जंग' की स्थिति

हम आपको बता दें कि तनाव की शुरुआत पिछले रविवार को पाकिस्तान की ओर से किए गए हवाई हमलों से हुई। इस्लामाबाद का कहना था कि उसने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ठिकानों को निशाना बनाया। लेकिन काबुल ने आरोप लगाया कि हमले नागरिक इलाकों पर हुए और उसकी संप्रभुता का उल्लंघन किया गया। तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि सीमा पार कार्रवाई बार बार की गई पाकिस्तानी हरकतों के जवाब में थी। हम आपको बता दें कि डूरंड रेखा 2640 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसे 1893 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव मोर्टिमर डूरंड ने अफगान शासक अमीर अब्दुर रहमान खान पर थोपा था। अफगान पक्ष का तर्क है कि यह स्थायी अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं थी, बल्कि प्रभाव क्षेत्र की रेखा थी। यही ऐतिहासिक घाव आज भी जंग का बारूद बना हुआ है।

दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव को और भड़काने वाला दावा था पाकिस्तानी एफ-16 विमान को मार गिराने का। अफगान बलों से जुड़े खातों ने एक वीडियो साझा कर कहा कि अमेरिकी निर्मित एफ-16 लड़ाकू विमान को गिरा दिया गया। पाकिस्तान ने इस दावे को खारिज किया, लेकिन इस दावे ने मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर असर डाला है। हम आपको बता दें कि एफ-16 पाकिस्तान वायुसेना की सबसे अहम ताकतों में गिना जाता है। अगर तालिबान सीमित संसाधनों के बावजूद उसे चुनौती देने का संदेश दे रहा है, तो यह रणनीतिक संकेत है कि जंग केवल जमीन पर नहीं, आसमान में भी फैल सकती है।

रिपोर्टों के मुताबिक, तोरखम सीमा के पास एक शिविर में गोला गिरने से कई नागरिक घायल हुए। दोनों देशों ने सीमावर्ती गांवों को खाली कराया है। हालात इतने गंभीर हैं कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन करने की अपील की है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी रमजान के पवित्र महीने का हवाला देते हुए संयम और बातचीत पर जोर दिया है। इसके बावजूद जमीनी सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष एक दूसरे पर हिंसा शुरू करने का आरोप लगा रहे हैं और गोलाबारी रुक रुक कर जारी है।

हम आपको याद दिला दें कि 1947 के बाद से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते अविश्वास और कटुता से भरे रहे हैं। सोवियत हस्तक्षेप से लेकर अमेरिका के अभियान तक, हर दौर में पाकिस्तान ने अफगान प्रतिरोध का समर्थन किया, लेकिन आज वही जमीन उसके लिए चुनौती बन गई है।

साथ ही यह टकराव पाकिस्तान के लिए दो मोर्चों का खतरा पैदा करता है। एक ओर आर्थिक संकट, दूसरी ओर पश्चिमी सीमा पर खुली जंग। तालिबान की रणनीति साफ दिखती है वह सीमित संसाधनों से तेज हमला करता है, चौकियों पर कब्जे का दावा कर मनोबल बढ़ाता है और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर नागरिक नुकसान का मुद्दा उठाकर नैतिक दबाव बनाता है। वैसे अगर अफगान दावों में थोड़ी भी सच्चाई है कि उसने कई पोस्ट पर कब्जा किया और पाकिस्तानी सैनिकों को पकड़ा, तो यह इस्लामाबाद के लिए बड़ा झटका है। पाकिस्तान के भारी हथियार और वायु शक्ति के बावजूद तालिबान गुरिल्ला शैली और भूगोल की समझ के दम पर उसे थका देने वाली जंग में खींच रहा है।

बहरहाल, खुली जंग का ऐलान संकेत है कि हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं। इस समय तालिबान रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक मुद्रा में दिख रहा है। पाकिस्तान के लिए यह सिर्फ सीमा संघर्ष नहीं, बल्कि रणनीतिक चुनौती है, जहां हर गलत कदम पूरे क्षेत्र को लंबे अस्थिर दौर में धकेल सकता है।

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तीन महीने से डाइट पर 3 साल की मासूम:वजन बढ़कर 13.5 किलो हुआ तो नहीं लग पाएगा 9 करोड़ का इंजेक्शन, अब भी चाहिए 3.40 करोड़

SMA टाइप- 2 बीमारी से ग्रसित 3 साल 2 महीने की मासूम अनिका शर्मा के पास इलाज का आखिरी मौका बचा है, अगर उसका वजन 13.5 किलो हो गया तो उसका इलाज हो पाना भी मुश्किल है। इसलिए उसे माता-पिता ने डाइट पर रखा है। तीन महीने से उसे खाना नहीं दिया। माता-पिता भी जल्द से जल्द पैसे जुटाने में लगे हैं, ताकि अनिका का वक्त रहते इलाज करा पाए। अनिका को 9 करोड़ रुपए का इंजेक्शन लगना है, जो अमेरिका से आएगा। वहीं पैसा इकट्ठा करने के लिए माता-पिता रोज कई लोगों के साथ मिलकर क्राउड फंडिंग कर रहे हैं। क्राउड फंडिंग, डोनेशन मिलाकर अब तक 5 करोड़ 60 लाख रुपए इकट्ठा हो चुके हैं। बाकी पैसे जुटाने में परिवार लगा हुआ है। एक क्राइटेरिया निकल गया, अब आखिरी मौका ही बचा अनिका की मां सरिता शर्मा ने बताया कि अनिका का वजन अभी 10.5 किलो है, जो इंजेक्शन है, वह 13.5 किलो के पहले लगना है। वजन ना बढ़े, इसके लिए अनिका को डाइट पर रखा है। अनिका को खाने में फ्रूट्स, जूस, चाय-बिस्किट और हलवा बनाकर देते हैं। रोटी, चावल या ऐसे फ्रूट्स नहीं देते, जिससे उसका वजन बढ़ जाए। ऐसी चीज देते हैं कि उसका पेट भर जाए। तीन महीने से अनिका को खाना नहीं दिया, ताकि इसका वजन कंट्रोल में रहे और बढ़े नहीं। बच्ची के इलाज के लिए मां ने चप्पल तक पहनना छोड़ दिया है। मां ने बताया कि दिल्ली एम्स अस्पताल से जो प्रिस्क्रिपशन बना है, उसमें इलाज के दो क्राइटेरिया दिए गए थे। एक ये कि अनिका को 2 साल की उम्र के पहले इंजेक्शन लगना था। दूसरा ये कि 13.5 किलो वजन के पहले उसे इंजेक्शन लगाना है। उम्र का क्राइटेरिया तो निकल गया, लेकिन वजन का क्राइटेरिया अभी बचा है। ये आखिरी मौका है, उसकी जान बचाने के लिए। ये है दिनभर है सुबह से रात तक का खाना मां ने बताया कि अनिका के सुबह उठने के बाद उसे एक दवा देने पड़ती है। वह दवा देने के पहले उसे पपीता खिलाते हैं। उसके बाद एक पाउडर बनाया जाता है, जिसमें मखाना सेंक कर, उसे पीसकर उसमें बादाम, अखरोट मिलाकर उसमें खांड मिलाया जाता है, जिससे वह मीठा हो जाता है और वजन भी नहीं बढ़ता है। इस पाउडर को दूध में मिलाकर उसका हलवा बनाकर उसे देते है। दिन में चुनिंदा फ्रूट्स का जूस देते हैं। शाम को चाय-बिस्किट दे देते हैं। रात को फिर से पाउडर देते हैं। रोटी सब्जी, दाल-चावल या ऐसी चीज नहीं देते हैं, जिससे उसका वजन बढ़ जाए। मां के मुताबिक, रोजाना एक ही चीज खाकर वह भी परेशान हो चुकी है। कई बार तो वह सुबह से शाम तक भूखी रहती है, कि उसे वह नहीं खाना है। हमें भी अच्छा नहीं लगता है कि हम उसकी पसंद का उसे नहीं दे पाते हैं। रोजाना वह भी हमारे साथ क्राउड फंडिंग के लिए जाती है, अगर कोई उसे बाहर कुछ खिला देता हैं तो वह वहीं चीज मांगती है। इसलिए इसके हाथ से वह चीज छीन लेते हैं, तो वह रोने लगती है, वहीं चीज मांगती है। ऐसे में अलग-अलग तरह से उसे खिलाने की कोशिश करते है। परेशानी तो बहुत उठा रहे है, क्योंकि अगर उसका वजन बढ़ गया तो ये मेहनत काम नहीं आएगी। सांस लेने में भी होती दिक्कत सरिता ने बताया कि क्राउड फंडिग के लिए बच्ची को लेकर जाते हैं, मगर बच्ची जिस बीमारी से ग्रसित है उसमें सांस लेने में भी परेशानी होती है। बाहर से एटमॉस्फेयर में रहती है तो उसे सर्दी हो जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। इसलिए उसे डॉक्टर को दिखाना पड़ता है और उसकी दवा चलती है। ऐसे में कभी-कभी उसे लेकर भी नहीं जाते हैं। इसलिए परेशानी तो बहुत उठाना पड़ती है। हमने घर में ही मशीन ले रखी है और बार-बार उसका वजन चेक करते रहते हैं। जनता से यहीं उम्मीद है कि हम 5 करोड़ 60 लाख तक पहुंच गए हैं। 3 करोड़ 40 लाख का लक्ष्य बाकी है। अभी भी जनता सपोर्ट करें तो हमारी बच्ची को इंजेक्शन लग जाएगा। इंदौर के अलावा कई जगह जाकर की क्राउड फंडिंग पिता प्रवीण शर्मा ने बताया कि नवंबर महीने से हम बच्ची के इलाज के लिए पैसे जुटाने के लिए कैपेनिंग कर रहे हैं। जनता के सहयोग से जगह-जगह कैंप लगाकर हम 5 करोड 60 लाख रुपए जमा कर चुके हैं, जिसमें दिल्ली एर्म्स से 50 लाख रुपए स्वीकृत हुए जेपी नड्डा द्वारा। 3 करोड़ 40 लाख रुपए बच्ची के इलाज के लिए चाहिए, अगर जनता थोड़ा और सहयोग कर दे तो बच्ची का इलाज हो जाएगा। इंदौर के अलावा रतलाम, बदनावर, बड़नगर में क्राउड फंडिंग कर चुके हैं। इसके अलावा खंडवा, उज्जैन में भी क्राउंड फंडिंग करने की तैयारी है। जहां-जहां जा सकते हैं वहां जाने की कोशिश कर रहे हैं। बच्ची के लिए कई सेलिब्रिटी भी वीडियो बनाकर जनता से अपील कर चुके हैं। इस QR के जरिए अनिका की मदद की जा सकती है जानिए कितनी खतरनाक है बीमारी इंदौर के शिशु रोग विशेषज्ञ और एमजीएम मेडिकल कॉलेज के पूर्व डीन डॉ. हेमंत जैन के मुताबिक दुर्लभ न्यूरो-मस्क्यूलर जेनेटिक बीमारी SMA में बच्चे की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड से मसल्स तक जाने वाले सिग्नल कम हो जाते हैं। इस बीमारी में स्पाइनल कॉर्ड की मोटर नर्व सेल्स डैमेज होने लगती हैं। दिमाग मसल्स को हिलाने-डुलाने के लिए संदेश भेज नहीं पाता। इसलिए बच्चा शरीर पर कंट्रोल खोने लगता है। शुरुआत में हाथ-पैर और शरीर हिलाने में कमजोरी दिखती है। समय के साथ बच्चा बैठना-चलना, यहां तक कि सांस लेना और निगलना भी मुश्किल हो सकता है। इस बीमारी के चलते शरीर की मांसपेशियों में कमजोरी आ जाती है। गंभीर स्थिति में लकवा या मौत भी हो जाती है। डॉक्टर्स का कहना है कि मुश्किल यह है कि दवा अभी केवल एक ही कंपनी नोवार्टिस बना रही है। किसी और कंपनी ने अब तक इस पर रिसर्च या प्रोडक्शन शुरू नहीं किया है। यही वजह है कि यह बहुत महंगी है। जानकारी के अनुसार बीमारी के मरीज भी दुनिया में गिने-चुने ही हैं। ऐसे में दवा तैयार करने के लिए रिसर्च और ट्रायल पर बहुत ही ज्यादा खर्च होता है। स्थिति यह होती है कि ट्रायल के लिए मरीज मिलना भी मुश्किल होते हैं।यह टाइप 1 से टाइप 4 तक की होती है। जो अलग-अलग उम्र के लोगों में होती है। एसएमए टाइप-1: यह अधिक गंभीर है, जो शून्य से दो साल तक के बच्चों में पाया जाता है। यह तेजी से रीढ़ की हड्‌डी में मौजूद मोटर न्यूरॉन्स को नष्ट कर देता है। 90% से ज्यादा बच्चों की मौत का कारण बनता है। एसएमए टाइप-2: यह 2 से 25 वर्ष की आयु तक 30% से अधिक रोगियों की मृत्यु का कारण बनता है। मां के गर्भ में ही पहचान सकते हैं बीमारी डॉ. हेमंत जैन ने बताया कि बच्चा जब मां के पेट में होता है, तभी इस बीमारी की पहचान की जा सकती है। कई बच्चे गर्भ में सही तरीके से घूम नहीं पाते हैं। ऐसा होने पर विशेषज्ञ डॉक्टर उसकी कोशिकाओं का परीक्षण कराते हैं। तभी इस बीमारी का पता चल जाता है। ऐसा होने पर बच्चा जैसे ही जन्म लेता है, उसे सही समय पर इलाज मिल जाए तो वह पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। इस बीमारी के बारे में जितना देरी से पता चलता है समय के साथ उतनी ज्यादा कोशिकाएं नष्ट होती जाती हैं, जिन्हें रिकवर नहीं किया जा सकता है। इसके लिए मिलने वाले इंजेक्शन से भी मरी हुई कोशिकाओं को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। नई कोशिकाओं को इसके प्रभाव में आने से रोका जा सकता है। डॉ. जैन ने बताया कि महिला को अगली बार गर्भ होने पर उसकी जेनेटिक काउंसलिंग होना चाहिए। बच्चे का टिश्यू निकालकर एम्नियोसिम्प्टेसिस (जीन) टेस्ट कराते हैं। इससे होने वाले बच्चे में एसएमए बीमारी का पता लगाया जा सकता है। ट्रायल के लिए तक मरीज मिलना भी मुश्किल डॉ. जैन ने कहा कि कोई भी दवा को बाजार में लाने के पहले ट्रायल किया जाता है। भारत में 10 हजार लोगों में से एक मरीज एसएमए का शिकार होता है। इसलिए इसके ट्रायल और स्टडी के लिए मरीजों का उपलब्ध होना बहुत मुश्किल हो जाता है। दूसरा कारण बताते हुए डॉ. जैन ने कहा कि एसएमए बीमारी का इलाज जीन थैरेपी से किया जाता है, यानी किसी बीमारी को ठीक करने के लिए कोशिकाओं में एक नया या बदला हुआ जीन डाला जाता है, ताकि वो स्वस्थ प्रोटीन बना सकें या दोषपूर्ण जीन को ठीक कर सकें, इसलिए भी यह दवा महंगी है। ये खबर भी पढ़ें… अनिका के लिए लगातार संघर्ष कर रहे माता-पिता इंदौर की मासूम अनिका को दुर्लभ बीमारी से बचाने के लिए माता-पिता लगातार संघर्ष कर रहे हैं। जगह-जगह वह लोगों के साथ मिलकर क्राउड फंडिंग यहां तक की जिन लोगों से मदद की उम्मीद है उनके यहां तक पहुंच रहे हैं। अनिका की मां सरिता शर्मा और पिता प्रवीण शर्मा लगातार अपनी बेटी को बीमारी से बचाने के लिए रात-दिन लगे हुए हैं।पूरी खबर पढ़ें

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